आर्य संस्कृति की पहचान | Identity of Aryan Culture

 आर्य संस्कृति की पहचान | Identity of Aryan Culture

आर्य संस्कृति की पहचान

वैदिक, ईरानी और यूनानी ग्रंथों के आधार पर तथा विभिन्न आद्य हिंद-यूरोपीय
भाषाओं में पाए जाने वाले सजातीय शब्दों की सहायता से आर्य संस्कृति की प्रमुख
विशेषताओं को निर्धारित किया जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में ऋग्वेद, जद अवेस्ता
और होमर रचित इलियड तथा ओडिसी आते हैं। इनके तिथि निर्धारण की कसौटियों
के बारे में विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं, किंतु हमलोग उन तिथियों का सहारा ले सकते
हैं जिन्हें विद्वानों ने सामान्यतः स्वीकार किया है। इस दृष्टि से ऋग्वेद को 1500
ई० पू० में रखा जाता है यद्यपि इसके कुछ अंश 1000 ई० पू० तक आते हैं। जेंद
अवेस्ता की तिथि 1400 ई० पू० में रखी जाती है और होमर की रचनाओं को
900-800 ई० पू० के निकट रखा जाता है। इन ग्रंथों में ऐसे विवरण नहीं हैं जिन्हें
इतिहास की कोटि में रखा जा सकता है। किंतु तो भी इनसे इतिहास की सामग्री प्राप्त
हो सकती है। ये ग्रंथ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के हैं तो भी वे काल में लिखे
गए थे जब तांबे और कांसे का प्रयोग चल रहा था। होमर की रचनाओं के परवर्ती
अंशों में लोहे की भी चर्चा है। सामान्यतः ग्रंथों से पता चलता है कि लोगों की
जीविका मुख्यतः खेती और पशुपालन से चलती थी। ग्रंथों और सजातीय शब्दों से
आर्य संस्कृति के प्रमुख लक्षण जाने जाते हैं। आर्य जन शीतोष्ण जलवायु में रहते थे।
वे घोड़े पालते थे जिनका प्रयोग छकड़ा चलाने और सवारी करने दोनों में होता था।
कुछ ग्रंथों से पता चलता है कि वे छकड़ में आरे वाली पहियों का इस्तेमाल करते
थे। वे तीर-धनुष से लड़ते थे और तीरों को तरकस में रखते थे। उनके समाज में
पुरुषकी प्रधानता थी। वे शव को गाड़ते थे, किंतु जलाते भी थे। ईरान और भारत में रहने
वाले हिंद यूरोपीय भाषाभाषी अग्नि पूजा करते थे और सोमरस का पान करते थे।
सभी हिंद-यूरोपीय समुदायों में पशुलि प्रचलित थी। पर आर्य संस्कृति की सबसे
प्रमुख विशेषता हिंद-यूरोपीय भाषा थी।

प्रश्न उठता है कि इन विशेषताओं को कहाँ और कब की पुरातात्त्विक संस्कृति
में खोजा जाए। जहाँ तक प्राचीन ग्रंथों में वर्णित आर्य संबंधी विषयवस्तु का संबंध
है, उसे उत्तर नवपाषाण युग तथा प्रारंभिक कांस्य युग में रखा जा सकता है। भूगोल
की दृष्टि से हम पूर्वी यूरोप एवं मध्य एशिया पर विचार कर सकते हैं क्योंकि इनका
भौगोलिक संबंध भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, अनातोलिया और 
यूनान से है। प्राचीन काल से ही इस विशाल क्षेत्र में विभिन्न समुदाय के लोग
हिंद-यूरोपीय भाषा बोलते थे। सजातीय शब्दों से जिस प्रकार के जलवायु, पशु-पक्षी
जगत और वृक्षों का पता चलता है उनके आधार पर हम यह कल्पना नहीं कर सकते
हैं कि प्रारंभिक आर्य जन गर्म क्षेत्रों में रहते थे। अतएव आर्य संस्कृति की खोज में
हमें पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के विशाल क्षेत्र को ध्यान में रखना है।

