बिहार में प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं के विकास ने राष्ट्रीय चेतना जगाने में क्या भूमिका निभाई?

 Q. बिहार में प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं के विकास ने राष्ट्रीय चेतना जगाने में क्या भूमिका निभाई?

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बिहार में प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं का विकास एवं राष्ट्रीय चेतना के जागरण में उनकी भूमिका

प्रस्तावना

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रेस और पत्रकारिता ने एक शक्तिशाली वैचारिक अस्त्र के रूप में कार्य किया। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जनमत तैयार करने और बिखरे हुए असंतोष को एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन में परिवर्तित करने में इसकी भूमिका निर्विवाद है। बिहार के विशेष संदर्भ में, पत्र-पत्रिकाओं ने न केवल भाषाई और सांस्कृतिक अस्मिता को आकार दिया, बल्कि चंपारण के किसान संघर्ष से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक, जनता को वैचारिक रूप से उद्वेलित कर राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया।

बिहार में प्रेस का उद्भव और ऐतिहासिक विकास

बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में आधुनिक शिक्षा और बौद्धिक पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप हुई। इस विकास क्रम को निम्नलिखित प्रमुख चरणों में देखा जा सकता है:

  • प्रारंभिक अंग्रेजी पत्रकारिता: 1875 में गुरु प्रसाद सेन द्वारा स्थापित 'बिहार हेराल्ड' (The Bihar Herald) राज्य का पहला अंग्रेजी समाचार पत्र था। इसने शिक्षित मध्य वर्ग में राजनीतिक चेतना के बीज बोए।

  • हिंदी पत्रकारिता का उदय: बिहार में हिंदी पत्रकारिता की नींव 1872 में केशव राम भट्ट और मदन मोहन भट्ट द्वारा प्रकाशित 'बिहार बंधु' ने रखी। इसने भाषाई जागरण के साथ-साथ आम जनमानस में राष्ट्रवाद की भावना का संचार किया।

  • बिहार पृथक्करण आंदोलन और प्रेस: महेश नारायण और डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा संपादित 'द बिहारी' (The Beharee) ने बंगाल से अलग एक स्वतंत्र बिहार राज्य (1912) के निर्माण के लिए बौद्धिक आधार तैयार किया, जो आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में बिहार की सक्रिय भागीदारी का मार्ग बना।

  • राष्ट्रवादी पत्रकारिता का स्वर्ण काल: 1918 में सैयद हसन इमाम और मज़हरुल हक़ के सहयोग से स्थापित 'सर्चलाइट' (The Searchlight) अखबार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुखपत्र के रूप में कार्य किया। मुरली मनोहर प्रसाद के संपादन में इसने ब्रिटिश नीतियों की तीव्र आलोचना की।

राष्ट्रीय चेतना जगाने में प्रेस की बहुआयामी भूमिका (कारण एवं प्रभाव)

बिहार में विकसित हो रही पत्रकारिता केवल सूचना का साधन नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक शिक्षा का एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय बन गई थी।

1. औपनिवेशिक शोषण का पर्दाफाश (आर्थिक राष्ट्रवाद)

  • पत्र-पत्रिकाओं ने ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व नीतियों और आर्थिक दोहन की वास्तविकता को जनता के सामने रखा।

  • 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान, यद्यपि कानपुर से प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रताप' ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, किंतु स्थानीय प्रेस ने नीलहों (Indigo Planters) के अत्याचारों को लगातार उजागर कर गांधीजी के आंदोलन के लिए एक सुदृढ़ ज़मीन तैयार की।

2. जन-आंदोलनों का वैचारिक नेतृत्व और अखिल-प्रांतीय प्रसार

  • असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता था, तब समाचार पत्रों ने ही आंदोलन का मार्गदर्शन किया।

  • प्रेस और पर्चों का वितरण केवल राजधानी तक सीमित नहीं था; इसकी पहुँच का वास्तविक प्रभाव यह था कि इसने पटना और बिहार के सभी ज़िलों में एक समान राजनीतिक चेतना और संगठित प्रतिरोध की भावना का सफलतापूर्वक संचार किया।

3. कृषक और मज़दूर चेतना का विकास (Subaltern Awakening)

  • 1930 के दशक में जब किसान आंदोलन अपने चरम पर था, तब प्रेस ने किसानों की समस्याओं को स्वर दिया।

  • स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रकाशित 'हुंकार' और 'जनता' जैसे पत्रों ने बकाश्त भूमि आंदोलन और ज़मींदारी उन्मूलन के पक्ष में एक उग्र विमर्श खड़ा किया, जिसने शोषित वर्ग को सीधे राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ दिया।

4. सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार एवं महिला सशक्तिकरण

  • राजनीतिक चेतना के साथ-साथ इन पत्र-पत्रिकाओं ने सामाजिक सुधार (जैसे बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन और छुआछूत का विरोध) पर बल दिया।

  • महिलाओं की शिक्षा और समाज में उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाले लेखों ने समाज के एक बड़े वर्ग को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया।

ब्रिटिश दमन चक्र और प्रेस का संघर्ष

प्रेस की इस बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर औपनिवेशिक सरकार ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878), इंडियन प्रेस एक्ट (1910) और भारत रक्षा अधिनियम (Defence of India Act) जैसे कठोर कानून लागू किए। इसके बावजूद:

  • 'सर्चलाइट' और 'मदरलैंड' (मज़हरुल हक़ द्वारा स्थापित) जैसे समाचार पत्रों ने भारी जुर्माना और संपादकों की गिरफ्तारी के बाद भी अपना प्रकाशन और राष्ट्रवादी रुख जारी रखा।

  • सेंसरशिप से बचने के लिए भूमिगत पर्चों (Underground pamphlets) और गुप्त पत्रिकाओं का सहारा लिया गया, जिसने युवाओं में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को जन्म दिया।

निष्कर्ष

बिहार में प्रेस और पत्र-पत्रिकाओं का विकास मात्र मुद्रण तकनीक का विस्तार नहीं था, बल्कि यह एक गहरी मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक क्रांति थी। इसने एक मूक और शोषित जनता को एक मुखर लोकतांत्रिक शक्ति में परिवर्तित कर दिया। वर्तमान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) की जो सुदृढ़ आधारशिला हम आज देखते हैं, वह स्वतंत्रता पूर्व के इन्हीं निडर संपादकों और पत्रकारों के संघर्षों और बलिदानों की ऐतिहासिक देन है। आगे की राह में, स्वतंत्रता संग्राम कालीन पत्रकारिता के उन उच्च नैतिक आदर्शों और निर्भीकता को आधुनिक मीडिया के लिए एक पथ-प्रदर्शक के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि एक सशक्त और जवाबदेह लोकतंत्र का निर्माण निरंतर जारी रहे।

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