गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म की उत्पत्ति | Gautama Buddha and the Origin of Buddhism
बौद्ध मत की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी। उनके मां-बाप ने उनका नाम सिद्वार्थ रखा था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्यगण के मुखिया थे तथा उनकी मां का नाम माया था जो कोलियागण की राजकुमारी थी। उनका जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी (आधुनिक रुमिन्दी) नामक स्थान पर हुआ था। यह जानकारी हमें अशोक के एक स्तम्भ लेख के द्वारा मिलती है। बुद्ध की वास्तविक जन्म तिथि वाद-विवाद का विषय है परन्तु अधिकतर विद्वानों द्वारा इसको लगभग 566 ई. पू. माना गया है।
यद्यपि उनका जीवन शाही ठाठ-बाट में व्यतीत हो रहा था लेकिन यह गौतम के मस्तिष्क को आकर्षित करने में असफल रहा। पारम्परिक स्रोतों’ के अनुसार, एक बूढ़े आदमी, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत शरीर तथा एक सन्यासी को देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। मानव जीवन के दुखों ने गौतम पर गहरा प्रभाव डाला।
मानवता को दुखों से मुक्त कराने की खोज में उन्होंने 29 वर्ष की आयु में अपने घर, पत्नी तथा बेटे का परित्याग कर दिया। गौतम ने सन्यासी की भांति घूम-घूमकर छः वर्ष व्यतीत किए। उन्होंने वैशाली के अलारा कालमा से ध्यान करने और उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की। उनकी यह शिक्षा गौतम को अन्तिम मुक्ति के लिए राह न दिखा सकी, तो उन्होंने पांच ब्राह्मण सन्यासियों के साथ उनका भी परित्याग कर दिया।
उन्होंने कठोर संयम को अपनाया और सत्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न कठोर यातनाएं सहन की। अन्ततः इसको त्याग करके वे उरुवेला (आधुनिक बोध गया के पास निरंजना नदी के किनारे) गये और एक पीपल के वृक्ष (बौद्ध वृक्ष) के नीचे ध्यान मग्न हो गये। अन्ततः अपनी समाधि के उनचासवें दिन उन्हें “सर्वोच्च ज्ञान” की प्राप्ति हुई। तब से उनको “बुध” (ज्ञानी पुरुष) या “तथागत” (वह जो सत्य को प्राप्त करे) कहा जाने लगा।
यहां से प्रस्थान करके वे सारनाथ के मृगदाव वाराणसी के पास पहुंचे और वहां पर उन्होंने अपना धर्मोपदेश दिया जिसको “धर्मचक्र प्रवर्तन” (धर्म के चक्र को घुमाना) के नाम से जाना जाता है।
अश्वजित, उपालि, मोगाललना, श्रेयपुत्र और आनन्द- ये बुद्र के पहले पांच शिष्य थे। बुद्ध ने बौद्ध संघ का सूत्रपात किया। उन्होंने अपने अधिकतर धर्मोपदेश श्रावस्ती में दिए। श्रावस्ती का धनीं व्यापारी अनथापिण्डिका बुद्ध का शिष्य हो गया और उसने बौद्ध मत के लिए उदार दानं दिया। जल्द ही उन्होंने अपने धर्म प्रवचन के प्रचार के लिये बहुत से स्थानों का भ्रमण करना शुरू कर दिया। वे सारनाथ, मथुरा, राजगिर गया और पाटलिपुत्र गये। बिम्बिसार, अजातशत्रु (मगध), प्रसेनजीत (कोसल) और उदायन (कौशाम्बी) के राजाओं ने उनके सिद्धान्तों को स्वीकार किया तथा वे सब बुद्ध के शिष्य हो गये। वे कपिलवस्तु भी गये और उन्होंने अपनी धाय माता व बेटे राहुल को भी अपने सम्प्रदाय में परिवर्तित कर लिया।
मलल गुण की राजधानी कुसि नगर (उत्तर प्रदेश के जिले देवरिया में स्थित कसया) में 80 वर्ष की आयु में (486 ई. पू.) बुद्ध की मृत्यु हो गई। आइए अब बुद्ध की उन शिक्षाओं का विवेचन करें जिन्होंने उस समय के धार्मिक विचारों को नवीन शिक्षा प्रदान की।
बौद्ध धर्म के वास्तविक संस्थापक महात्मा बुद्ध | |
| जन्म | 563 ई.पू. |
| जन्मस्थल | लुम्बिनी वन (कपिलवस्तु- वर्तमान रुम्मिनदेई, नेपाल) |
