शॉर्ट नोट्सः ओशन थर्मल एनर्जी (OTEC)
Q. शॉर्ट नोट्सः ओशन थर्मल एनर्जी (OTEC)
Ans -
भूमिका
ओशन थर्मल एनर्जी कन्वर्जन (Ocean Thermal Energy Conversion - OTEC) एक अभिनव और धारणीय समुद्री ऊर्जा तकनीक है। यह समुद्र की सतह पर सूर्य की किरणों द्वारा गर्म किए गए जल (लगभग 25°C - 28°C) और गहराई (800-1000 मीटर) में मौजूद ठंडे जल (लगभग 4°C - 5°C) के बीच के तापीय प्रवणता (Thermal Gradient) का उपयोग करके विद्युत उत्पन्न करती है। इस तकनीक के सफल संचालन के लिए सतह और गहराई के जल के मध्य न्यूनतम 20°C का तापांतर होना अनिवार्य है, जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों में पाया जाता है।
जलवायु परिवर्तन के शमन, 'सतत विकास लक्ष्य 7' (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) की प्राप्ति, और भारत के 'नेट ज़ीरो' (2070) लक्ष्य की दिशा में OTEC एक महत्वपूर्ण 'आधार-भार' (Base-load) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में उभर रहा है।
OTEC की कार्यप्रणाली एवं रणनीतिक महत्व
इस तकनीक का ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) में बहुआयामी उपयोग है, जिसे निम्नलिखित उप-शीर्षकों के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. कार्यप्रणाली (Mechanism)
क्लोज्ड-साइकिल (Closed-Cycle): इसमें अमोनिया (Ammonia) जैसे कम क्वथनांक (Boiling point) वाले तरल पदार्थ का उपयोग किया जाता है। गर्म समुद्री जल इस तरल को वाष्पीकृत कर टरबाइन चलाता है, और फिर गहरा ठंडा जल वाष्प को वापस तरल में संघनित (Condense) कर देता है।
ओपन-साइकिल (Open-Cycle): इस प्रणाली में गर्म समुद्री जल को ही कम दबाव (Vacuum) वाले कक्ष में वाष्पीकृत किया जाता है। टरबाइन घुमाने के बाद संघनित वाष्प शुद्ध, अलवणीकृत जल (Desalinated Water) में बदल जाती है।
2. OTEC के प्रमुख लाभ (Impacts & Solutions)
निरंतर ऊर्जा आपूर्ति: सौर और पवन ऊर्जा की प्रकृति आवधिक (Intermittent) होती है, जबकि OTEC संयंत्र 24x7 आधार-भार विद्युत (Base-load power) प्रदान कर सकते हैं।
जल सुरक्षा: ओपन-साइकिल प्रणाली से उप-उत्पाद के रूप में भारी मात्रा में पीने योग्य मीठा पानी प्राप्त होता है, जो तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में जल संकट का एक स्थायी समाधान है।
हाइड्रोजन और अमोनिया उत्पादन: OTEC से उत्पन्न सस्ती विद्युत का उपयोग समुद्री जल के इलेक्ट्रोलाइसिस द्वारा 'हरित हाइड्रोजन' (Green Hydrogen) और अमोनिया बनाने में किया जा सकता है।
3. भारत में संभावनाएं
लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के साथ भारत में OTEC की अनुमानित क्षमता 180,000 मेगावाट (180 GW) है। राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने लक्षद्वीप (कवरत्ती) में OTEC आधारित अलवणीकरण संयंत्र का सफलतापूर्वक संचालन किया है।
4. प्रशासनिक एवं आर्थिक प्रासंगिकता
यद्यपि बिहार एक भू-आबद्ध (Landlocked) राज्य है, तथापि राष्ट्रीय स्तर पर OTEC के वाणिज्यीकरण का सीधा लाभ राज्य को मिलेगा। 'राष्ट्रीय ग्रिड' (National Grid) के सुदृढ़ीकरण से OTEC द्वारा उत्पन्न सस्ती और अबाधित हरित ऊर्जा को पटना और बिहार के सभी जिलों तक पहुँचाकर राज्य की बढ़ती औद्योगिक ऊर्जा मांग को पूरा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, तटीय OTEC संयंत्रों से निर्मित 'हरित अमोनिया' (Green Ammonia) की निर्बाध आपूर्ति से पटना और बिहार के सभी जिलों के कृषि क्षेत्र में उर्वरकों की लागत कम की जा सकती है, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी।
तकनीक के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
उच्च पूंजीगत व्यय (High Capital Cost): गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाने और अपतटीय (Offshore) इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में प्रारंभिक निवेश अत्यंत उच्च होता है, जो इसे व्यावसायिक रूप से कम प्रतिस्पर्धी बनाता है।
पारिस्थितिक प्रभाव (Ecological Concerns): गहरे समुद्र के ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर जल को सतह पर छोड़ने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) और कोरल रीफ्स पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
रखरखाव और क्षरण: समुद्री खारे पानी के कारण उपकरणों में जंग लगने (Corrosion) और सूक्ष्मजीवों के जमाव (Bio-fouling) की समस्या टरबाइन की दक्षता को गंभीर रूप से कम कर देती है।
आगे की राह (Way Forward)
अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश: टरबाइन की दक्षता बढ़ाने और समुद्री जंग-रोधी मिश्र धातुओं (Anti-corrosive alloys) के विकास के लिए 'सार्वजनिक-निजी भागीदारी' (PPP) मॉडल को अपनाना आवश्यक है।
पायलट परियोजनाओं का विस्तार: NIOT द्वारा लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में छोटे स्तर के OTEC संयंत्रों को वाणिज्यिक स्तर (Commercial scale) पर अपग्रेड करने हेतु विशेष वित्तीय आवंटन किया जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग: 'अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन' (ISA) की तर्ज़ पर भारत को जापान और अमेरिका जैसे देशों के साथ समुद्री ऊर्जा कूटनीति (Ocean Energy Diplomacy) को सुदृढ़ करना चाहिए।
निष्कर्ष
ओशन थर्मल एनर्जी कन्वर्जन (OTEC) केवल एक ऊर्जा उत्पादन तकनीक नहीं है, बल्कि यह 'नीली अर्थव्यवस्था' (Blue Economy) और जलवायु लचीलेपन (Climate Resilience) का एक महत्वपूर्ण आधार है। यद्यपि वर्तमान में इसकी पूंजीगत लागत और तकनीकी सीमाएँ एक बड़ी चुनौती हैं, किंतु एक दीर्घकालिक नीतिगत ढांचे और उन्नत स्वदेशी अनुसंधान के माध्यम से इन बाधाओं को पार किया जा सकता है। OTEC तकनीक का सफल राष्ट्रीय एकीकरण न केवल भारत की भू-राजनीतिक ऊर्जा स्वायत्तता सुनिश्चित करेगा, बल्कि देश के सभी राज्यों में धारणीय औद्योगिक और कृषि विकास को एक नई दिशा प्रदान करेगा।