मौर्य शासन का महत्त्व | Importance of Mauryan rule
मौर्य शासन का महत्त्व
राजकीय नियंत्रण
हिंदू विधिग्रंथों में बार-बार कहा गया है कि राजा को धर्मशास्त्रों में बताए गए नियमों
और देश में प्रचलित आचारों के अनुसार शासन करना चाहिए। कौटिल्य ने राजा को
सलाह दी है कि जब वर्णाश्रम-धर्म (वर्णों और आश्रमों पर आधारित समाज-व्यवस्था)
लुप्त होने लगे तो राजा को धर्म की स्थापना करनी चाहिए। कौटिल्य ने राजा को
धर्मप्रवर्तक अर्थात् सामाजिक व्यवस्था का संचारक कहा है। अशोक ने अपने
अभिलेखों में बताया है कि राजा का आदेश अन्य आदेशों से ऊपर है। अशोक ने
धर्म का प्रवर्तन किया और उसके मूलतत्त्वों को सारे देश में समझाने और स्थापित
करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की। अशोक के अभिलेखों को धम्मलिपि
कहा जाता था, और वह एक प्रकार का धर्मशास्त्र था।
राजा के निरंकुश अधिकार का दावा मगध के राजाओं द्वारा अपनाई गई सैनिक
विजय की नीति के कारण आगे आया। अंग, वैशाली, काशी, कोसल, अवंति, कलिंग
आदि को एक-एक करके मगध साम्राज्य में मिला लिया गया। इन सभी क्षेत्रों पर जो
सैनिक नियंत्रण हुआ वह धीरे-धीरे जन-जीवन के हर अंग पर उत्पीड़क नियंत्रण के
रूप में परिणत हो गया। मगध साम्राज्य के पास तलवार का इतना ज़ोर था कि वह
सभी क्षेत्रों पर अपना पूरा नियंत्रण लाद सका।
जनजीवन के हर क्षेत्र को अपने वश में रखने के लिए राज्य को विशाल
अधिकारी वर्ग रखना पड़ता था। प्राचीन इतिहास के किसी भी अन्य काल में हम इतने
सारे अधिकारियों को नहीं पाते जितने मौर्यकाल में।
प्रशासन तंत्र के साथ-साथ गुप्तचरों का भी विस्तृत जाल बिछा था। विभिन्न
प्रकार के जासूस विदेशी शत्रुओं की गतिविधियों पर नजर रखते थे और संदिग्ध
अधिकारियों के बारे में पता लगाया करते थे। भोले-भाले लोगों से अंधविश्वास का
सहारा लेकर कोष संचय करने में भी वे सहायक सिद्ध होते थे।
शीर्षस्थ अधिकारी तीर्थ कहलाते थे। लगता है, अधिकतर अधिकारियों को नगद
वेतन दिया जाता था। उच्चतम कोटि के अधिकारी थे मंत्री, पुरोहित, सेनापति और
युवराज, जिन्हें उदारतापूर्ण पारिश्रमिक मिलता था। उन्हें 48 हजार पण की भारी रकम
मिलती थी (पण 3/4 तोले के बराबर चांदी का सिक्का होता था)। इसके ठीक विपरीत,
सबसे निचले दर्जे के अधिकारियों को कुल मिलाकर 60 पण मिलते थे,
हालाँकि कुछ कर्मचारियों को महज दस-बीस पण ही दिए जाते थे। इससे लगता है
कि उच्चतम और निम्नतम श्रेणियों के कर्मचारियों के बीच भारी विषमता थी।
आर्थिक नियंत्रण
यदि हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र को आधार बनाएँ तो लगेगा कि राज्य में 27 अध्यक्ष
नियुक्त थे। उनका कार्य मुख्य रूप से राज्य की आर्थिक गतिविधियों का नियमन
करना था। वे कृषि, व्यापार-वाणिज्य और बाट-मापन का तथा कताई, बुनाई, खान
आदि शिल्पों का नियमन-नियंत्रण करते थे। राज्य कृषकों की भलाई के लिए सिंचाई