अश्व पालन और प्रसारण की प्रक्रिया

आर्य संस्कृति की पहचान में घोड़े का स्थान बहुत ऊँचा है। हिंद-यूरोपीयों के
प्रारंभिक जीवन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अश्व और इसके सजातीय शब्द
संस्कृत, अवेस्ता की भाषा, यूनानी, लैटिन और अन्य हिंद-यूरोपीय भाषाओं में मिलते
हैं। वेद और अवेस्ता की भाषा में बहुत-से व्यक्तियों के नाम अश्वकेंद्रित हैं। 1000
ईसा-पूर्व के पहले वैदिक काल में हमें इस प्रकार के पचास घोड़े वाले नाम मिलते
हैं और तीस रथ वाले। हिरोडोतस ने कुछ ईरानी जनजातियों के नाम बतलाए हैं जो
घोड़े के नाम पर हैं। उसी प्रकार 17वीं सहस्राब्दी ई० पू० में बेबिलोनिया पर हमला
करने वाले कस्सियों के नाम का संबंध भी घोड़े से है। विभिन्न रूपों में ऋग्वेद में
अश्व की चर्चा 215 बार है। किसी दूसरे जानवर की चर्चा इतनी बार नहीं है। गो की
चर्चा 176 बार है और वृषभ (बैल) की चर्चा 170 बार है। गो और वृषभ के बारंबार
उल्लेख से जीवनयापन के लिए पशुपालन की प्रधानता प्रतीत होती है। किंतु जहाँ तक
सामाजिक संरचना का प्रश्न है गोपालकों पर अश्वधारियों का वर्चस्व था। उल्लेखनीय
है कि ऋग्वेद पर मध्य एशियाई प्रभाव होने के कारण उष्णकटिबंध क्षेत्रों के कई
जानवरों की चर्चा नहीं है। इसमें बाघ और गैंडे के नाम नहीं मिलते हैं। गाय, बैल और
घोड़े के उल्लेखों की तुलना में सिंह, हाथी और भैंस की चर्चा बहुत कम हुई है।
ऋग्वेद के दो पूरे सूक्तों में घोड़े की प्रशंसा की गई है। लगभग सारे वैदिक
देवताओं का संबंध घोड़े से है और यह विशेषत: इंद्र और उनके साथी मरुतों पर लागू
होता है। यद्यपि वैदिक जन बहुधा प्रजा (संतति) और पशु के लिए प्रार्थना करते हैं,
तथापि वे स्पष्ट रूप से घोड़े की कामना करते हैं और कभी-कभी एक हजार घोड़े
माँगते हैं। अवेस्ता में पशु धन अधिक महत्त्व का दिखाई पड़ता है किंतु घोड़े का अपना
स्थान है। मिथ देवता की प्रार्थना में घोड़े और रथ के उल्लेख बार-बार आते हैं। सूर्य
के विषय में कहा जाता है कि उनके पास तेज़ चाल वाले घोड़े हैं। बहुत बाद भारत
की मूर्तिकला में सात रथ वाले सूर्य की प्रतिमा बहुत जगहों पर दिखाई पड़ती है।
अपाम् नपात् नामक दूसरे देवता को भी अवेस्ता में तेज घोड़े वाला बतलाया जाता
है। इस देवता का उल्लेख ऋग्वेद में भी है। ईरानी धर्म प्रवर्तक जरथुष्ट्र युवा राजा
विस्तास्प को आशीर्वाद देते हैं कि उसके पास अनेक घोड़े हों। वे देवताओं से 
प्रार्थना करते हैं कि युवा राजा को तेज घोड़े और शक्तिशाली सुपुत्र प्राप्त हों। यह भी ध्यान
रखने का विषय है कि विस्तास्प के नाम में ही केवल अस्प अर्थात् अश्व शब्द का
प्रयोग नहीं होता है, बल्कि यह शब्द कई और सरदारों और योद्धाओं के नाम में पाया
जाता है। ये नाम हैं: पोरसास्प (जरथुष्ट्र के पिता) करेसास्प, गुश्तास्प और ग़मास्प।
ईरान के शासक वर्ग के जीवन में घोड़ा ऐसा अभिन्न अंग बन गया था कि धार्मिक
अथवा अन्य अपराधों के लिए जिस कोड़े से अपराधियों को मारा जाता था वह
अस्फे-अस्त्र कहलाता था। गाथा को अवेस्ता का सबसे प्राचीनतम अंश माना जाता
है। पर अवेस्ता में इसके कुछ ही अंश पाए जाते हैं, और इनमें घोड़े के उल्लेख
अधिक नहीं हैं। किंतु सामान्यतया घोड़े से अवस्ता का अच्छा परिचय है।
साथ-ही-साथ इसमें रथ में लगाने वाले गे और सवारी करने वाले घोड़े को उल्लेख
खारा तौर पर हैं।

