इजरायल-हमास संघर्ष का मध्य-पूर्व की स्थिरता और भारत के कूटनीतिक रुख पर प्रभाव की विवेचना करें।
Q. इजरायल-हमास संघर्ष का मध्य-पूर्व की स्थिरता और भारत के कूटनीतिक रुख पर प्रभाव की विवेचना करें।
Ans -
भूमिका
अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इज़रायल पर किए गए भीषण आक्रमण ('ऑपरेशन अल-अक्सा फ्लड') और उसके प्रत्युत्तर में इज़रायल द्वारा प्रारंभ किए गए 'ऑपरेशन आयरन स्वॉर्ड्स' ने मध्य-पूर्व (Middle East) के संपूर्ण भू-राजनीतिक परिदृश्य को अस्थिर कर दिया है। यह संघर्ष केवल गाज़ा पट्टी तक सीमित न रहकर, लेबनान, यमन और ईरान तक विस्तारित हो गया है। एक ओर जहाँ इस युद्ध ने दशकों पुराने अरब-इज़रायल शांति प्रयासों को गंभीर आघात पहुँचाया है, वहीं दूसरी ओर इसने भारत को अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और 'डि-हाइफेनेशन' (De-hyphenation) की विदेश नीति के सबसे जटिल परीक्षण के समक्ष खड़ा कर दिया है।
1. मध्य-पूर्व की स्थिरता पर प्रभाव
इस संघर्ष ने पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन और आर्थिक-सुरक्षा वास्तुकला (Economic-Security Architecture) को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है:
क. अरब-इज़रायल कूटनीतिक सामान्यीकरण पर आघात
वर्ष 2020 के 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) के माध्यम से इज़रायल और अरब राष्ट्रों (यूएई, बहरीन आदि) के मध्य जो शांति प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी, वह वर्तमान में अवरुद्ध हो गई है।
अमेरिका की मध्यस्थता में चल रही सऊदी अरब-इज़रायल शांति वार्ता अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गई है, जिससे क्षेत्रीय ध्रुवीकरण पुनः तीव्र हो गया है।
ख. लाल सागर (Red Sea) संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला
संघर्ष के विस्तार के परिणामस्वरूप यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) द्वारा लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य (Bab al-Mandab Strait) में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले किए जा रहे हैं।
चूँकि वैश्विक व्यापार का लगभग 12% इसी मार्ग से होता है, इसलिए माल ढुलाई (Freight) लागत में तीव्र वृद्धि हुई है, जिसने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है।
ग. मानवीय संकट और 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' की सक्रियता
गाज़ा में उत्पन्न गंभीर मानवीय संकट ने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
ईरान समर्थित 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' (Axis of Resistance)—जिसमें लेबनान का हिजबुल्लाह और यमन के हूती शामिल हैं—की सक्रियता ने इसे एक बहु-मोर्चीय क्षेत्रीय युद्ध (Multi-front Regional War) में परिवर्तित कर दिया है।
2. भारत के कूटनीतिक रुख पर प्रभाव: यथार्थवाद और संतुलन
भारत ने इस संघर्ष में अत्यधिक संतुलित, परिपक्व और सिद्धांत-आधारित कूटनीति का प्रदर्शन किया है, जो उसके राष्ट्रीय हितों और मानवीय मूल्यों दोनों को साधता है:
क. आतंकवाद पर 'जीरो टॉलरेंस'
संघर्ष के आरंभ में ही भारत ने 7 अक्टूबर के हमास के हमलों की स्पष्ट निंदा की। यह भारत की आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक मंचों पर शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति के पूर्णतः अनुरूप था।
ख. द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-State Solution) का निरंतर समर्थन
आतंकवाद की निंदा के साथ ही, भारत ने फ़िलिस्तीनी कारण (Palestinian Cause) के प्रति अपने ऐतिहासिक समर्थन को दोहराया।
भारत ने स्पष्ट किया कि स्थायी शांति केवल प्रत्यक्ष वार्ता और एक संप्रभु, स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राज्य की स्थापना के माध्यम से ही संभव है, जो इज़रायल के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहे।