और जलवितरण की व्यवस्था करता था। मेगास्थनीज हमें बतलाता है कि मिस्र की
भाँति ही मौर्य राज्य में अधिकारी जमीन को मापता और उन नहरों का निरीक्षण करता
था जिनसे होकर पानी छोटी नहरों में पहुँचता था।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कृषि कार्यों में दासों को लगाए जाने की व्यवस्था है
जो एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक विकास था। मेगास्थनीज का कहना है कि उसने दास
नहीं देखे। परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत में गृहदास वैदिक काल से
ही पाए जाते थे। लगता है कि मौर्यकाल में ही दासों को कृषि कार्यों में बड़े पैमाने
पर लगाया गया। राज्य के पास बड़े-बड़े कृषि क्षेत्र थे, जिनमें अनगिनत दास और
मज़दूर खटाए जाते थे। कलिंग युद्ध के बाद जो डेढ़ लाख युद्धबंदी कलिंग से
पाटलिपुत्र लाए गए, संभवत: वे कृषि कार्य में ही लगा दिए गए होंगे। डेढ़ लाख की
संख्या अतिशयोक्ति जैसी लगती है। जो भी हो उत्पादन की दृष्टि से प्राचीन भारतीय
समाज दास-समाज नहीं था। यूनान और रोम में जो कार्य दास करते थे वह भारत में
शूद्रों से लिया जाता था। शूद्रों को ऊपर के तीनों वर्गों की साझा-संपत्ति समझा जाता
था। उन्हें दासों, शिल्पियों और कृषकों के रूप में ऊपर के तीनों वर्गों का काम करने
के लिए बाध्य किया जाता था।
कई कारणों से ऐसा प्रतीत होता है कि राजकीय नियंत्रण साम्राज्य के विशाल भाग
में था, कम-से-कम केंद्रीय भाग में तो अवश्य था। ऐसा नियंत्रण पाटलिपुत्र की
अनुकूल अवस्थिति के कारण संभव हुआ। यहाँ से जलमार्ग के द्वारा राजकर्मचारी चारों
ओर जा सकते थे। इसके अतिरिक्त, पाटलिपुत्र से एक राजमार्ग वैशाली और चंपारण
होते हुए नेपाल जाता था। यह भी ज्ञात है कि हिमालय की तराई में भी एक सड़क
थी। यह सड़क वैशाली से चंपारण होकर कपिलवस्तु, कलसी (देहरादून जिले में),
हाजरा होते हुए अंत में पेशावर पहुँचती थी। मेगास्थनीज ने एक सड़क की चर्चा की
है। सड़कें पटना और सासाराम के बीच भी थीं जो वहाँ से मिर्जापुर और मध्य भारत
चली गई थीं। राजधानी से एक सड़क पूर्वी मध्यप्रदेश होते हुए कलिंग जाती थी,
और फिर कलिंग भी आंध्र और कर्नाटक से जुड़ा हुआ था। इन सारे मार्गों के कारण
यातायात में सहूलियत होती थी और यातायात में घोड़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही
होगी। उतरी मैदानों में तो गंगा और अन्य नदियाँ भी यातायात के मार्ग थीं।
अशोक के अभिलेखों के मिलने के स्थान महत्त्वपूर्ण राजमार्गों पर पड़ते हैं। पत्थर
के स्तंभ वाराणसी के पास चुनार में तैयार किए जाते थे और वहाँ से उत्तरी और
दक्षिणी भारत में पहुँचाए जाते थे। संभवत: देश का जो आबाद हिस्सा मौर्यों के नियंत्रण
में था, वही मुगलों के और शायद ईस्ट इंडिया कंपनी के भी नियंत्रण में रहा।
मध्यकाल में आकर राजमार्गों के किनारे अधिकाधिक बस्तियाँ होने से और रकाबदार
घोड़ों के प्रचलन से यातायात में उन्नति हुई। कंपनी ने जो बंदूक का प्रयोग किया
