जलवायु परिवर्तन पर COP-28 के प्रमुख निर्णयों और भारत की 'पंचामृत' रणनीति की समीक्षा करें।

 Q. जलवायु परिवर्तन पर COP-28 के प्रमुख निर्णयों और भारत की 'पंचामृत' रणनीति की समीक्षा करें।

Ans - 

जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक संकल्प: COP-28 एवं भारत की रणनीति

भूमिका

वर्तमान युग में जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और मानव अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर चुनौती बन चुका है। इसी परिप्रेक्ष्य में, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के अंतर्गत दुबई (UAE) में आयोजित COP-28 एक ऐतिहासिक पड़ाव साबित हुआ, जहाँ जीवाश्म ईंधन से चरणबद्ध तरीके से दूरी बनाने पर वैश्विक सहमति बनी। इस वैश्विक विमर्श में भारत केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि 'पंचामृत' (Panchamrit) रणनीति और LiFE (Lifestyle for Environment) जैसी पहलों के माध्यम से 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के जलवायु नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरा है।

COP-28 के प्रमुख निर्णय: 'यूएई आम सहमति' (UAE Consensus)

COP-28 में लिए गए निर्णय वैश्विक जलवायु कूटनीति की दिशा तय करते हैं। इसके प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

  • जीवाश्म ईंधन से दूरी (Transitioning away from Fossil Fuels): यह पहला अवसर था जब किसी COP समझौते में जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा प्रणालियों को न्यायसंगत, व्यवस्थित और समान तरीके से दूर करने का स्पष्ट आह्वान किया गया।

  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तिगुना करना: वैश्विक स्तर पर वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना (Tripling) करने और ऊर्जा दक्षता सुधार दर को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

  • नुकसान और क्षति कोष (Loss and Damage Fund): जलवायु परिवर्तन के कारण सबसे अधिक प्रभावित होने वाले विकासशील और संवेदनशील देशों की सहायता हेतु इस कोष को आधिकारिक रूप से संचालित (Operationalize) किया गया।

  • ग्लोबल स्टॉकटेक (Global Stocktake - GST): पेरिस समझौते (2015) के लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में यह पहला आधिकारिक मूल्यांकन था। इसमें स्पष्ट किया गया कि 1.5°C के लक्ष्य को जीवित रखने के लिए वर्ष 2030 तक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 2019 के स्तर से 43% की कटौती आवश्यक है।

  • ग्लोबल ग्रीन क्रेडिट पहल: भारत के नेतृत्व में पर्यावरणीय संरक्षण के लिए स्वैच्छिक कार्यों को प्रोत्साहित करने हेतु इस पहल को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया गया।

भारत की 'पंचामृत' रणनीति: एक विश्लेषणात्मक समीक्षा

ग्लासगो (COP-26) में प्रस्तुत और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) के रूप में अद्यतन (Updated) की गई 'पंचामृत' रणनीति, जलवायु कार्रवाई के प्रति भारत की सर्वोच्च प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

लक्ष्य (Target)वर्तमान स्थिति एवं प्रभाव
500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता (2030 तक)भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार में तीव्र गति पकड़ी है। राष्ट्रीय सौर मिशन और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इस दिशा में प्रमुख आधार स्तंभ हैं।
50% ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय स्रोतों से (2030 तक)यह लक्ष्य ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा और कोयला आयात पर आर्थिक निर्भरता को कम करेगा।
1 अरब टन कार्बन उत्सर्जन में कटौती (2030 तक)यह 'बिजनेस-एज-यूजवल' (BAU) परिदृश्य की तुलना में उत्सर्जन को सीमित करेगा, जो औद्योगिक डी-कार्बोनाइजेशन पर केंद्रित है।
GDP की कार्बन तीव्रता में 45% की कमी (2005 के स्तर से 2030 तक)यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक विकास (GDP Growth) और कार्बन उत्सर्जन एक-दूसरे से अलग (Decoupled) हों।
वर्ष 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (Net Zero) का लक्ष्ययह दीर्घकालिक रणनीतिक विज़न है जो सतत विकास और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा प्रदान करता है।

जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति: भारत और बिहार के समन्वित प्रयास

पंचामृत और COP-28 के लक्ष्यों को धरातल पर उतारने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई बहुआयामी कदम उठाए जा रहे हैं:

  • राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास:

    • FAME योजना के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा।

    • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के माध्यम से वैश्विक संस्थागत नेतृत्व।

    • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारी उद्योगों (इस्पात, उर्वरक) को डी-कार्बोनाइज करना।

  • बिहार के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता (Bihar Context):

    • जल-जीवन-हरियाली अभियान: बिहार सरकार की यह प्रमुख पहल सीधे तौर पर जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) और कार्बन सिंक (Carbon Sink) बढ़ाने से जुड़ी है।

    • इथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति (2021): बिहार देश के प्रमुख इथेनॉल उत्पादक राज्यों में उभर रहा है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने (Blending) में राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप है।

    • नवीकरणीय ऊर्जा का विकेंद्रीकरण: दरभंगा और सुपौल में स्थापित फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट्स (Floating Solar Power Plants) जल और भूमि संरक्षण के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का उत्कृष्ट मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

    • जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture): बिहार के सभी 38 जिलों में मौसम की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए कृषि प्रणालियों को वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ किया जा रहा है।

लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में प्रमुख चुनौतियाँ

  1. जलवायु वित्त (Climate Finance) का अभाव: 'नेट ज़ीरो' लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भारत को ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता है। विकसित देशों द्वारा प्रति वर्ष $100 बिलियन की प्रतिबद्धता का पूर्णतः न होना एक बड़ी बाधा है।

  2. प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण: बैटरी भंडारण क्षमता (Battery Storage), कार्बन कैप्चर (CCUS) और हरित हाइड्रोजन उत्पादन की उच्च लागत के कारण स्वदेशी तकनीकी विकास अभी भी चुनौतीपूर्ण है।

  3. 'जस्ट ट्रांजिशन' (Just Transition) की समस्या: कोयला क्षेत्र से भारत के लाखों लोगों का रोजगार जुड़ा है। ऊर्जा संक्रमण के दौरान इन समुदायों का पुनर्वास और वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित करना एक जटिल सामाजिक-आर्थिक चुनौती है।

  4. ग्रिड एकीकरण (Grid Integration): सौर और पवन ऊर्जा की परिवर्तनशील प्रकृति (Intermittency) को मुख्य पावर ग्रिड के साथ स्थिर रूप से जोड़ना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।

आगे की राह

भारत की जलवायु रणनीति आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय संतुलन का एक आदर्श मिश्रण है। भविष्य के लिए निम्नलिखित बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाए जाने चाहिए:

  • समान और विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR): भारत को बहुपक्षीय मंचों पर जलवायु न्याय (Climate Justice) की वकालत जारी रखनी चाहिए, ताकि विकसित देश ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए अपनी जिम्मेदारी लें।

  • हरित कराधान एवं ग्रीन बॉन्ड: घरेलू स्तर पर संप्रभु ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bonds) और कार्बन मूल्य निर्धारण (Carbon Pricing) तंत्र को अधिक सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए।

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): संसाधन दक्षता को बढ़ावा देने के लिए ई-कचरा, प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन को नीतिगत प्राथमिकता देनी होगी।

भारत का पंचामृत केवल एक कूटनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि एक नव-औद्योगिक हरित क्रांति का शंखनाद है। यदि वैश्विक वित्तीय और तकनीकी सहयोग प्राप्त होता है, तो भारत न केवल अपने 2070 के लक्ष्यों को समय से पूर्व प्राप्त कर सकता है, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक धारणीय विकास मॉडल भी स्थापित कर सकता है।


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