घोड़े और घोड़े वाले रथ दोनों होमर की रचनाओं में समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
इक्वेरी पद वाला सरदार के घोड़े की देखरेख करता था और इस पद का नाम ओडिसी
में बार-बार आता है। अतएव वैदिक, ईरानी और यूनानी ग्रंथों से स्पष्ट है कि प्राचीन
हिंद-यूरोपीय भाषाभाषी घोड़े से भली-भांति परिचित थे। इसकी पुष्टि पश्चिमी
एशिया में दूसरी सहस्राब्दी ई० पू० के कुछ अभिलेखों से भी होती है।
अश्वपालन का प्राचीनतम पुरातात्त्विक साक्ष्य भारतीय महादेश से काफी दूरी पर
मिलता है। पश्चिम में नीपर नदी और पूरब में वोल्गा नदी के बीच पालतू घोड़ों की
सबसे बड़ी संख्या मिलती है। पुरातत्त्व बतलाता है कि घोड़ा पहले-पहल दक्षिण यूराल
क्षेत्र में 6000 ई० पू० के आसपास मिलता है। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद मेरिजा गिबुटस का
कहना है कि वोल्गा स्टेप के गड़ेरियों ने संभवतः पहले-पहल घोड़े को पालतू बनाया
था, यद्यपि उसी काल में घोड़े के अवशेष काला सागर के इलाके में भी मिलते हैं।
काला सागर को निकट होने के कारण घोड़ा चौधी सहस्राब्दी ईसा पूर्व अनालोलिया
में पाया जाता है। तीसरी सहसाब्दी ई० पू० आते-आते घोड़े काफी संख्या में साइबेरिया
में मिलते हैं। दक्षिणी-पूर्वी ईरान में तीसरी सहस्राब्दी ई० पू० के प्रारंभ में एलम की
लिपि में घोड़े का भाव-चित्र मिलता है। सुमेर की लिपि में भी इस प्रकार का
भाव-चित्र 2500 ई० पू० के आसपास मिलता है। किंतु पश्चिमी एशिया के जीवन
में चौथी सहस्राब्दी ई० पू० और तीसरी सहस्राब्दी ई० पू० के प्रथमार्द्ध में घोड़े की
कोई महत्त्व की भूमिका दिखायी नहीं पड़ती है। ऐसा लगता है कि तीसरी सहस्राब्दी
ई० पू० के अंत में घोड़े की जानकारी दक्षिणी-पूर्वी ईरान के स्याल्क-111 नामक
स्थान और दक्षिणी अफगानिस्तान के मुंडिगक नामक स्थान में भी थी। ऐसा लगता
पालतू होने के बाद भी घोड़े का व्यापक इस्तेमाल बहुत दिनों के बाद ही हुआ।
यद्यपि घोड़े की जानकारी छठी सहस्राब्दी ई० पू० में दक्षिण यूराल और काला सागर 
के बीच वाले क्षेत्र में हुई, इसका आम इस्तेमाल 2000 ई० पू० के आसपास आकर
हुआ। इसमें संदेह नहीं है कि प्रारंभिक अवस्था में आद्य-ईरानी और आद्य-वैदिक भाषा
के बोलने वाले लोग इसका व्यापक इस्तेमाल करते थे। इन्हीं के संपर्क में आने के
कारण अन्य कबीलों ने घोड़े को अपनाया। हत्तियों के अभिलेख में तथा हिब्रू,
अकाड्डी और कॉकेसी भाषाओं में जो घोड़े के लिए शब्द मिलते हैं उनका संबंध
अश्व से है। 19वीं शताब्दी ई० पू० के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी एशिया में घोड़े के प्रयोग
के अभिलेखीय साक्ष्य मिलते हैं। घोड़े पर सवार होकर लोग इराक की सीमा पर
हमला करते थे। इस संदर्भ में कस्सियों का उल्लेख नहीं है। यद्यपि उन्हीं के आगमन
के कारण 17वीं शताब्दी ई० पू० में इस क्षेत्र में घोड़े आए। बेबीलोनिया में जब
पहले-पहल घोड़ा आया तो वहाँ के लोग उसे पहाड़ी गधा के नाम से पुकारते थे।

युद्ध-रथ

हिंद-यूरोपीय रथ चलाने में घोड़ों का प्रयोग खूब करते थे और इस बात की जानकारी
वैदिक ग्रंथ अवेस्ता और होमर की रचनाओं से मिलती है। परवर्ती वैदिक ग्रंथों में
वर्णित वाजपेय यज्ञ में रथों की जिस दौड़ की चर्चा की गई है, वह दौड़ यूनान में भी 
प्रचलित थी और होमर ने इसका पूरा वर्णन किया है। आद्य हिंद-यूरोपीय भाषा
में रथ के लिए दो शब्द मिलते हैं। उनमें से प्रत्येक आधे दर्जन हिंद-यूरोपीय भाषाओं
में प्रचलित हैं। उसी प्रकार धुरी, जोत और नाभि के लिए जो सजातीय शब्द हैं वे
छह हिंद-यूरोपीय भाषाओं में पाए जाते हैं। कई हिंद-यूरोपीय भाषाओं में घोड़े पर
चढ़ने के लिए एक ही प्रकार की क्रिया मिलती है। उसी तरह हत्ती और संस्कृत में
रथ जोतने के लिए जिन शब्दों का व्यवहार होता है, वे एक प्रकार के हैं। आद्य
हिंद-यूरोपीय भाषा में पहिए के लिए दो अलग-अलग शब्द हैं। संभवत: दो में से एक
शब्द उनका अपना नहीं है। इसे व्यापार और दूसरे प्रकार के अन्य संपर्क के कारण
हिंद-यूरोपीयों ने पश्चिमी एशिया से सीखा। किंतु पहिया वाली गाड़ी स्टेपवासियों के
जीवन में इस तरह समा गई कि इसके लिए जो उधार लिया हुआ शब्द है, वह भी
कई हिंद-यूरोपीय भाषाओं में फैल गया। यह कहा जाता है कि चौथी सहस्राब्दी ई०
पू० में पश्चिम एशिया में चक्केवाला रथ का आरंभ हुआ, और उसी समय यह
दक्षिण रूस के स्टेपों में पहुँचा। दक्षिण रूस की खुदाइयों में 3000
ई० पू० से रथ होने का प्रमाण मिलता है। तीसरी सहस्राब्दी ई० पू० में दो या तीन
पहिएवाले रथ मिलते हैं। मितानी शासकों के नाम से पता चलता है कि 1400
ई० पू० के आसपास वे रथों का प्रयोग करते थे। बहुत-से ऐसे शब्द मिलते है,
"दौड़ते रथों का स्वामित्व", "रथों का सामना करना" और "बडे घोड़ों का
स्वामित्व"। हिंद-ईरानी उपाधि "रथ चालक" की भी चर्चा है। एक मितानी 
राजा का नाम दशरथ है जिसका अर्थ होता है दस रथों को रखनेवाला। 
भारत के बाहर काठ के पहिए मिलते हैं, किंतु 2000 ई० पू० तक साधारणत: उनमें आरे नहीं होते थे।
हड़प्पाई संदर्भ में मिट्टी के बने खिलौने में पहिए मिलते हैं, किंतु उनका
तिथि-निर्धारण ठीक से नहीं हो सकता है। ऐसा लगता है कि वे 2000 ई० पू० के
पहले के नहीं हैं।