उसका आयात 1830 से लगातार वाष्पशक्तिचालित जहाज़ों से होता रहा।
ऐसा लगता है कि मौर्य शासकों को बहुत बड़ी जनसंख्या का सामना नहीं करना
पड़ा होगा। किसी भी तरह मौर्य सेना में 6,50,000 से अधिक सिपाही नहीं थे। यदि
मान लें कि आबादी का दस प्रतिशत भाग सेना में भरती हुआ तो मध्य गंगा के मैदानों
की कुल आबादी 65,00,000 से अधिक नहीं रही होगी। अशोक के अभिलेखों से
पता चलता है कि राज्यादेश का प्रचार पूर्वी छोर और दक्षिणी छोर के सिवा सारे देश
में किया गया। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उसके 18 अभिलेख मिलते हैं, लेकिन
यातायात की कठिनाइयों के कारण राज्य-नियंत्रण मध्य गंगा अंचल के बाहर उतना
कारगर नहीं हुआ होगा।
प्राचीन भारत में कर-प्रणाली की दृष्टि से मौर्यकाल महत्त्वपूर्ण है। कौटिल्य ने
किसानों, शिल्पियों और व्यापारियों से वसूल किए जाने वाले अनेक करों का वर्णन
किया है। इन सारे करों के निर्धारण, वसूली और संग्रह के लिए दृढ़ और दक्ष संगठन
की आवश्यकता थी। मौर्यों ने वसूली करने और ठीक से जमा रखने से अधिक महत्त्व
कर-निर्धारण को दिया। समाहर्ता कर-निर्धारण का सर्वोच्च अधिकारी होता था और
सन्निधाता राजकीय कोषागार और भंडागार का संरक्षक होता था। राज्य को
सन्निधाता की अपेक्षा समाहर्ता के चलते जो नुकसान होता था उसे अधिक गंभीर
माना जाता था। वास्तव में, कर-निर्धारण का ऐसा विशद संगठन पहली बार मौर्यकाल
में ही देखा जाता है। अर्थशास्त्र में उल्लिखित करों की लंबी सूची मिलती है। यदि
ये सारे कर वास्तव में उगाहे जाते होंगे तो प्रजा के पास निर्वाह के लिए नाममात्र
बचता होगा। अभिलेखों के आधार पर हम जानते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी राजकीय
भंडार-घर होते थे जिससे यह प्रकट होता है कि अनाज की शक्ल में भी कर वसूला
जाता था, और अनाज के इन भंडार-घरों से अकाल, सूखा आदि के समय स्थानीय
लोगों को सहायता दी जाती थी।
प्रतीत होता है कि मयूर, पर्वत और अर्धचंद्र की छापवाली आहत रजत मुद्राएँ मौर्य
साम्राज्य की मान्य मुद्राएँ थीं। ये मुद्राएँ बहुत बड़ी संख्या में मिली हैं। स्पष्ट है कि
कर वसूली में और अधिकारियों को वेतन देने में इन मुद्राओं का इस्तेमाल होता था।
अपनी शुद्ध समरूपता के कारण काफी बड़े क्षेत्र में बाजार की लेन-देन में भी ये
सुविधा के साथ चली होंगी।
ललितकला और वास्तुकला
कला और वास्तुशिल्प में मौर्यों का योगदान बड़ा मूल्यवान है। पत्थर की इमारत बनाने
का काम भारी पैमाने पर उन्होंने ही आरंभ किया। मेगास्थनीज ने कहा है कि
पाटलिपुत्र स्थित मौर्य राजप्रासाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना
राजप्रासाद। पत्थर के स्तंभों के टुकड़े और उनके दूंठ (stump) आधुनिक पटना नगर
के किनारे कुम्हरार में पाए गए हैं जो 80 स्तंभों वाले विशाल भवन के अस्तित्व का
संकेत देते हैं। इन अवशेषों से तो वैसी भव्यता का आभास नहीं मिलता है जैसी