| पिता | शुद्धोधन (शाक्यों के राज्य कपिलवस्तु के शासक) |
| माता | महामाया देवी (कोलिय गणराज्य) |
| बचपन का नाम | सिद्धार्थ (गोत्र- गौतम) |
| पालन पोषण | विमाता प्रजापति गौतमी |
| विवाह | 16 वर्ष की अवस्था में (यशोधरा-कोलिय गणराज्य की राजकुमारी) |
| पुत्र | राहुल |
| गृह त्याग की घटना | महाभिनिष्क्रमण |
| सारथि | चन्ना |
| घोड़ा | कंथक |
| ध्यान गुरु / प्रथम गुरु | अलार कालाम |
| ज्ञान प्राप्ति | 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध कहलाए। |
| ज्ञान प्राप्ति स्थल | गया (बोधगया, बिहार) निरंजना नदी का तट (घटना सम्बोधि) |
| वट / पीपल वृक्ष | इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति |
| प्रथम उपदेश | स्थल-ऋषि पत्तन (सारनाथ) स्थान वाली पाँच ब्राह्मण (पंचवर्गीय) घटना धर्मचक्र प्रवर्तन |
| शिष्य | आनंद व उपालि |
| धर्मप्रचार का स्थल | शाक्य, काशी, मगध, अंग, मल्ल, वज्जि, कोशल राज्य। |
| जीवन का अंत | 483 ई.पू., आयु-80 वर्ष, दिन-वैशाख पूर्णिमा, स्थल-कुशीनगर (उत्तर प्रदेश), कसिया गाँव-महापरिनिर्वाण (मृत्यु के बाद)। |
बुद्ध के जीवन
| बुद्ध के जीवन की घटनाएँ | स्थान |
| जन्म | लुम्बिनी |
| प्रथम प्रवचन | सारनाथ |
| ज्ञानप्राप्ति | बोधगया |
| निधन | कुशीनगर |
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| गर्भ | हाथी |
| जन्म | कमल |
| यौवन | साँड़ |
| गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) | घोड़ा |
| ज्ञान प्राप्ति (सम्बोधि) | बोधिवृक्ष (पीपल) |
| समृद्धि | शेर |
| प्रथम प्रवचन (धर्म चक्र प्रवर्तन) | चक्र |
| निर्वाण | पदचिन्ह |
| मृत्यु (महापरिनिर्वाण) | स्तूप |
बौद्ध धर्म के सिद्धांत
- बौद्ध दर्शन क्षणिकवादी और अन्तः शुद्धिवादी है। इसके अनुसार सभी संस्कार व्ययधर्मा हैं। अतः अप्रमाद के साथ मोक्ष का सम्पादन करें।
- बौद्ध दर्शन नितांत कर्मवादी है। यहाँ कर्म का आशय कायिक, वाचिक व मानसिक चेष्टाओं से है।
- बौद्ध दर्शन अनीश्वरवादी है। बौद्ध धर्म का पुनर्जन्म में विश्वास है। बौद्ध धर्म में व्यक्ति, भौतिक और मानसिक तत्वों के पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) से निर्मित बताया गया है।
- महात्मा बुद्ध के अनुसार, संसार दुःखमय है और लोग केवल काम (इच्छा लालसा) के कारण दुःख पाते हैं।
- उनकी शिक्षा है कि, न अत्यधिक विलास करना चाहिए और न अत्यधिक संयम। वे मध्यम मार्ग के प्रतिस्थापक थे। बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए आचार-नियम (विनय) निर्धारित किए थे।
- गौतम बुद्ध ने दुःख की निवृत्ति के लिए अष्टांगिक मार्ग का उपाय बताया है।
बुद्ध के उपदेश
बुद्ध के मूलभूत उपदेश निम्नलिखित में संकलित हैं:
- चार पवित्र सत्य, और
- अष्टांगिक मार्ग
निम्नलिखित चार पवित्र सत्य हैं:
ⅰ) संसार दुःखों से परिपूर्ण है।
ii) सारे दुःखों का कोई न कोई कारण है। इच्छा, अज्ञान और मोह मुख्यतः दुःख के कारण हैं।
iii) इच्छाओं का अन्त मुक्ति का मार्ग है।
iv) मुक्ति (दुःखों से छुटकारा पाना) अष्टांगिक मार्ग द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
अष्टांगिक मार्ग में निम्नलिखित सिद्धान्त समाहित हैं:
i) सम्यक् दृष्टिः इसका अर्थ है इच्छा के कारण ही इस संसार में दुःख व्याप्त हैं। इच्छा का परित्याग ही मुक्ति का मार्ग है।
ii) सम्यक् संकल्पः यह लिप्सा और विलासिता से छुटकारा दिलाता है। इसका उद्देश्य मानवता को प्यार करना और दूसरों को प्रसन्न रखना है।
iii) सम्यक् वाचन अर्थात् सदैव सच बोलना,