आरे वाले पहिए

उत्तर-पूर्वी ईरान में स्थित हिसार नामक स्थान में और उत्तरी कॉकेसस क्षेत्र में 2300
ई० पू० के लगभग आरे वाले पहिए मिलते हैं। बेलना जैसे मुहर पर छह आरे वाले
हिए का रथ हिसार में मिला है और इसका समय 1800 ई० पू० है। यह कहा जाता
है कि 19वीं शताब्दी ई० पू० में हत्ती लोगों ने अनातोलिया जीतने के लिए ऐसे रथों
का इस्तेमाल किया जिनमें आरे वाले पहिए थे। आगे बतलाया जायेगा कि ऐसे रथ
पश्चिमी कज़खस्तान के बगल में दक्षिण यूराल क्षेत्र में इसी समय के लगभग मिलते
हैं। 1500 ई० पू० आते-आते पूर्वी यूरोप और पश्चिमी एशिया के कई स्थानों में आरे
वाले पहिए मिलने लगते हैं।

हड़प्पा और मोहेंजोदड़ो में मिट्टी के बने खिलौने के चक्के में आरे नहीं मिलते
हैं। हरियाणा के हिसार जिले में अवस्थित बनावली नामक स्थान में हड़प्पाकालीन
आरे वाले पहियों के होने की बात कही जाती है। इस स्थान के उत्खनक आर० एस०
बिष्ट बतलाते हैं कि मिट्टी के पहिए पर कुछ लकीरें हैं जो आरे जैसे लगते हैं।
अतएव वास्तव में ये आरे नहीं माने जा सकते हैं। यह भी ध्यान रहे कि बनावली का
हड़प्पा चरण 2425-1250 ई० पू० तक रखा गया है। इस लंबे काल में आरे का
प्रयोग कब हुआ, यह भी नहीं बतलाया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि बिष्ट के
प्रकाशित लेखों में इन आरे वाले पहियों की चर्चा नहीं है। सूरज भान भी हिसार जिले
के मिथल स्थान में मिट्टी की छोटी चकती के ऐसे टुकड़े का उल्लेख करते हैं
जिसमें पाए गए लकीरों से आरे का बोध होता है। वे इस चकती का समय 1800
ईसा-पूर्व रखते हैं। किंतु उनकी पुस्तक में दिए गए प्लेट नं0-21 पर जो लकीरें
दिखलाई गई हैं वे अलंकरण जैसा दिखती हैं। जो भी हो, हिसार जिले के दोनों स्थानों
में आरे वाले चक्के तब मिलते हैं, जब परिपक्व हड़प्पाई संस्कृति का अंत हो गया
था। लगता है कि हिंद-आर्यों के संपर्क में आने के कारण 2000 ई० पू० के बाद
आरे वाले पहिए मिलने लगे।

दूसरी सहस्राब्दी ई० पू० में घोड़े के अवशेष दक्षिण मध्य एशिया, ईरान और
अफगानिस्तान में पाए जाते हैं। 1500 ई० पू० आते-आते घोड़े और रथ की आकृतियाँ
किरगिजिया, अल्ताई क्षेत्र, मंगोलिया, पामीर पहाड़ और सबसे बढ़कर तजिकिस्तान
में मिलती है। भारतीय उपमहादेश में घोड़े के अवशेष

