भारत में एक साथ चुनाव (One Nation, One Election): समय की मांग या संघीय ढांचे पर प्रहार ?
Q. भारत में एक साथ चुनाव (One Nation, One Election): समय की मांग या संघीय ढांचे पर प्रहार ?
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भूमिका
भारत के लोकतांत्रिक और प्रशासनिक विमर्श में 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation, One Election - ONOE) वर्तमान का सबसे ज्वलंत विषय है। इसका तात्पर्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ (समकालिक रूप से) संपन्न कराने से है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह कोई नवीन अवधारणा नहीं है; भारत में वर्ष 1951-52 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। कालांतर में, अनुच्छेद 356 के मनमाने प्रयोग और गठबंधन सरकारों के समय-पूर्व पतन के कारण यह चक्र टूट गया। हाल ही में रामनाथ कोविंद समिति और विधि आयोग (Law Commission) द्वारा समकालिक चुनावों की वकालत किए जाने के बाद, यह बहस पुनः तेज हो गई है कि क्या यह कदम सुशासन के लिए 'समय की मांग' है, या भारतीय संविधान के 'संघीय ढांचे' पर एक प्रहार है।
समय की मांग: एक साथ चुनाव के पक्ष में तर्क
प्रशासनिक दक्षता और राजकोषीय प्रबंधन के दृष्टिकोण से, एक साथ चुनाव कराना राष्ट्रहित में एक आवश्यक सुधार प्रतीत होता है:
राजकोषीय बोझ में कमी: निरंतर चुनावों के आयोजन में निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा भारी धनराशि व्यय की जाती है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) के अनुमान के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। एक साथ चुनाव कराने से सरकारी खजाने (Exchequer) पर पड़ने वाले इस भारी आर्थिक दबाव को कम किया जा सकता है।
'नीतिगत पंगुता' (Policy Paralysis) से मुक्ति: नीति आयोग के एक विमर्श पत्र के अनुसार, हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होने के कारण बार-बार आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) लागू होती है। इससे नई विकास परियोजनाओं की घोषणा और नीतियों का क्रियान्वयन बाधित होता है, जिससे शासन की निरंतरता प्रभावित होती है।
प्रशासनिक और सुरक्षा बलों की दक्षता: चुनावों के सुचारू संचालन के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों, राज्य प्रशासन और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की तैनाती की जाती है। बार-बार चुनाव होने से शैक्षणिक कार्य, कानून-व्यवस्था और सीमा सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों की अनदेखी होती है।
काले धन पर अंकुश: चुनाव चक्र छोटा होने से चुनाव प्रचार में प्रयुक्त होने वाले बेहिसाब काले धन और भ्रष्टाचार की आवृत्ति में संरचनात्मक कमी लाई जा सकेगी।
संघीय ढांचे पर प्रहार: प्रमुख चुनौतियां और चिंताएं
भारतीय संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे लचीले संघीय ढांचे (Flexible Federalism) का निर्माण किया था, जो विविधताओं का सम्मान करता है। समकालिक चुनाव इस ढांचे के समक्ष कई विधिक और राजनीतिक चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं:
1. संवैधानिक एवं विधिक अड़चनें
संवैधानिक संशोधन: एक साथ चुनाव कराने के लिए अनुच्छेद 83 (संसद की अवधि), अनुच्छेद 85 (संसद का विघटन), अनुच्छेद 172 (राज्यों के विधानमंडलों की अवधि), अनुच्छेद 174 (विधानमंडलों का विघटन) और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) में व्यापक संशोधन करने होंगे, जिसके लिए कम से कम 50% राज्यों के अनुसमर्थन (Ratification) की आवश्यकता होगी।
अविश्वास प्रस्ताव और त्रिशंकु विधानसभा: यदि किसी राज्य या केंद्र में गठबंधन सरकार अपना कार्यकाल (5 वर्ष) पूरा करने से पहले गिर जाती है (त्रिशंकु स्थिति), तो शेष अवधि के लिए क्या व्यवस्था होगी? बार-बार राष्ट्रपति शासन लगाना लोकतांत्रिक जनादेश का सीधा उल्लंघन होगा।
2. क्षेत्रीय स्वायत्तता और लोकतांत्रिक विविधता का हनन
राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय मुद्दे: IDFC इंस्टीट्यूट के एक शोध के अनुसार, जब चुनाव एक साथ होते हैं, तो 77% मतदाता एक ही पार्टी को वोट देने की प्रवृत्ति रखते हैं। यह क्षेत्रीय दलों के लिए एक बड़ा खतरा है। राष्ट्रीय सुरक्षा या विदेश नीति के शोर में बाढ़, सूखा और स्थानीय नियोजन जैसे क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो सकते हैं।
मूल ढांचे (Basic Structure) का सिद्धांत: एस. आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने 'संघवाद' (Federalism) को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा माना है। राज्य विधानसभाओं को उनके कार्यकाल से पूर्व कृत्रिम रूप से भंग करना इस सिद्धांत के विरुद्ध माना जा सकता है।
बिहार के विशेष संदर्भ में प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रभाव
बिहार के जनसांख्यिकीय और भौगोलिक परिदृश्य में इस नीति का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण है:
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और सुशासन: बार-बार होने वाले चुनावों (विधानसभा, लोकसभा, पंचायती राज) के कारण राज्य की प्रशासनिक मशीनरी महीनों तक चुनाव कार्यों में उलझी रहती है। राज्य के संतुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि प्रशासन का ध्यान केवल चुनाव प्रबंधन पर न रहे, बल्कि विकास योजनाएं केवल राजधानी तक सीमित न रहकर पटना और बिहार के सभी ज़िलों में निर्बाध रूप से लागू की जाएं। एक साथ चुनाव इस प्रशासनिक भटकाव को रोक सकते हैं।
क्षेत्रीय राजनीति की प्रासंगिकता: बिहार की राजनीति मुख्य रूप से सामाजिक न्याय, आरक्षण और स्थानीय अस्मिता पर केंद्रित रही है। क्षेत्रीय दलों को यह वाजिब आशंका है कि समकालिक चुनावों की स्थिति में 'राष्ट्रीय लहर' (National Wave) के समक्ष उनकी राजनीतिक आवाज़ दब सकती है, जो राज्य के विशिष्ट हितों (जैसे— विशेष राज्य के दर्जे की मांग) को कमजोर करेगा।
आगे की राह (Way Forward)
'वन नेशन, वन इलेक्शन' सैद्धांतिक रूप से एक उत्कृष्ट विचार है, किंतु भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को देखते हुए इसे रातों-रात लागू करना व्यावहारिक नहीं है। इसके लिए एक मध्य-मार्ग (Middle Path) और क्रमिक दृष्टिकोण (Phased Approach) की आवश्यकता है:
दो चरणों में चुनाव: विधि आयोग के सुझावों के अनुरूप, चुनाव चक्र को दो चरणों (Phase-I और Phase-II) में विभाजित किया जा सकता है। आधे राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ (ढाई साल में) और शेष आधे राज्यों के चुनाव उसके मध्य-अंतराल (Mid-term) में संपन्न कराए जा सकते हैं।
रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव (Constructive Vote of No Confidence): जर्मनी के संविधान (Basic Law) की तर्ज पर अविश्वास प्रस्ताव तभी लाया जाना चाहिए, जब विपक्ष के पास एक वैकल्पिक सरकार बनाने का स्पष्ट बहुमत (विश्वास प्रस्ताव) तैयार हो। इससे सरकारों का समय-पूर्व गिरना रुकेगा।
ई-गवर्नेंस का सदुपयोग: आदर्श आचार संहिता के कारण रुके हुए विकास कार्यों के लिए एक ऑनलाइन पारदर्शी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, ताकि पहले से स्वीकृत परियोजनाएं बाधित न हों।
निष्कर्ष
भारत में 'एक साथ चुनाव' की अवधारणा न तो पूरी तरह से एक वरदान है और न ही पूर्णतः संघीय ढांचे पर प्रहार। यह एक व्यापक प्रशासनिक सुधार है जिसे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार भारतीय संघवाद को राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। अतः, इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से थोपने के बजाय व्यापक संसदीय बहस, सर्वदलीय आम सहमति और 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) की भावना के माध्यम से ही अमलीजामा पहनाया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र की आत्मा भी सुरक्षित रहे और सुशासन की गति भी तीव्र हो।