iv) सम्यक् कर्मः इसका तात्पर्य है स्वार्थ रहित कार्य करना।
v) सम्यक् जीविकाः अर्थात् आदमी को ईमानदारी से अर्जित साधनों द्वारा जीवन-यापन करना चाहिए।
vi) सम्यक् प्रयासः इससे तात्पर्य है कि किसी को भी बुरे विचारों’ से छुटकारा पाने के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। कोई भी मानसिक अभ्यास के द्वारा अपनी इच्छाओं एवं मोह को नष्ट कर सकता है।
viii) सम्यक् समाधिः इसका अनुसरण करने से शान्ति प्राप्त होगी। ध्यान से ही वास्तविक सत्य प्राप्त किया जा सकता है।
बौद्ध-संघ (संस्था के रूप में)
संघ बौद्ध मत की धार्मिक व्यवस्था थी। यह अच्छी प्रकार से संगठित एवं शक्तिशाली संस्था थी और इसने बौद्ध मत को लोकप्रिय बनाया। 15 वर्ष से अधिक आयु वाले सभी नागरिकों के लिए इसकी सदस्यता खुली थी चाहे वे किसी भी जाति के हों। अपराधी, कुष्ठ रोगी तथा संक्रामक रोग से पीड़ित लोगों को संघ की सदस्यता नहीं दी जाती थी। प्रारम्भ में गौतम बुद्ध महिलाओं को संघ का सदस्य बनाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उनके मुख्य शिष्य आनन्द एवं उनकी घाय मां महाप्रजापति गौतमी के लगातार निवेदन करने पर उन्होंने उनको संघ में प्रवेश दिया।
भिक्षुओं को प्रवेश लेने पर विधिपूर्वक अपना मुंडन कराना एवं पीले या गेरूए रंग का लिबास पहनना पड़ता था। भिक्षुओं से आशा की जाती थी कि वे नित्य बौद्ध मत के प्रचार के लिए जायेंगे और भिक्षा प्राप्त करेंगे। वर्षा ऋतु के चार महीनों में वे एक निश्चित बिस्तर लगाने तथा समाधि करते थे। इसको आश्रय या “वशा” कहा जाता था। संघ लोगों को शिक्षा देने का भी काम करता था। ब्राह्मणवाद के विपरीत बौद्ध मत में समाज के सभी लोग शिक्षा ग्रहण कर ‘सकते थे। स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को ब्राह्मणों ने शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित कर दिया था उनको बौद्ध मत में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो गया और इस प्रकार शिक्षा समाज के काफी तबकों में फैल गई।
संघ का संचालन जनतांत्रिक सिद्धान्तों’ के अनुसार होता था और अपने सदस्यों को अनुशासित करने की शक्ति भी इसी में निहित थी। यहां पर भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के लिए एक आचार- संहिता थी और वे इसका पालन करते थे। गलती करने वाले सदस्य को संघ दंडित कर सकता था।
बौद्ध मत की सभायें
अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के थोड़े समय बाद 483 ई. पू. में राजगृह के पास सप्तपर्णि गुफा में बौद्ध मत की प्रथम सभा हुई। इस सभा की अध्यक्षता महाकस्यप ने की। बुद्ध की शिक्षा को पिटको’ में विभाजित किया गया, जिनके नाम इस प्रकार हैं:
क) विनय-पिटक, और
ख) सुत्त-पिटक।
विनय-पिटक की रचना उपाली के नेतृत्व में की गई और सुत्त-पिटक की रचना आनन्द के नेतृत्व में की गई।
दूसरी सभा का आयोजन 483 ई. पू. में वैशाली में हुआ। पाटलिपुत्र तथा वैशाली के मिक्षुओं ने कुछ नियमों का निर्धारण किया परन्तु इन नियमों को कौशाम्बी व अवन्ति के भिक्षुओं के द्वारा बुद्ध की शिक्षा के प्रतिकूल घोषित कर दिया गया। दोनों विरोधी गुटों के बीच कोई भी समझौता कराने में सभा असफल रही। बौद्ध धर्म का विभाजन स्थायी तौर पर दो बौद्ध सम्प्रदायों-स्थविरवादी व महासांधिक में हो गया। पहले सम्प्रदाय ने विनय-पिटक में वर्णित रूढ़िवादी विचारों को अपनाया और दूसरे ने नये नियमों का समर्थन किया और फिर उनमें परिवर्तन किए।
