सिविल सेवकों में 'समर्पण भाव' (Dedication to Public Service) का अभाव क्यों देखा जा रहा है? इसे कैसे सुधारा जा सकता है?
Q. सिविल सेवकों में 'समर्पण भाव' (Dedication to Public Service) का अभाव क्यों देखा जा रहा है? इसे कैसे सुधारा जा सकता है?
Ans -
'लोक सेवा के प्रति समर्पण' (Dedication to Public Service) का तात्पर्य केवल विधिक और पदीय कर्तव्यों के यांत्रिक निर्वहन से नहीं है, बल्कि यह संकट के समय व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर राष्ट्र एवं समाज के सबसे कमजोर वर्ग के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नोलन समिति (Nolan Committee) ने इसे सार्वजनिक जीवन के मूलभूत सिद्धांतों में प्रमुखता दी है, जो भारतीय दर्शन के 'निष्काम कर्म' से गहराई से जुड़ा है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सेवकों से जिस 'स्टील फ्रेम' की अपेक्षा की थी, उसका मूल आधार यही समर्पण था। किंतु, वर्तमान प्रशासनिक परिदृश्य में नौकरशाही के भीतर 'सेवा भाव' के क्षरण और 'नौकरीशाही' (Careerism) की प्रवृत्ति में वृद्धि एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
'समर्पण भाव' के अभाव के बहुआयामी कारण (PESTLE विश्लेषण)
सिविल सेवकों में समर्पण और प्रेरणा की कमी किसी एक कारक का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक जटिल प्रणालीगत और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या है:
1. राजनीतिक एवं संस्थागत हस्तक्षेप (Political & Institutional)
कार्यकाल की असुरक्षा और मनमाने तबादले: राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा तबादलों (Transfers) का उपयोग एक दंडात्मक अस्त्र के रूप में किया जाना। टी.एस.आर. सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ (2013) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया था कि निश्चित कार्यकाल का अभाव अधिकारियों के मनोबल और समर्पण को नष्ट करता है।
पारदर्शिता और पुरस्कार तंत्र का अभाव: पारंपरिक वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) प्रणाली वस्तुनिष्ठ नहीं है। यह उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले (Performer) और काम से बचने वाले (Shirker) के बीच कोई स्पष्ट भेद नहीं करती है, जिससे अच्छे अधिकारियों का 'डिमोटिवेशन' (Demotivation) होता है।
2. प्रशासनिक जड़ता और भय का वातावरण (Administrative Inertia)
3C (CBI, CVC, CAG) का भय: जांच एजेंसियों का अत्यधिक भय अधिकारियों में 'जोखिम से बचने' (Risk Aversion) की प्रवृत्ति पैदा करता है। नवाचार और सक्रिय निर्णय लेने के बजाय, वे 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखना सुरक्षित मानते हैं।
संस्थागत पदानुक्रम (Strict Hierarchy): अत्यधिक लालफीताशाही (Red Tapism) और कठोर पदानुक्रम निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों की रचनात्मकता और जनसेवा की इच्छा को कुचल देते हैं।
3. सामाजिक और आर्थिक कारक (Social & Economic)
मूल्यों का क्षरण और भौतिकवाद: समाज में उपभोक्तावाद (Consumerism) बढ़ने के कारण सिविल सेवा को समाज सेवा के बजाय सत्ता, प्रतिष्ठा (Status Symbol) और वित्तीय लाभ अर्जित करने का एक माध्यम मान लिया गया है।
निजी क्षेत्र से तुलना: कॉर्पोरेट क्षेत्र की तुलना में वेतन विसंगतियां और कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) का अभाव भी कई बार अधिकारियों में हताशा को जन्म देता है।
समर्पण भाव को पुनर्जीवित करने हेतु रणनीतिक उपाय
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी रिपोर्ट 'शासन में नैतिकता' (Ethics in Governance) में स्पष्ट किया है कि समर्पण को केवल दंडात्मक नियमों से नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेरणा और संस्थागत सुधारों से ही बढ़ाया जा सकता है:
1. संस्थागत और संरचनात्मक सुधार
सिविल सेवा बोर्ड (CSB) की स्थापना: सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने और न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित करने हेतु केंद्र तथा राज्य स्तर पर स्वतंत्र सिविल सेवा बोर्ड को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली: होता समिति (Hota Committee, 2004) की अनुशंसाओं के आधार पर प्रदर्शन मूल्यांकन को अधिक पारदर्शी बनाना, जिसमें वरिष्ठों के साथ-साथ सहकर्मियों और जनता के फीडबैक (Citizen Charter) को भी शामिल किया जाए।
2. क्षमता निर्माण और व्यवहारगत परिवर्तन
मिशन कर्मयोगी (Mission Karmayogi): राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम (NPCSCB) के तहत अधिकारियों को 'नियम-आधारित' (Rule-based) कार्यसंस्कृति से निकालकर 'भूमिका-आधारित' (Role-based) प्रशासन की ओर ले जाना।
संवेदनशीलता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence): LBSNAA जैसे प्रशिक्षण संस्थानों में संवेदनशीलता (Empathy) और 'सहानुभूति' (Compassion) के व्यावहारिक मॉड्यूल्स को शामिल करना, ताकि अधिकारी स्वयं को जनता के सेवक के रूप में देख सकें, न कि शासक के रूप में।
3. नैतिक प्रोत्साहन एवं संरक्षण तंत्र
सकारात्मक कार्यों हेतु संरक्षण: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 17A का उचित क्रियान्वयन सुनिश्चित करना, ताकि ईमानदार अधिकारियों को नीतिगत निर्णयों के लिए आधारहीन जांचों से बचाया जा सके।
प्रोत्साहन तंत्र: 'प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार' (PM Awards for Excellence in Public Administration) जैसी पहलों का विस्तार कर निचले स्तर के अधिकारियों के अनुकरणीय और जन-केंद्रित कार्यों को सार्वजनिक पटल पर मान्यता प्रदान करना।
आगे की राह
लोक सेवा कोई सामान्य पेशा नहीं है, बल्कि यह एक 'संवैधानिक ट्रस्ट' (Constitutional Trust) है। एक प्रशासक का वास्तविक मूल्यांकन केवल फाइलों के निस्तारण से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) के जीवन में लाए गए सकारात्मक बदलाव से होता है।
भारत को सतत विकास लक्ष्य 16 (SDG 16 - शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं) प्राप्त करने के लिए एक ऐसी नौकरशाही की आवश्यकता है जो करुणा, सत्यनिष्ठा और समर्पण से ओत-प्रोत हो। जब 'स्टील फ्रेम' अपनी पूरी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेगा, तभी हम समावेशी और पारदर्शी शासन सुनिश्चित कर सकेंगे। यह समर्पित प्रशासनिक ढांचा ही अंततः 'विकसित भारत 2047' के हमारे वृहत राष्ट्रीय संकल्प को एक ठोस धरातल प्रदान करेगा और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के हमारे शाश्वत आदर्श को विश्व पटल पर चरितार्थ करेगा।