शॉर्ट नोट्सः ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen)।
Q. शॉर्ट नोट्सः ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen)।
Ans -
भूमिका
हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के वर्तमान दौर में एक अत्यंत स्वच्छ और धारणीय ऊर्जा स्रोत है। इसका उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे- सौर, पवन या जलविद्युत) का उपयोग करके जल के विद्युत अपघटन (Electrolysis) द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया में उप-उत्पाद (By-product) के रूप में केवल जलवाष्प उत्सर्जित होती है, जिसके परिणामस्वरूप कार्बन उत्सर्जन पूर्णतः शून्य रहता है।
जलवायु परिवर्तन के संकट को कम करने, ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और COP-26 (ग्लासगो) में घोषित 'पंचामृत' रणनीति के तहत वर्ष 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (Net Zero) उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत सरकार ने जनवरी 2023 में 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' (National Green Hydrogen Mission) का शुभारंभ किया है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: रणनीतिक महत्व एवं प्रभाव
इस मिशन के बहुआयामी प्रभावों और महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:
1. मिशन के प्रमुख लक्ष्य और स्तंभ
उत्पादन क्षमता: वर्ष 2030 तक देश में प्रतिवर्ष कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का विकास करना।
SIGHT कार्यक्रम: मिशन के अंतर्गत स्ट्रैटेजिक इंटरवेंशंस फॉर ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) योजना लाई गई है, जो इलेक्ट्रोलाइज़र के स्वदेशी विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन के उत्पादन हेतु वित्तीय प्रोत्साहन (PLI) प्रदान करती है।
आर्थिक लाभ: जीवाश्म ईंधन (Fossil fuels) के आयात में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी लाना और लगभग 6 लाख नए रोजगार सृजित करना।
2. औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization)
'हार्ड-टू-अबेट' (Hard-to-abate) क्षेत्र: इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और लंबी दूरी के भारी परिवहन जैसे क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन को कम करना पारंपरिक विद्युतीकरण से संभव नहीं है। यहाँ हरित हाइड्रोजन एक आदर्श स्वच्छ ईंधन के रूप में कार्य करता है।
3. ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्वायत्तता
वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का 85% से अधिक आयात करता है। ऊर्जा के स्वदेशी उत्पादन से आयात बिल में भारी कटौती होगी और विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षण होगा, जिससे 'आत्मनिर्भर भारत' का लक्ष्य सुदृढ़ होगा।
4. बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता
कृषि और हरित अमोनिया: बिहार एक सघन कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ रासायनिक उर्वरकों (यूरिया आदि) की व्यापक मांग है। हरित हाइड्रोजन से उत्पादित 'हरित अमोनिया' (Green Ammonia) राज्य में कृषि क्षेत्र की उत्पादन लागत को कम करने और मृदा स्वास्थ्य को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सौर ऊर्जा और विकेंद्रीकृत उत्पादन: पटना और बिहार के सभी जिलों में सौर विकिरण (Solar insolation) की अनुकूल स्थिति है। राज्य की 'सौर ऊर्जा नीति' का लाभ उठाते हुए, पटना और बिहार के सभी जिलों में विकेंद्रीकृत हरित हाइड्रोजन हब विकसित किए जा सकते हैं, जो भविष्य में स्थानीय परिवहन (ई-बसों) और एमएसएमई (MSME) सेक्टर को स्वच्छ ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे।
कार्यान्वयन के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
उच्च उत्पादन लागत: वर्तमान में ग्रे-हाइड्रोजन (प्राकृतिक गैस से निर्मित) की तुलना में हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और इलेक्ट्रोलाइज़र की लागत अत्यंत उच्च है, जो इसे व्यावसायिक रूप से कम प्रतिस्पर्धी बनाती है।
भंडारण और अवसंरचना की कमी: हाइड्रोजन का घनत्व बहुत कम होता है और यह अत्यधिक ज्वलनशील गैस है। इसके सुरक्षित भंडारण और परिवहन के लिए क्रायोजेनिक (Cryogenic) सिलेंडरों और विशेष पाइपलाइनों की आवश्यकता होती है, जिसका भारत में अभी अभाव है।
जल संसाधन का संकट: जल के विद्युत अपघटन के लिए भारी मात्रा में शुद्ध और विखनिजीकृत जल (Demineralized water) की आवश्यकता होती है, जो जल-संकट वाले क्षेत्रों के लिए एक गंभीर पारिस्थितिक चुनौती उत्पन्न कर सकता है।
आगे की राह (Way Forward)
अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश: इलेक्ट्रोलाइज़र की दक्षता बढ़ाने और दुर्लभ धातुओं पर निर्भरता कम करने के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा निजी क्षेत्र के मध्य सहयोगात्मक अनुसंधान को गति देनी होगी।
विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की तर्ज़ पर वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करना होगा, ताकि उन्नत क्रायोजेनिक तकनीक और सस्ते ऋण (Green Finance) की प्राप्ति हो सके।
मांग निर्माण (Demand Creation): सरकार को उर्वरक और रिफाइनरी क्षेत्रों के लिए हरित हाइड्रोजन/अमोनिया के उपयोग का एक निश्चित प्रतिशत (Purchase Obligation) अनिवार्य करना चाहिए।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत की ऊर्जा कूटनीति और सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 7: सस्ती व स्वच्छ ऊर्जा और SDG 13: जलवायु कार्रवाई) की दिशा में एक दूरदर्शी नीतिगत पहल है। यद्यपि वर्तमान में उत्पादन लागत और बुनियादी ढांचे की तकनीकी बाधाएँ मौजूद हैं, किंतु एक सशक्त विनियामक ढांचे और नवोन्मेषी वित्तीय तंत्र के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है। यह मिशन न केवल भारत को ऊर्जा निर्यातक (Energy Exporter) राष्ट्र में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है, बल्कि बिहार जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को एक धारणीय, हरित और लचीले औद्योगिक भविष्य की ओर अग्रसर करने में भी ऐतिहासिक सिद्ध होगा।