तीसरी सहस्राब्दी ई० पू० वाले घोड़े के कुछ अवशेषों की उपमहादेश में होने की चर्चा
की जाती है, किंतु ये सभी संदेहास्पर लगते हैं। रिचर्ड मिडो नामक अमेरिकी
पुरातत्त्वविद् ने अवशेषों का ठीक से अध्ययन किया है और उनके अनुसार 2000 ई०
पू० तक उपमहादेश में घोड़े की हड्डियों के मिलने का स्पष्ट प्रमाण नहीं है। उनका
कहना है कि बलूचिस्तान के कोची मैदान में अवस्थित पिराक में सच्चे घोड़े के
मिलने का प्राचीनतम साक्ष्य मिलता है। जिम जे० शैफर का भी यही विचार है, और
उनके अनुसार पिराक I-II की तिथि 2000 से 1300 ई० पू० तक पड़ती है।
घुड़सवारों की मिट्टी की बनी आकृतियाँ पिराक में पाई गई हैं, और उनका समय
1800 से 1300 ई० पू० तक है। घोड़े के अवशेष और उसके साज-बाज स्वात घाटी
में अवस्थित गंधार संस्कृति में 1400 ई० पू० और उसके बाद मिलते हैं। पिराक,
गोमल घाटी और स्वात घाटी में घोड़े के आगमन का संबंध इसके प्रसार से है।
हड़प्पाई और चित्रित धूसर भांड संस्कृतियों का सम्मिश्रण हरियाणा के भगवानपुरा
स्थल में मिलता है जहाँ घोड़े की हड्डियाँ पाई गई हैं। जिन स्तरों में हड्डियाँ पाई
गई हैं उनका समय 1400-1000 ई० पू० है। संभवत: सुरकोटदा में पाया गया घोड़ा
पिराकी घोड़े का समकालीन था। नगरोत्तर हड़प्पाई चरण में मोहेंजोदड़ो, हड़प्पा,
लोथल और रोपड़ में घोड़ा मिलता है। इधर हड़प्पा की खुदाई 1980 से 1993 तक
हुई और धोलावीरा की भी खुदाई चल रही है, पर कहीं भी घोड़े के अवशेष मिलने
की खबर नहीं है। इसी प्रकार हड़प्पा के नगरीय चरण में आरे वाले पहिए भी नहीं
मिलते हैं। यह ध्यान रहे कि हड़प्पा की बाद वाली संस्कृतियों में अथवा गैर-हड़प्पाई
संस्कृतियों में घोड़े का महत्त्व था, जैसे गोमल और स्वात की घाटियाँ तथा धूसर
भांड वाले स्थान। हस्तिनापुर के चित्रित धूसर भांड वाले स्तर में घोड़े की हड्डियाँ
लगभग 500 ई० पू० में मिलती हैं, और इसी भांड वाले स्तरों में उत्तर भारत के कई
अन्य स्थानों पर भी मिट्टी के घोड़े मिलते हैं।

दाह-संस्कार

घोड़े के व्यवहार के साथ-साथ दाह-संस्कार भी आर्य संस्कृति की विशेषता बन गई।
वैदिक, अवेस्ताई और होमर वाले साहित्य में इस प्रथा की चर्चा है। यह प्रथा परिपक्व
हड़प्पाई संस्कृति में नहीं पाई जाती है। हड़प्पाई लोग मुर्दो को जमीन में गाड़ते थे।
फिर इसमें बहुत बदलाव आया। यह बदलाव 1500 ई० पू० के आसपास हड़प्पा
स्थित सिमेंटरी-एच के पाए गए बरतन में मुर्दे को रखकर गाड़ने की प्रथा से प्रारंभ होता
है। कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें समाधियों में जली हुई हड्डियाँ मिलती हैं। पहले
लोग सोचते थे कि सिमेंटरी-एच की संस्कृति केवल हड्प्पा तक सीमित थी, 
किंतु अब 72 ऐसे स्थल हैं जहाँ सिमेटरी-एच वाली सामग्नियाँ पाई जाती हैं। सर मार्टिमर हवीलर
सिमंटरी-एच वाली संस्कृति को हड़प्पोत्तर काल में रखते हैं। विद्वान आमतौर पर स्वीकार
करते हैं कि सिमेटरी-एच प्रथा से नए लोगों के आगमन की सूचना मिलती है।

दाहोपरांत समाधि बनाने की प्रथा गुजरात की हड़प्पाई संस्कृति में मिलती है, किंतु
इस प्रथा का तिथि निर्धारण कठिन है। सुरकोटदा का साक्ष्य संदेहास्पद है। अधिक-
से-अधिक हम उस प्रथा को 2000 ई० पू० से पहले नहीं रख सकते हैं, और इसी समय
से हड़प्पा के नगरोत्तर चरण का प्रारंभ होता है। संभवत: इस प्रथा का प्रारंभ उपमहादेश
में बाहरी संपर्क के कारण हुआ। यह ठीक है कि हड़प्पाई संस्कृति में चिड़ियों और
जानवरों की हड्डियाँ जलाकर गाड़ी जाती थीं, किंतु इसके आधार पर यह नहीं कहा
जा सकता है कि मनुष्य का शरीर भी जलाया जाता था जैसा कुछ लोगों का विचार है।

दाह-संस्कार की प्रथा पाँचवी सहस्राब्दी ई० पू० में प्रारंभ हुई। 5000-4000
ई० पू० में इसके उदाहरण पोलैंड, जर्मनी, पूर्वी यूरोप, इराक और उत्तरी मध्य एशिया
के कजखस्तान में मिलते हैं। किंतु अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि घोड़े पालने
वाले लोगों ने कब और कहाँ दाह-संस्कार की प्रथा को उपनाया। जो भी हो, इसमें
संदेह नहीं कि 1500 ई० पू० आते-आते यह प्रथा यूरोप एवं एशिया दोनों में चल
गई और यह पूर्वी मध्य एशिया के चीनी भाग में पहुंच गई। भारतीय उपमहादेश में।
घोड़े पालनेवालों ने पहले-पहल स्वात की घाटी में इस प्रथा की शुरुआत की। बाहरी
संपर्क के कारण कुछ हड़प्पाई लोगों ने भी इसे अपनाया होगा, पर इसका स्पष्ट प्रमाण
अभी तक नहीं मिला है। यह भी ध्यान रहे कि स्वात की घाटी से 500 कि० मी०
की दूरी पर दक्षिण एशिया के तजिकिस्तान देश में यह प्रथा 1400 ई० पू० के लगभग
पाई जाती है।

