एक साथ चुनाव (One Nation, One Election): लोकतंत्र का सरलीकरण या संघवाद पर प्रहार ?

 Q. एक साथ चुनाव (One Nation, One Election): लोकतंत्र का सरलीकरण या संघवाद पर प्रहार ?

Ans - 

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (One Nation, One Election - ONOE) का विचार भारतीय चुनावी और लोकतांत्रिक सुधारों के विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका मूल तात्पर्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और संभावित रूप से स्थानीय निकायों के चुनावों को एक ही समय-चक्र में संपन्न कराने से है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह कोई नवीन प्रयोग नहीं है; भारत में 1951 से 1967 तक चुनाव एक साथ ही संपन्न होते थे। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा इस विषय पर सौंपी गई विस्तृत रिपोर्ट ने इस बहस को पुनः केंद्र में ला दिया है। वर्तमान में मुख्य विमर्श यह है कि क्या यह शासन व्यवस्था को सुगम बनाने का एक आवश्यक कदम है, या भारतीय संघवाद (Federalism) और क्षेत्रीय विविधता के मूल ढांचे पर प्रहार।

लोकतंत्र का सरलीकरण: 'एक साथ चुनाव' के पक्ष में तर्क (PESTLE विश्लेषण)

निरंतर चुनाव चक्र (Perpetual Election Mode) देश के विकास और प्रशासन पर व्यापक प्रभाव डालता है। ONOE को शासन के सरलीकरण के रूप में निम्नलिखित बहुआयामी तर्कों द्वारा समर्थित किया गया है:

  • आर्थिक और राजकोषीय बचत (Economic): सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपये का व्यय हुआ। बार-बार चुनाव होने से राजकोष पर भारी दबाव पड़ता है और समानांतर अर्थव्यवस्था (काले धन) को बढ़ावा मिलता है।

  • प्रशासनिक और नीतिगत निरंतरता (Administrative): बार-बार आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC) लागू होने से नई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा रुक जाती है, जिससे 'नीतिगत पक्षाघात' (Policy Paralysis) की स्थिति उत्पन्न होती है। नीति आयोग के अनुसार, एक साथ चुनाव होने से सरकारों को विकास कार्यों के लिए अबाधित 5 वर्ष का समय मिलेगा।

  • सामाजिक समरसता (Social): चुनाव प्रायः जातिगत, धार्मिक और क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को तीव्र करते हैं। लगातार चुनावी माहौल समाज में वैमनस्यता को स्थायी बना देता है। एक साथ चुनाव होने से इस सांप्रदायिक और सामाजिक ध्रुवीकरण की आवृत्ति में कमी आएगी।

  • मतदाता भागीदारी (Voter Turnout): विधि आयोग (Law Commission) की 170वीं और 255वीं रिपोर्ट के अनुसार, यदि राष्ट्रीय और राज्य स्तर के चुनाव एक साथ होते हैं, तो प्रवासियों और आम नागरिकों के लिए मतदान करना अधिक सुविधाजनक होगा, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ेगी।

संघवाद और संवैधानिक ढांचे पर प्रहार: प्रमुख चुनौतियां एवं चिंताएं

ONOE के क्रियान्वयन में केवल लॉजिस्टिक बाधाएं ही नहीं हैं, बल्कि यह भारत की गहरी संघीय संरचना और संसदीय जवाबदेही के समक्ष गंभीर सैद्धांतिक प्रश्न भी खड़े करता है:

  • संवैधानिक एवं विधिक जटिलताएं (Legal & Constitutional): इसे लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद की अवधि), अनुच्छेद 85 (संसद का विघटन), अनुच्छेद 172 (राज्यों के विधानमंडलों की अवधि), अनुच्छेद 174 और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में व्यापक संशोधन की आवश्यकता होगी। इसके लिए संसद के दो-तिहाई बहुमत के साथ कम से कम 50% राज्यों के अनुसमर्थन (Ratification) की भी आवश्यकता है।

  • क्षेत्रीय मुद्दों का हाशियाकरण (Political/Federal): भारतीय संघवाद, जिसे एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान का 'मूल ढांचा' घोषित किया है, इस मान्यता पर आधारित है कि राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मुद्दे भिन्न होते हैं। IDFC संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार, जब चुनाव एक साथ होते हैं, तो 77% संभावना होती है कि मतदाता एक ही राजनीतिक दल को वोट देगा। इससे क्षेत्रीय पहचान और मुद्दे राष्ट्रीय आख्यान (National Narrative) में दब सकते हैं।

  • संसदीय जवाबदेही बनाम स्थिरता: संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि किसी राज्य में त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) की स्थिति उत्पन्न होती है या सरकार 'अविश्वास प्रस्ताव' में गिर जाती है, तो शेष कार्यकाल के लिए क्या व्यवस्था होगी? राष्ट्रपति शासन थोपना लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध होगा।

  • लॉजिस्टिक और सुरक्षा का भारी दबाव: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने के लिए बड़े पैमाने पर अतिरिक्त EVM, VVPAT मशीनों, मतदान कर्मियों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की आवश्यकता होगी, जिसका प्रारंभिक बुनियादी ढांचा खड़ा करना एक बड़ी चुनौती है।

तुलनात्मक दृष्टि: एक साथ चुनाव का प्रभाव

निर्धारक तत्व (Parameters)लोकतंत्र का सरलीकरण (सकारात्मक पक्ष)संघवाद पर प्रहार (चिंताएं)
शासन और नीतियांMCC से मुक्ति, निर्बाध विकास और सुशासनअविश्वास प्रस्ताव की स्थिति में संवैधानिक संकट
चुनावी मुद्देराष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रोत्साहनक्षेत्रीय दलों का नुकसान, स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा
संसाधन प्रबंधनधन, समय और प्रशासनिक बलों की भारी बचतEVM/VVPAT की भारी प्रारंभिक लागत और सुरक्षा चुनौती

आगे की राह (Way Forward)

इस व्यापक चुनावी सुधार को दलगत राजनीति से परे रखकर एक 'रचनात्मक आम सहमति' (Constructive Consensus) के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहिए। रामनाथ कोविंद समिति की सिफारिशों के आलोक में एक क्रमिक दृष्टिकोण (Phased Approach) अपनाया जा सकता है।

  • रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव: जर्मनी की तर्ज पर भारत में भी 'रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव' (Constructive Vote of No-Confidence) को वैधानिक रूप दिया जा सकता है, जहाँ पुरानी सरकार तभी गिरती है जब विधायिका नई सरकार के लिए स्पष्ट बहुमत सिद्ध कर दे। इससे विधानसभा के समय-पूर्व विघटन को रोका जा सकेगा।

  • संस्थागत संवाद: राज्यों, नागरिक समाज, और सभी राजनीतिक दलों के साथ अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) जैसे मंचों पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विविधता और जवाबदेही का उत्सव है। 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का मूल उद्देश्य चुनाव रूपी साधन को सुव्यवस्थित करना होना चाहिए, न कि संघवाद रूपी साध्य को कमजोर करना। सतत विकास लक्ष्य-16 (सशक्त संस्थाएं) के अनुरूप, यदि इसे पूर्ण संवैधानिक मर्यादाओं और राज्यों की सहमति के साथ लागू किया जाता है, तो यह भारत को 'परमानेंट इलेक्शन मोड' से बाहर निकालकर 'परमानेंट गवर्नेंस मोड' में लाएगा। यही सुशासन 'अमृत काल' में 'विकसित भारत 2047' के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने और राष्ट्र को एक वैश्विक महाशक्ति बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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