मेगास्थनीज ने बताई है, लेकिन वे इस बात का प्रमाण अवश्य देते हैं कि मौर्य शिल्पी
पत्थर पर पालिश करने में कितने दक्ष थे। ये स्तंभावशेष उतने ही चमकीले हैं जितने
उत्तरी पालिशदार काले मृद्भांड (एन० बी० पी० डब्ल्यू०)। खदानों से पत्थर के
बड़े-बड़े खंडों को ले जाना और सीधा खड़ा करने के बाद उन पर पालिश करना
और नक्काशी करना अवश्य ही कठिन कार्य रहा होगा। यह सब अभियांत्रिकी का
बड़ा चमत्कार लगता है। हर स्तंभ पांडु रंगवाले बलुआ पत्थर के एक ही टुकड़े का
बना है जिनका केवल शीर्ष भाग स्तंभों के ऊपर जोड़ा गया है और जिनमें तराशे गए
सिंह और साँड़ विलक्षण वास्तुशिल्प के प्रमाण हैं। ये पालिशदार स्तंभ देश भर में
जहाँ-तहाँ खड़े किए गए, जिससे प्रकट होता है कि इन्हें ढोकर ले जाने और
पालिशदार बनाने में अपेक्षित तकनीकी ज्ञान सारे देश में फैला हुआ था। मौर्य शिल्पियों
ने बौद्ध भिक्षुओं के निवास के लिए चट्टानों को काट कर गुफाएँ बनाने की परंपरा
भी शुरू की। इसका सबसे पुराना उदाहरण बराबर की गुफाएँ हैं, जो गया से 30
किलोमीटर की दूरी पर हैं। बाद में इस प्रकार का गुहा-निर्माण पश्चिमी और दक्षिणी
भारत में भी प्रचलित हुआ।
उत्तरी काले पालिशदार मृभांड की मध्य अवस्था में प्राय: 300 ई० पू० में मध्य
गंगा के मैदान मिट्टी की मूर्ति बनाने की कला के केंद्र बन गए। मौर्य युग में मिट्टी
की मूर्तियाँ बड़े पैमाने पर बनती थीं। उनमें साधारणतया पशुओं और स्त्रियों की मूर्तियाँ
होती थीं। प्रायः स्त्रीमूर्तियों में मातृदेवियाँ और पशुमूर्तियों में हाथी हुआ करते थे।
लेकिन ये मिट्टी की मूर्तियाँ हाथ से बनाई जाती थीं। साँचे मौर्यकाल के बाद प्रकट
होते हैं।
भौतिक संस्कृति का विस्तार और राज्यपद्धति
एक ओर मौर्यों ने पहली बार राज्य के सुसंगठित प्रशासन तंत्र का निर्माण किया जो
साम्राज्य के केंद्रीय भाग में सक्रिय था, और दूसरी ओर उनके साम्राज्य-विस्तार ने
व्यापार और धर्मप्रचार के द्वार खोल दिए। लगता है कि प्रशासकों, व्यापारियों और जैन
तथा बौद्ध भिक्षुओं ने जो संपर्क सूत्र जोड़े उनके फलस्वरूप गंगा के मैदानों की
भौतिक संस्कृति साम्राज्य के सीमांत क्षेत्रों में भी फैल गई। गंगा मैदान की इस नई
भौतिक संस्कृति के आधार थे-लोहे का प्रचुर प्रयोग, आहत मुद्राओं की बहुतायत,
लेखन-कला का प्रयोग, उत्तरी काला पालिशदार मृद्भांड (एन० बी० पी० डब्ल्यू०)
नाम से प्रसिद्ध मिट्टी के बरतनों की भरमार, पकी ईंटों और छल्लेदार कुओं का
प्रचलन और इनसे बढ़कर पूर्वोत्तर भारत में नगरों का उदय। एरियन नामक यूनानी
लेखक के अनुसार नगरों की संख्या इतनी थी कि उन्हें गिनकर ठीक-ठीक बताया
नहीं जा सकता है।
इस प्रकार देखते हैं कि गंगा के मैदानों में भौतिक संस्कृति मौर्यकाल में बड़ी
तेजी से विकसित हुई। दक्षिण बिहार में लौह अयस्क आसानी से उपलब्ध था, अत:
लोहे के उपकरणों का प्रयोग खूब बढ़ा। इसी काल में मूठ वाली कुल्हाड़ियों, हँसिए