ग. कूटनीतिक 'डि-हाइफेनेशन' का सफल क्रियान्वयन
भारत ने इज़रायल के साथ अपने रणनीतिक, रक्षा एवं कृषि संबंधों को फ़िलिस्तीन के साथ अपने ऐतिहासिक व मानवीय संबंधों से अलग रखा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भारत के मतदान का पैटर्न—जहाँ उसने मानवीय संघर्ष विराम का समर्थन किया, वहीं आतंकवाद की निंदा न करने वाले प्रस्तावों से दूरी बनाई—इस स्वतंत्र विदेश नीति का उत्कृष्ट उदाहरण है।
घ. बहुपक्षीय आर्थिक पहलों (IMEC) पर प्रभाव
G-20 शिखर सम्मेलन में घोषित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जो भारत को मध्य-पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ने वाली एक रणनीतिक परियोजना है, इस अस्थिरता के कारण वर्तमान में ठंडे बस्ते में चली गई है। यह भारत की भू-आर्थिक आकांक्षाओं के लिए एक तात्कालिक चुनौती है।
3. पटना और बिहार के सभी ज़िलों पर पड़ने वाले आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव
वैश्वीकृत विश्व में मध्य-पूर्व की अस्थिरता का सीधा प्रभाव राज्य-स्तरीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। पटना और बिहार के सभी ज़िलों के विशेष संदर्भ में इस संघर्ष के निम्नलिखित प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं:
प्रवासी कामगार और प्रेषण (Remittances): खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, कतर) में पटना और बिहार के सभी ज़िलों से बड़ी संख्या में कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक कार्यरत हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता उनके रोजगार की सुरक्षा को खतरे में डालती है, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान देने वाले विदेशी प्रेषण (Remittances) में गिरावट की आशंका उत्पन्न होती है।
कृषि इनपुट लागत और मुद्रास्फीति: लाल सागर संकट के कारण पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है। चूँकि बिहार एक प्रमुख कृषि उत्पादक राज्य है, ईंधन (डीज़ल) और रासायनिक उर्वरकों (Urea, DAP) के आयात महंगे होने से कृषि की इनपुट लागत बढ़ जाती है, जो अंततः खाद्य मुद्रास्फीति को जन्म देती है।
कल्याणकारी योजनाओं पर राजकोषीय दबाव: उर्वरकों पर बढ़ती सब्सिडी का बोझ केंद्र सरकार पर पड़ता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर राज्यों को मिलने वाले वित्तीय आवंटन और स्थानीय विकासात्मक योजनाओं (जैसे- सात निश्चय योजना) की गति पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष एवं आगे की राह
इज़रायल-हमास संघर्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में 'तदर्थ शांति' (Ad-hoc Peace) टिकाऊ नहीं है। भारत का कूटनीतिक रुख इस बात का प्रमाण है कि जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भी नैतिक स्पष्टता और राष्ट्रीय हितों के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
आगे की राह (Way Forward):
मानवीय सहायता की निरंतरता: भारत को 'ऑपरेशन अजय' जैसी पहलों और फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी (UNRWA) के माध्यम से मानवीय सहायता जारी रखनी चाहिए।
सक्रिय मध्यस्थता: ग्लोबल साउथ की एक प्रमुख आवाज़ और G-20 के पूर्व अध्यक्ष के रूप में, भारत को क्षेत्रीय शक्तियों (जैसे मिस्र, जॉर्डन, कतर) के साथ मिलकर शांति वार्ता हेतु एक बहुपक्षीय मंच तैयार करने में कूटनीतिक पहल करनी चाहिए।
IMEC का पुनरुद्धार: युद्धविराम के पश्चात, क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए IMEC जैसी अवसंरचना परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
मध्य-पूर्व की स्थिरता केवल क्षेत्रीय विषय नहीं है, अपितु यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक प्रक्षेपवक्र और वैश्विक रणनीतिक पहलों के लिए एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है।