मौर्य कला की प्रमुख विशेषताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करें तथा इसके बौद्ध धर्म से संबंधों को स्पष्ट करें।
Q. मौर्य कला की प्रमुख विशेषताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करें तथा इसके बौद्ध धर्म से संबंधों को स्पष्ट करें।
Ans - प्राचीन भारतीय इतिहास में मौर्य काल केवल राजनीतिक एकीकरण का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और कलात्मक उत्कृष्टताओं के एक नए युग के सूत्रपात का काल था। इसी काल में भारतीय कला पहली बार लकड़ी और मिट्टी जैसी विनाशी सामग्रियों से निकलकर चिरस्थायी पाषाण (पत्थर) के रूप में परिणत हुई। कला इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार, मौर्य कला में भारतीय प्रतिभा ने अपनी पहली स्पष्ट और परिपक्व अभिव्यक्ति पाई। इसका केंद्र मूल रूप से आधुनिक बिहार (मगध) रहा है, जहाँ से कला की यह धारा संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवाहित हुई।
मौर्य कला का वर्गीकरण एवं प्रमुख विशेषताएं
मौर्य कला को इसके स्वरूप और संरक्षण के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है: राजकीय (दरबारी) कला और लोक (जनसाधारण) कला।
राजकीय कला (Court Art)
राजकीय संरक्षण में विकसित इस कला का उद्देश्य साम्राज्य की शक्ति और शासक के आदर्शों का प्रदर्शन करना था।
राजप्रसाद (Palaces): चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्मित पाटलिपुत्र का राजमहल मौर्य वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। वर्तमान पटना के कुम्रहार में इसके 84 स्तंभों वाले विशाल कक्ष के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने इसकी भव्यता की तुलना सूसा और एकबताना के राजमहलों से की थी।
एकाश्मक स्तंभ (Monolithic Pillars): अशोक के काल में निर्मित ये स्तंभ मौर्य कला के सर्वोत्कृष्ट नमूने हैं। चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित ये स्तंभ एकाश्मक (एक ही पत्थर से तराशे गए) हैं। इन पर शीशे जैसी चमकदार पॉलिश (ओप) है, जो आज भी विस्मयकारी है। बिहार के चंपारण में स्थित लौरिया नंदनगढ़, लौरिया अरेराज और रामपुरवा के स्तंभ इसके प्रमुख प्रमाण हैं।
स्तूप वास्तुकला: बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए स्तूपों के निर्माण को राजकीय प्रश्रय मिला। अशोक ने अपने शासनकाल में 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया, जिनमें सांची और सारनाथ के स्तूपों का मूल स्वरूप मौर्यकालीन ही है।
गुहा वास्तुकला (Cave Architecture): चट्टानों को काटकर रहने योग्य गुफाएं बनाने की शुरुआत इसी काल में हुई। बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर और नागार्जुनी की पहाड़ियों में अशोक और उसके पौत्र दशरथ द्वारा आजीवक संप्रदाय के भिक्षुओं के लिए 'सुदामा' और 'लोमश ऋषि' जैसी गुफाओं का निर्माण करवाया गया।
लोक कला (Folk Art)
यह कला आम जनमानस की मान्यताओं और जीवन शैली को दर्शाती है, जो स्वतंत्र कलाकारों द्वारा विकसित की गई।
यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियां: स्वतंत्र रूप से तराशी गई पाषाण मूर्तियां मौर्यकालीन लोक कला का शिखर हैं। पटना के दीदारगंज से प्राप्त चंवरधारिणी यक्षिणी की मूर्ति (वर्तमान में पटना संग्रहालय में सुरक्षित) अपनी शारीरिक सौष्ठव और चमकदार पॉलिश के लिए विश्वविख्यात है।
मृदभांड (Pottery): इस काल के बर्तन उत्तरी काले पॉलिश वाले मृदभांड (NBPW) कहलाते हैं, जो अपनी धात्विक चमक और बारीकी के लिए प्रसिद्ध हैं।
मौर्य कला का आलोचनात्मक परीक्षण
मौर्य कला, विशेषकर अशोक के स्तंभों को लेकर कई यूरोपीय विद्वानों (जैसे जॉन मार्शल और पर्सी ब्राउन) ने यह मत प्रस्तुत किया कि यह ईरानी (अचमेनिद) कला से प्रभावित या उसकी नकल है। इस दृष्टिकोण का आलोचनात्मक विश्लेषण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है:
निर्माण शैली में भिन्नता: ईरानी स्तंभ कई पत्थरों के टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए थे, जबकि अशोक के स्तंभ एकाश्मक (एक ही पाषाण खंड से निर्मित) हैं।
स्थापत्य का उद्देश्य: ईरानी स्तंभ विशाल महलों का हिस्सा थे, जबकि अशोक के स्तंभ खुले आसमान के नीचे, स्वतंत्र रूप से धम्म के प्रचार के लिए स्थापित किए गए थे।
शीर्ष पशु आकृतियां: ईरानी स्तंभों पर मानवीय या काल्पनिक आकृतियां अधिक हैं, जबकि मौर्य स्तंभों पर उकेरी गई पशु आकृतियां (सिंह, हाथी, वृषभ) पूरी तरह से भारतीय परिवेश और यथार्थवाद से प्रेरित हैं।
पॉलिश की तकनीक: यद्यपि कुछ विद्वान पॉलिश को विदेशी प्रभाव मानते हैं, लेकिन भारतीय ग्रंथों (जैसे महाभारत) में पाषाण पर लेप की स्वदेशी तकनीक का उल्लेख मिलता है, जो दीदारगंज की यक्षिणी जैसी लोक कलाओं में भी स्पष्ट दिखता है।
अतः मौर्य कला को महज विदेशी नकल मानना एक पूर्वाग्रह है। यह वास्तव में भारतीय शिल्पकारों की मौलिक रचना थी, जिसने आवश्यकतानुसार कुछ बाह्य प्रभावों को भारतीय सांचे में ढालकर ग्रहण किया।
मौर्य कला और बौद्ध धर्म का संबंध
अशोक के कलिंग युद्ध के पश्चात बौद्ध धर्म अपनाने के साथ ही मौर्य कला का उद्देश्य और स्वरूप गहरे रूप से बौद्ध दर्शन से जुड़ गया। कला एक सजावटी माध्यम से आगे बढ़कर धम्म के प्रचार और नैतिक जागरण का साधन बन गई।
स्तंभों पर धम्म का संदेश: अशोक के स्तंभों को साम्राज्य के प्रमुख व्यापारिक मार्गों और बौद्ध तीर्थ स्थलों (जैसे लुंबिनी, सारनाथ) पर स्थापित किया गया। इन पर उकेरे गए संदेश सीधे तौर पर बौद्ध धर्म की नैतिक आचार संहिता (अहिंसा, बड़ों का आदर, सहिष्णुता) से प्रेरित थे।
बौद्ध प्रतीकों का प्रचुर उपयोग: सारनाथ स्तंभ के शीर्ष पर चारों दिशाओं में गर्जना करते चार सिंह बुद्ध के धम्मचक्रप्रवर्तन (प्रथम उपदेश) के प्रतीक हैं। इसी प्रकार, नीचे बने चक्र (24 तीलियों वाले) बुद्ध के शाश्वत सत्य और जीवन चक्र को दर्शाते हैं।
पशुओं का प्रतीकात्मक अर्थ: स्तंभों और अन्य कलाकृतियों में प्रयुक्त पशुओं का सीधा संबंध बुद्ध के जीवन से है। धौली (ओडिशा) में चट्टान से निकलता हुआ हाथी बुद्ध के गर्भ में आने (मायावती का स्वप्न) का प्रतीक है, और वृषभ बुद्ध की युवावस्था का।
स्तूपों का महापरिनिर्वाण से जुड़ाव: स्तूप वास्तुकला पूरी तरह से बौद्ध धर्म के इर्द-गिर्द विकसित हुई। यह बुद्ध के महापरिनिर्वाण का स्थापत्य प्रतीक बन गया, जिसे पूजा और परिक्रमा का केंद्र बनाया गया।
सहिष्णुता का दर्शन: यद्यपि मौर्य कला पर बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव था, लेकिन बराबर की गुफाओं का आजीवक संप्रदाय को दान किया जाना यह प्रमाणित करता है कि कला के माध्यम से बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत—धार्मिक सहिष्णुता—को भी चरितार्थ किया गया।
भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती एक महान विरासत
मौर्य कला प्राचीन भारत की एक युगांतरकारी घटना थी जिसने अपनी तकनीकी पूर्णता, ओपदार पॉलिश और एकाश्मक पाषाण शिल्प से एक नया प्रतिमान स्थापित किया। इसने न केवल मगध साम्राज्य की शक्ति और अशोक के कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को भौतिक रूप दिया, बल्कि बौद्ध धर्म के शांति और अहिंसा के संदेश को विश्व पटल पर अंकित कर दिया। इसी कलात्मक नींव पर आगे चलकर शुंग, कुषाण और गुप्त काल में मथुरा तथा गांधार जैसी महान कला शैलियों का विकास हुआ। आधुनिक भारत द्वारा सारनाथ के सिंह शीर्ष को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मौर्य कला के आदर्श आज भी भारतीय गणराज्य की प्रशासनिक और नैतिक चेतना का मार्गदर्शन कर रहे हैं।