अग्नि-पूजा

अग्नि-पूजा हिंद-आर्यों और हिंद-ईरानियों की विशेषता मानी जाती है। ऋग्वेद में वेदि
की चर्चा है और जेंद-अवेस्ता में अग्नि-पूजा को बहुत महत्त्व दिया गया है। कुछ लोग
अग्नि - पूजा को हड़प्पाई मानते हैं, किंतु जो 'अग्नि-वेदियाँ' गुजरात के लोथल नामक
स्थान और राजस्थान के कालीबंगा में पाई गई हैं उनके उत्खनक भी उन्हें सच्ची
वेदियाँ नहीं मानते हैं। एस० आर० राव के विचार में लोथल की वेदियाँ चूल्हे हो
सकती हैं। कालीबंगा में आग रखने की जगह को बी० बी० लाल वेदि इसलिए बतलाते
हैं क्योंकि इसके लिए कोई और समुचित शब्द उन्हें नहीं मिलता है। जो भी हो, इतना
तो स्पष्ट है कि हड़प्पाई संदर्भ में जिस प्रकार की वेदिकाएँ मिली हैं उनका वर्णन
न तो प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और न ही उनकी आकृति प्राचीन परंपराओं के अनुरूप
है। अग्नि-पूजा प्राचीन काल में अनेक समाजों में होती होगी और इसमें सैंधव 
सभ्यता को शामिल किया जा सकता है। लेकिन यह स्थापित नहीं किया जा
सकता कि हड़प्पा की वेदिकाओं का रूप वैदिक वेदियों जैसा है। यह उल्लेखनीय
है कि दक्षिण यूक्रेन में 4000-3500 ई० पू० में कुछ ऐसे अग्नि-स्थल मिले हैं जिनसे
अग्नि-पूजा होने का तो अनुमान होता है, पर उन्हें वैदिक अग्नि-वेदी की संज्ञा दी
जा सकती है।

पशु-बलि

पशु-बलि आर्य संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान था, किंतु इस तरह से यह पशुचारी
जनजातीय समाज में हर जगह पाई जाती है। अतएव इससे कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं
निकाला जा सकता है। प्राचीनतम पशुपालक दूध और इससे बनी चीजों को पाने के
लिए गाय नहीं पालते थे। द्रविड भाषाभाषी गोंड जनजाति के एक समुदाय का अभी
भी यह विश्वास है कि दूध पर वास्तव में बछड़े का हक बनता है, अतएव प्राचीन
पशुपालक गाय और अन्य पशुओं को मांस खाने के लिए पालते थे, दूध पीने के लिए
नहीं। ऐसा लगता है कि मांसाहारी भोजन प्राप्त करने के लिए पशु-बलि की अनुष्ठान
का विकास किया गया। यूक्रेन और दक्षिण रूस के कब्रों में चौथी और तीसरी
सहस्राब्दी ईसा-पूर्व के श्राद्धकर्म में पशु-बलि के अनेक उदाहरण मिलते हैं। दक्षिण
मध्य एशिया में दूसरी सहस्राब्दी ईसा-पूर्व और उसके बाद भी इसी तरह के उदाहरण
मिलते हैं। ऐसा लगता है कि लागों के जीवनकाल में पशु-बलि प्रचलित थी।
मरणोपरांत भी यह अनुष्ठान इसलिए किया जाता था कि मृतकों को परलोक में भोजन
मिलता रहे।

वैदिक समाज में अवश्मेध का विशिष्ट स्थान था। किंतु वेदों के फ्रांसीसी विद्वान
लुई नू का मानना है कि अवश्मेध हिंद-यूरोपीय अनुष्ठान था। यह प्रथा प्राचीन रोम
और मध्यकालीन आयरलैंड में प्रचलित थी। अश्व-बलि संबंधी प्राचीनतम पुरातात्त्विक
प्रमाण उसी प्रकार का है जैसा पशु-बलि के संबंध में है। यूक्रेन और दक्षिण रूस के
अनेक कब्रगाहों में एक से अधिक घोड़े की बलि का उदाहरण है। इस प्रथा का जन्म
पाँचवी सहस्राब्दी ईसा-पूर्व कं परवर्ती भाग में हुआ। बाद की सदियों में यह काफी
फैल गई और मध्य एशिया में मध्यकाल तक चलती रही। भारत में वैदिक युग में
इसे अवश्मेध का रूप दिया गया जिसका वर्णन परवर्ती वैदिक ग्रंथों में विस्तार से है।
उपमहादेश में प्राक्-वैदिक काल में भी शायद पशु-बलि होती होगी। किंतु अभी तक
इसका पुरातात्त्विक साक्ष्य नहीं प्राप्त हुआ है। चूंकि 18वीं शताब्दी ई० पू० तक भारत
में घोड़े के मिलने का पक्का प्रमाण नहीं है, इसलिए इसकी बलि का प्रश्न ही नहीं उठता
है। पूर्व मध्यकालीन भारत में शक्ति के विभिन्न रूपों की पूजा में भैंसे का बलिदान बड़ा
अनुष्ठान बन गया। परंतु यह जानवर पूर्वी यूरोप एवं मध्य एशिया में शायद ही मिलता था, 
और इसलिए उन क्षेत्रों में भैंसे के मारने का अनुष्ठान प्रचलित नहीं था।