और फालों का भी प्रचलन हुआ। आरा वाला पहिया भी फैला। शस्त्रास्त्रों पर राज्य
का एकाधिकार था, पर लोहे के अन्य औजारों का प्रयोग किसी वर्ग में सीमित नहीं
था। इनका इस्तेमाल और निर्माण-शिल्प गंगा के मैदान से साम्राज्य के सुदूर भागों में
भी फैल गया होगा। मौर्यकाल में ही पूर्वोत्तर भारत में सर्वप्रथम पकाई हुई ईंट का
प्रयोग हुआ। मौर्यकाल में बनी पकी ईंटों की संरचनाएँ बिहार और उत्तर प्रदेश में पाई
गई हैं। मकान ईंट के भी बनते थे और लकड़ी के भी। प्राचीन काल में घने पेड़-
पौधों की और विशेषकर साल वृक्ष की बहुतायत के कारण इमारती लकड़ी खूब
उपलब्ध थी। मेगास्थनीज ने मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र में बने लकड़ी के भवनों का
उल्लेख किया है। खुदाई से मालूम होता है कि लकड़ी के लट्ठों का प्रयोग बाढ़
और बाहरी आक्रमण से बचाव के लिए महत्त्वपूर्ण रक्षा-बाँध बनाने में किया गया था।
पकी ईंटों का प्रयोग साम्राज्य के दूरवर्ती प्रांतों में भी फैल गया। नम जलवायु और भारी
वर्षा वाले क्षेत्रों में मिट्टी की या कच्ची ईंट की वैसी टिकाऊ और बड़ी-बड़ी इमारतें
बनाना संभव नहीं था, जैसी शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इसलिए पकी ईंट का प्रयोग
महान वरदान सिद्ध हुआ। इसके फलस्वरूप धीरे-धीरे साम्राज्य के विभिन्न भागों में
शहर पनपने लगे। इसी प्रकार छल्लेदार कुएँ, जो सबसे पहले मौर्यकाल में गंगा घाटी
में प्रकट हुए, साम्राज्य के केंद्रीय भाग के बाहर भी फैल गए। चूँकि छल्लेदार कुँओं
से लोगों को घरेलू काम के लिए पानी मिल जाता था, इसलिए यह आवश्यक नहीं
रहा कि बस्तियाँ नदी के किनारे ही हों।
लगता है कि मध्य गंगा के मैदान को भौतिक संस्कृति के तत्त्व, कुछ परिवर्तनों
के साथ, उत्तरी बंगाल, कलिंग, आंध्र और कर्नाटक में भी पहुँचे। इसमें संदेह नहीं
कि इन क्षेत्रों की अपनी संस्कृतियाँ भी स्वतंत्र रूप से पनप रही थीं। बांग्लादेश में,
जहाँ जिला बोगरा में मौर्य ब्राह्मी लिपि में महास्थान का अभिलेख पाया गया है, वहीं
दिनाजपुर जिले के बनगढ़ में उत्तरी काले पालिशदार मृद्भांड (एन० बी० पी०
डब्ल्यू०) मिले हैं। ऐसे मृद्भांडों के टुकड़े पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले
के चंद्रकेतुगद जैसे स्थानों में भी मिले हैं। उड़ीसा के शिशुपालगढ़ में भी गंगा क्षेत्र
से संपर्क के लक्षण दिखाई देते हैं। शिशुपालगढ़ की बस्ती मौर्यकाल की ईसा-पूर्व
तीसरी सदी की मानी जाती है और इसमें उत्तरी काले पालिशदार मृद्भांड के
साथ-साथ लोहे के उपकरण और आहत मुद्राएँ मिली हैं। चूँकि शिशुपालगढ़ धौली
और जोगड़ के पास है जहाँ भारत के पूर्व समुद्रतट से गुजरने वाले प्राचीन राजमार्ग
पर अशोक के अभिलेख पाए गए हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में
भौतिक संस्कृति मगध के साथ संपर्क के परिणामस्वरूप पहुँची होगी। यह संपर्क