तीसरी सभा का आयोजन अशोक के शासनकाल में मोग्गालिपुत्तत्स्सि की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में किया गया। इस सभा में सिद्वान्तों की दार्शनिक विवेचना को संकलित किया गया तथा इसको अभिधम्म-पिटक के नाम से जाना जाता है। इस सभा में बौद्धमत को असंतुष्टों एवं नये परिवर्तनों से मुक्त कराने का प्रयास किया गया। 60,000 “पथभ्रष्ट” भिक्षुओं को बौद्ध मत से इस सभा द्वारा निष्कासित कर दिया गया। सप्त उपदेशों के साहित्य को परिभाषित किया गया तथा आधिकारिक तौर पर विघ्न पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से भी निबटा गया।
चौथी सभा का आयोजन काश्मीर में कनिष्क के शासन काल में हुआ। इस सभा में उत्तरी भारत के हीनयान सम्प्रदाय को मानने वाले एकत्रित हुए। तीन पिटकों पर तीन टीकाओं’ (भाष्यों) का संकलन इस सभा द्वारा किया गया। इसने उन विवादग्रस्त मतभेद वाले प्रश्नों’ का निबटारा किया जो श्रावस्तीवासियों एवं काश्मीर तथा गन्धार के प्रचारकों’ के मध्य उत्पन्न हो गये थे।.
बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय
वैशाली में आयोजित दूसरी सभा में बौद्ध धर्म का निम्न दो सम्प्रदायों में विभाजन हुआ:
क) स्थविरवादी
ख) महासांधिक
स्थविरवादी धीरे-धीरे ग्यारह सम्प्रदायों और महासांधिक सात सम्प्रदायों में बंट गए। ये अठारह सम्प्रदाय “हीनयान” मत में संगठित हुए।
• स्थविरवादी कठोर भिक्षुक जीवन और मूल निर्देशित कड़े अनुशासित नियमों का अनुसरण करते थे।
• वह समूह जिसने संशोधित नियमों को माना, वह महासांधिक कहलाया।
महायान सम्प्रदाय का विकास चौथी बौद्ध सभा के बाद हुआ। हीनयान सम्प्रदाय जो बुद्ध की रूढ़िवादी शिक्षा में विश्वास करता था, का जिस गुट ने विरोध किया और जिन्होंने नये विचारों को स्वीकार किया, वे लोग महायान सम्प्रदाय के समर्थक कहलाये। उन्होंने बुद्ध की प्रतिमा बनायी और ईश्वर की भांति उसकी पूजा की। प्रथम सदी ई. कनिष्क के शासन काल में कुछ सैद्धांतिक परिवर्तन किए गए।
बौद्ध धर्म के पतन के कारण
ईसा की बारहवीं सदी तक आते-आते बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो गया। इसमें भी ब्राह्मण-धर्म की वे सभी बुराइयाँ आ गई, जिनके विरुद्ध इसने आरम्भ में लड़ाई छेड़ी थी। बौद्ध धर्म की चुनौती का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुधारा। उन्होंने गोधन की रक्षा पर बल दिया तथा स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी धर्म का मार्ग प्रशस्त किया। कालांतर में बौद्ध धर्म में विकृतियाँ आती गई। बाद में उन्होंने जनसामान्य की भाषा पाली को छोड़ दिया और संस्कृत को ग्रहण कर लिया, जो केवल विद्वानों की भाषा थी। ईसा की पहली सदी से वे बड़ी मात्रा में प्रतिमा-पूजन करने लगे और उपासकों से अत्यधिक चढ़ावा लेने लगे। बौद्ध विहारों को राजाओं से भी संपत्ति के दान मिलने लगे। इन सभी से बौद्ध भिक्षुओं का जीवन विलासिता पूर्ण बन गया। विहारों में अपार संपत्ति और स्त्रियों के प्रवेश होने से उनकी स्थिति और भी बिगड़ी। बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे। एक समय बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा था, यदि विहारों में स्त्रियों का प्रवेश न हुआ होता तो यह धर्म हजार वर्ष रहता, लेकिन जब स्त्रियों को प्रवेशाधिकार दे दिया गया है, तब यह धर्म केवल पाँच सौ वर्ष रहेगा। ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को प्रताड़ित किया। शैव संप्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतार दिया। गौड़ देश के शिवभक्त शशांक ने बोधगया में उस बोधिवृक्ष को काट डाला, जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।