सोमपान की प्रथा

सोमपान की प्रथा केवल ईरानी और वैदिक जनों में प्रचलित थी; "स" का "ह" में
बदल जाने के कारण अवेस्ता में सोम के बदले होम शब्द का प्रयोग होता है। सोम
के पौधे की पहचान पर बहुत दिनों से विवाद चल रहा है। किंतु अब इफेड्रा नामक
पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते हैं। इपेड्रा की छोटी-छोटी टहनियाँ बरतनों
में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर के परिसर में पाए गए हैं।
इन बरतनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस पहचान की
मान्यता बढ़ रही है, तो भी निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है।

स्वस्तिक

स्वस्तिक  आर्यत्व का चिह्न माना जाता है। जब जर्मनी में नात्सियों ने इसे
विशुद्ध आर्यत्व का प्रतीक घोषित किया तो इसका विश्वव्यापी महत्त्व हो गया। वैदिक
साहित्य में स्वस्तिक की चर्चा नहीं है। यह शब्द ईसवी सन् की प्रारंभिक शताब्दियों
के ग्रंथों में मिलता है, जबकि धार्मिक कला में इसका प्रयोग शुभ माना जाता है। किंतु
ओरेल स्टाइन का मत है कि यह प्रतीक पहले-पहल बलूचिस्तान स्थित शाही टुम्प
की धूसर भांडवाली संस्कृति में मिलता है जिसे हड़प्पा से पहले का जाना जाता है
और जिसका संबंध दक्षिण ईरान की संस्कृति से स्थापित किया जाता है। स्टाइन की
दृष्टि में स्वस्तिक का प्रतीक अनोखा है क्योंकि ऐसा प्रतीक भारतीय और पश्चिमी
एशिया के संस्कृतियों में नहीं मिलता है। किंतु अरनेस्ट मैके के अनुसार यह सबसे
पहले एलम अर्थात् आर्य-पूर्व दक्षिण ईरान में प्रकट होता है। स्वस्तिक वाले ठप्पे हड़प्पाई
संस्कृति में और अल्तीन-टेपे में पाए गए हैं और उनका समय 2300-2000 ई० पू०
है। शाही टुम्प में स्वस्तिक प्रतीक का प्रयोग श्राद्ध वाले बरतनों पर होता था,
ई० पू० के लगभग दक्षिण ताजिकिस्तान मे जो कब्रगाह मिले हैं उनमें
कब्र की जगह पर इस प्रकार का चिह्न मिलता है।

800 ई० पू० के आसपास अलंकरण के रूप में प्रतीक धूसर चित्रित भाडों पर
मिलता है जो घरेलू काम में लगाए जाते थे। इसलिए स्वस्तिक को प्राक्-वैदिक और
प्राक्-हड़प्पाई कहा जा सकता है। ऐसा लगता है कि यह एलम से चलकर
बलूचिस्तान, सिंधु घाटी और तुर्कमेनिस्तान में पहुंचा। संभवतः यह तुर्कमेनिस्तान से
तजिकिस्तान गया। मौर्य और मौर्योत्तर कला में इसका कैसे प्रयोग हुआ, इस विषय की
छानबीन की जानी चाहिए  भाषा और अभिलेख

हिंद-यूरोपीय भाषा आर्य संस्कृति की प्रमुखतम विशेषता मानी जाती है। भाषाशास्त्रियों
ने आद्य हिंद-यूरोपीय भाषा का रूप तैयार किया है। उनके अनुसार इसका प्रारंभ
सातवीं अथवा छठी सहस्राब्दी ई० पू० में हुआ। हिंद-यूरोपीय भाषा पूर्वी एवं पश्चिमी
शाखाओं में बाँटी जाती है, और लगभग 4500 ई० पू० से पूर्वी शाखा के उच्चारण
संबंधी विकास में कई चरण बतलाए जाते हैं। इस शाखा की भाषा को आद्य
हिंद-ईरानी भाषा कहा जाता है। किंतु अभिलेखीय साक्ष्य की दृष्टि से आद्य
हिंद-ईरानी भाषा, जिसमें हिंद-आर्य भाषा भी सम्मिलित है, 2300 ई० पू० के पहले
नहीं मिलती है। इस भाषा के प्राचीनतम उदाहरण इराक के अगेड वंश के पाटिया पर
लिखे मिलते हैं। उसमें अरिसेन और सोमसेन नामक दो नाम मिलते हैं और हंगरी के
भाषाशास्त्री जे० हरमट्टा ने इनका समय 2300-2100 ई० पू० के लगभग रखा है।
अनातोलिया के हत्ती अभिलेख बतलाते हैं कि वहाँ हिंद-यूरोपीय भाषा की पश्चिमी
शाखा के बोलनेवाले 19वीं से 17वीं शताब्दी ई० पू० के बीच मौजूद थे। पूर्वी शाखा
के बोलनेवाले की उपस्थिति मेसोपोटामिया में 16वीं से 14वीं शताब्दी ई० पू० तक
कस्सियों और मितानियों के अभिलेख से सिद्ध होती है। पर भारतवर्ष में इस प्रकार
के अभिलेख नहीं मिलते हैं। अतएव अभिलेखों के अभाव में यह कहना कि
हिंद-आर्य भाषा बोलनेवाले लोग भारत से मेसोपोटामिया गए, अनर्गल लगता है।
हरमट्टा का यह विचार है कि आद्य हिंद-ईरानी भाषा में कॉकेसस क्षेत्र की भाषाओं
से शब्द उधार लिए गए हैं, और साथ-ही-साथ फीनिश उग्राइक भाषाओं के शब्द
भी लिए गए हैं। इससे पता चलता है कि हिंद-ईरानी भाषा का विकास पश्चिम में
फीनलैंड और पूरब में कॉकेसस क्षेत्र के बीच कहीं पर हुआ।