ईसा-पूर्व चौथी सदी से ही आरंभ हुआ होगा, जब संभवत: नंदों ने कलिंग पर
अधिकार किया था। तीसरी सदी ईसा-पूर्व में कलिंग विजय के बाद यह संपर्क
घनिष्ठ हो गया। संभवतः कलिंग विजय के बाद शांति के लिए कार्रवाई के रूप में
अशोक ने उड़ीसा में कुछ बस्तियों को बढ़ावा दिया जिन्हें साम्रज्य का अंग बनाया
जा चुका था।
यद्यपि मौर्यकाल में आंध्र और कर्नाटक में कई स्थानों पर लोहे के औजार और
हथियार पाए गए हैं, तथापि लोहे की उन्नत कारीगरी (टेक्नोलॉजी) उन कारीगरों की
देन है, जो अनेक प्रकार के बड़े-बड़े पत्थरों के गोलाकार शवाधान (दफ़नाने की
जगह) बनाने के लिए मशहूर थे। लेकिन इनमें से कुछ स्थानों में अशोक के अभिलेख
और ईसा-पूर्व तीसरी सदी के उत्तरी काले पालिशदार मृद्भांड के टुकड़े मिले हैं।
उदाहरणार्थ, आंध्र के अमरावती में तथा कर्नाटक के कई स्थानों में अशोक के
अभिलेख पाए गए हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि पूर्वी समुद्रतट से भौतिक संस्कृति
के तत्त्व मौर्य संपर्क के जरिए निचले दकन पठार में आए।
मौर्य संपर्कों के जरिए ही इस्पात बनाने की कला देश के कुछ भागों में फैल
गई होगी। 200 ई० पू० के आसपास की या इससे भी पहले की इस्पात की वस्तुएँ
मध्य गंगा के मैदानों में पाई गई हैं। इस्पात के प्रचार से कलिंग में जंगल की सफाई
और खेती के सुधरे तरीकों का इस्तेमाल होने लगा होगा, और इसके फलस्वरूप उस
क्षेत्र में चेदि राज्य के उदय के लिए उपयुक्त स्थिति उत्पन्न हुई होगी। यद्यपि दकन
में सातवाहन ईसा पूर्व पहली सदी में ही सत्ता में आए, तथापि कुछ हद तक उनके
साम्राज्य का स्वरूप मौर्य साम्राज्य जैसा था। सातवाहनों ने मौर्यों की कुछ प्रशासनिक
इकाइयों को अपनाया। उनके राज्य में कई विषयों में मौर्य प्रणाली का अनुकरण
किया गया।
प्रायद्वीपीय भारत में राज्य स्थापित करने की प्रेरणा न केवल चेदियों और
सातवाहनों को, बल्कि चेरों (केरलपुत्रों), चोलों और पांड्यों को भी मौयों से ही मिली
हुई लगती है। अशोक के अभिलेखों के अनुसार, चेर, चोल, पांड्य, सतियपुत या
ताम्रपर्णी या श्रीलंका के लोग मौर्य साम्राज्य की सीमा से लगे क्षेत्रों में बसते थे।
इसलिए उन सबों के राज्य मौर्य राज्य से मिलते-जुलते थे। मौर्य राजधानी में आए
मेगास्थनीज को पांड्यों की जानकारी थी। अशोक अपने को 'देवों का प्यारा' कहता
था, यही उपाधि तमिल में अनूदित करके संगम साहित्य में उल्लिखित राजाओं ने
धारण की।
लगभग 300 ई० पू० से बांग्लादेश, उड़ीसा, आंध्र और कर्नाटक के कई भागों
में अभिलेखों के और कभी-कभी उत्तरी काले पालिशदार मृभांड के टुकड़ों और
आहत मुद्राओं के मिलने से संकेत मिलता है कि मौर्यकाल में मध्य गंगा के मैदान
की संस्कृति के तत्त्वों को दूर-दूर तक फैलाने की चेष्टा की गई। लगता है कि ऐसी
कार्रवाई कौटिल्य के उपदेशानुसार की गई होगी। कौटिल्य ने परामर्श दिया है कि
कृषकों की अर्थात् वैश्यों की सहायता से तथा घनी आबादी वाले इलाकों से मँगाए
