जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने (Mitigation) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के योगदान की चर्चा करें।
Q. जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने (Mitigation) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के योगदान की चर्चा करें।
Ans -
भूमिका
जलवायु परिवर्तन वर्तमान सदी की सबसे गंभीर और जटिल वैश्विक चुनौती है, जो मानव अस्तित्व और पारिस्थितिक संतुलन के लिए प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न कर रही है। अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के लिए त्वरित और अभूतपूर्व कदम उठाने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन के शमन (Mitigation - ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना) और अनुकूलन (Adaptation) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका न केवल अपरिहार्य है, बल्कि यह पेरिस समझौते और सतत विकास लक्ष्य (SDG 13 - क्लाइमेट एक्शन) को प्राप्त करने का सबसे प्रभावी साधन भी है।
जलवायु परिवर्तन के शमन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का योगदान
विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने विभिन्न क्षेत्रों में अभिनव समाधान प्रस्तुत किए हैं, जो कार्बन पदचिह्न (Carbon Footprint) को कम करने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं:
1. स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा (Clean and Renewable Energy)
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में ऊर्जा प्रौद्योगिकियों ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं:
सौर और पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकियां: उन्नत फोटोवोल्टिक (PV) सेल, फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट और उच्च क्षमता वाले पवन टर्बाइन ने स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को किफायती और सुलभ बनाया है।
हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen): इलेक्ट्रोलाइज़र तकनीक की मदद से जल से हरित हाइड्रोजन का उत्पादन एक 'गेम चेंजर' है, जो भारी उद्योगों (स्टील, सीमेंट) के डीकार्बोनाइजेशन में सक्षम है। भारत का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन इसी तकनीकी प्रगति पर आधारित है।
नाभिकीय ऊर्जा: स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) का विकास सुरक्षित और निरंतर स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने में एक विश्वसनीय विकल्प बनकर उभर रहा है।
2. कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS)
औद्योगिक उत्सर्जन को वायुमंडल में जाने से रोकने के लिए CCUS (Carbon Capture, Utilization, and Storage) एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है। इसके तहत कारखानों से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को कैप्चर कर उसे भूमिगत भूगर्भीय संरचनाओं में सुरक्षित किया जाता है या रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उपयोगी उत्पादों (जैसे सिंथेटिक ईंधन या निर्माण सामग्री) में परिवर्तित किया जाता है।
3. स्मार्ट मोबिलिटी और परिवहन
इलेक्ट्रिक वाहन (EVs): उन्नत लिथियम-आयन (Li-ion) और सॉलिड-स्टेट बैटरी तकनीक ने परिवहन क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भारी मात्रा में कम किया है।
वैकल्पिक ईंधन: जैव-ईंधन (Bio-fuels) जैसे इथेनॉल ब्लेंडिंग और संपीड़ित बायोगैस (CBG) तकनीक जीवाश्म ईंधनों का एक स्थायी विकल्प प्रदान कर रही है।
4. ऊर्जा दक्षता और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT): स्मार्ट ग्रिड, स्मार्ट मीटर और ऊर्जा-कुशल इमारतों के निर्माण में AI का उपयोग ऊर्जा की खपत को अनुकूलित (Optimize) करता है।
LED और हरित भवन (Green Buildings): GRIHA (Green Rating for Integrated Habitat Assessment) रेटिंग मानकों पर आधारित निर्माण तकनीकें ऊर्जा की बर्बादी को न्यूनतम करती हैं।
5. कृषि और वानिकी में तकनीकी नवाचार
सटीक कृषि (Precision Agriculture): सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन और सेंसर के उपयोग से उर्वरकों और पानी का अनुकूलतम उपयोग होता है, जिससे कृषि जनित मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आती है।
बायोटेक्नोलॉजी: सूखा और बाढ़ प्रतिरोधी जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों का विकास कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन (Carbon Sequestration) को बढ़ाने में सहायक है।
बिहार के संदर्भ में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग
बिहार, अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, बाढ़ (उत्तर बिहार) और सूखे (दक्षिण बिहार) जैसी चरम जलवायु घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। राज्य सरकार तकनीकी नवाचारों के माध्यम से जलवायु शमन और अनुकूलन के अभूतपूर्व प्रयास कर रही है:
'जल-जीवन-हरियाली' अभियान: इस फ्लैगशिप योजना के तहत वैज्ञानिक तरीकों से वृक्षारोपण, वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो कार्बन सिंक को बढ़ाने में अहम है।
जलवायु अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture - CRA): बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के सहयोग से बिहार के किसानों को जीरो-टिलेज (Zero Tillage) और फसल विविधीकरण की वैज्ञानिक तकनीकें सिखाई जा रही हैं। इससे पराली जलाने की घटनाओं और मीथेन उत्सर्जन में कमी आई है।
स्मार्ट पूर्व-चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems): बाढ़ प्रबंधन के लिए 'बिहार मौसम सेवा केंद्र' द्वारा सैटेलाइट डेटा, डॉप्लर राडार और AI आधारित पूर्वानुमान का उपयोग किया जा रहा है, जिससे आपदा जोखिम न्यूनीकरण संभव हुआ है।
चुनौतियां और सीमाएं
तकनीकी विकास के बावजूद, जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण के मार्ग में कई बाधाएं विद्यमान हैं:
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों (Global South) को स्वच्छ तकनीकें उचित और सस्ती दरों पर हस्तांतरित नहीं की जा रही हैं।
बौद्धिक संपदा अधिकार (IPRs): पेटेंट और IPR के कड़े नियम जीवन रक्षक हरित तकनीकों की पहुंच को सीमित करते हैं।
पूंजीगत लागत (High Capital Cost): हरित ऊर्जा अवसंरचना (जैसे CCUS या ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट) स्थापित करने की प्रारंभिक लागत अत्यंत उच्च है।
ई-कचरा (E-Waste): बैटरी भंडारण और सौर पैनलों के जीवनचक्र की समाप्ति पर उनका सुरक्षित वैज्ञानिक निपटान स्वयं में एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है।
आगे की राह
विज्ञान और प्रौद्योगिकी को वैश्विक जलवायु कार्रवाई का मुख्य आधार बनाने के लिए नीतिगत और संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। विश्व बैंक और ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) जैसी संस्थाओं को तकनीकी अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए क्लाइमेट फाइनेंस (Climate Finance) को बढ़ाना चाहिए। 'ओपन-सोर्स ग्रीन टेक्नोलॉजी' की अवधारणा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक दक्षिण के देश भी बिना वित्तीय बोझ के इन तकनीकों का लाभ उठा सकें।
भारत द्वारा COP-26 (ग्लासगो) में प्रस्तुत 'पंचामृत' (Panchamrit) विजन, विशेषकर 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (Net Zero) का लक्ष्य, पूर्णतः तकनीकी नवाचारों पर निर्भर है। यदि बिहार और भारत स्वदेशी अनुसंधान (जैसे CSIR, ISRO और IITs के माध्यम से) तथा नीतिगत इच्छाशक्ति का समन्वय करें, तो जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को न केवल कम किया जा सकता है, बल्कि एक धारणीय, हरित और सुरक्षित भविष्य का निर्माण भी सुनिश्चित किया जा सकता है।