प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् गॉर्डन चाइल्ड ने पहले यह विचार रखा था कि अनातोलिया
हिंद-यूरोपीयों का उद्गम स्थान है। कछ रूसी भाषाशास्त्री भी इसी प्रकार का मत प्रकट
करते हैं। उनके अनुसार हिंद-यूरोपीय भाषा का मूल स्थान कॉकेसस के दक्षिण वाले
क्षेत्र में हो सकता है। इस क्षेत्र में पूर्वी अनातोलिया और उत्तरी मेसोपोटामिया पड़ते हैं।
यद्यपि अनातोलिया घोड़े वाले काला सागर क्षेत्र के निकट है, तथापि यहाँ छठी-पाँचवी
सहस्राब्दी ई० पू० में न तो घोड़े मिलते हैं और न हिंद-यूरोपीय संस्कृति के कोई अन्य
तत्त्व। रूसी भाषाशास्त्रियों के निष्कर्ष से ब्रिटिश पुरातत्त्वविद् रेनफ्रू की इस परिकल्पना
को बल मिलता है कि पूर्वी अनातोलिया आर्यों का मूल निवास स्थान था। उनके अनुसार
वहाँ पहले-पहल खेती का प्रारंभ सातवीं सहस्राब्दी ई० पू० में हुआ और इसके फैलने
से हिंद-यूरोपीय भाषा विभिन्न दिशाओं में फैली। किंतु हम जानते हैं कि प्रारंभिक
नतुफियन अर्थात् फिलिस्तीन के इलाके में 10,000 ई० पू० के आसपास अनाज पैदा 
किए जाने लगे और 7000 ई० पू० के लगभग फिलिस्तीन में जमकर खेती होने लगी।
सातवीं और छठी सहस्राब्दी ईसा-पूर्व में खेती इराक, ईरान और पाकिस्तानी बलूचिस्तान
में भी मिलती है। अतएव कृषि का उदय केवल पूर्वी अनातोलिया ही में नहीं हुआ। यह
भी याद रहे कि हिंद-यूरोपीय भाषा के सबसे पुराने बोलनेवालों के जीवन में खेती का
कोई बड़ा स्थान नहीं था। संकेत मिलता है कि जहाँ-जहाँ हिंद-यूरोपीय गए वहाँ की
खेती की पद्धति उन्होंने अपनाई। यह भी सोचने की बात है कि अपने उद्गम स्थान से
आर्य भाषा क्यों लुप्त हो गई। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रेनफ्रू विकल्प के रूप
में मध्य एशिया को भी आर्यों का उद्गम स्थान बतलाते हैं। प्रसारवादी पुरातत्त्वविद् नहीं
होने पर भी वे आर्य समस्या की व्याख्या प्रसारवादी सिद्धांत के आधार पर करते हैं।

मध्य एशिया से प्रसारण

मध्य एशिया से मानव प्रसारण की पुष्टि जीवविज्ञानियों के हाल के शोध से होती है।
मानव शरीर की रक्त कोशिकाओं (cells) में उत्पत्ति संबंधी संकेतों की खोज हुई
है। इन्हें DNA का नाम दिया जाता है। उत्पत्ति संबंधी संकेत आनुवंशिक होते हैं, और
वे पुश्त-दर-पुश्त चलते रहते हैं। विज्ञानियों के अनुसार कुछ खास तरह के संकेत
मध्य एशिया के एक छोर से दूसरी छोर तक 8000 ई० पू० के आसपास मिलते हैं।
इन उत्पत्ति संबंधी संकेतों का नाम M17 दिया गया है, और ये मध्य एशिया के 40%
से अधिक लोगों में मिलते हैं। खोजने, पर दिल्ली के 35% से अधिक हिंदी
भाषाभाषियों में M17 मिला है, पर द्रविड भाषाभाषियों के केवल 10% आबादी में
मिला है। इससे स्पष्ट है कि हिंद-आर्य भाषाभाषी मध्य एशिया से भारत पहुंचे।
जीवविज्ञानी हिंद-आर्य भाषाभाषियों के मध्य एशिया से भारत पहुँचने का समय 8000
ई० पू० के बाद रखते हैं, पर कोई तिथि निश्चित नहीं करते हैं। पुरातात्त्विकों के
अनुसार यह समय 2000 ई० पू० से आरंभ होता है। भाषाविज्ञानी भी हिंद-आर्य
भाषियों का भारत प्रवेश इसी समय के लगभग रखते हैं।
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