गए शूद्र श्रमिकों की सहायता से नई-नई बस्तियाँ बसाई जानी चाहिए। परती ज़मीन
को तोड़ने के वास्ते नए किसानों को कर से छुटकारा दिया जाता था और मवेशी, बीज
और धन भी दिया जाता था। राज्य ने यह नीति इस आशा से अपनाई कि इस प्रकार
जो कुछ निवेश किया जाएगा उसका प्रतिफल अवश्य मिलेगा। ऐसी बस्तियाँ उन
इलाकों में आवश्यक थीं जहाँ के लोग लोहे के फाल से परिचित नहीं थे। इस नीति
के फलस्वरूप विशाल क्षेत्र में खेती और बस्ती का विस्तार हुआ।
यह कहना कठिन है कि पूरब में झारखंड और पश्चिम में विध्य के बीच फैले
मध्य भारतीय जनजातीय इलाके में गंगा के मैदान की भौतिक संस्कृति को पहुंचाने
में ये मौर्य नगर कहाँ तक सहायक हुए। पर इतना स्पष्ट है कि अशोक ने जनजातीय
लोगों से निकट संपर्क बनाए रखा और उन्हें धर्म का पालन करने के लिए प्रोत्साहित
किया। अशोक द्वारा नियुक्त धम्ममहामात्रों के साथ उनके संपर्क से उन्हें गंगा के
मैदान की उच्च संस्कृति के मूल तत्त्वों को आत्मसात् करने की प्रेरणा अवश्य मिली
होगी।
। इस अर्थ में अशोक ने संस्कृति प्रसार की सुविचारित और सुव्यवस्थित नीति
चलाई। उसने कहा कि धर्म का प्रचार होने से मानव देवताओं में मिल जाएंगे। इसका
आशय यह है कि जनजातीय और अन्य लोग स्थायी रूप से बसने और कर चुकाने
वाले किसानों के समाज की रीति अपनाएँगे, और माता-पिता और राजप्रभुत्व के प्रति
तथा उसके सहायक भिक्षुओं, पुरोहितों और अधिकारियों के प्रति आदर भाव रखेंगे।
उसकी यह नीति सफल हुई। अशोक के अनुसार शिकारियों और मछुआरों ने हिंसा
का त्याग करके धम्म को अपनाया। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने स्थानबद्ध कृषकों
का धंधा अपनाया।
मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण
मगध साम्राज्य युद्ध पर युद्ध करके प्रबल होता गया, जिसकी चरम परिणति
कलिंग-विजय है। लेकिन 232 ई० पू० में अशोक के राज्यकाल के समाप्त होते ही
इसका विघटन शुरू हो गया । मगध साम्राज्य के ह्रास और पतन के कई कारण प्रतीत
होते हैं।
ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया
अशोक की नीति के चलते ब्राह्मणों में प्रतिक्रिया हुई। इसमें संदेह नहीं कि अशोक
की नीति में सहिष्णुता थी और उसने लोगों से ब्राह्मणों का भी आदर करने को कहा।
परंतु उसने पशु-पक्षियों के वध को निषिद्ध कर दिया और स्त्रियों में प्रचलित
कर्मकांडीय अनुष्ठानों की खिल्ली उड़ाई। स्वभावत: इससे ब्राह्मणों की आय घटी।
बौद्ध धर्म के और अशोक के यज्ञविरोधी रूख से ब्राह्मणों को भारी हानि हुई, क्योंकि
नाना प्रकार के यज्ञों में मिलने वाली दान-दक्षिणा पर ही तो वे जीते थे। अत: अशोक
की नीति भले ही सहनशील हो, पर ब्राह्मणों में उसके प्रति विद्वेष की भावना जगने
लगी। वे वास्तव में ऐसी नीति चाहते थे जो उनके पक्ष में हो और उनके तत्कालीन
हितों और विशेषाधिकारों का समर्थन करे। मौर्य साम्राज्य के खंडहर पर कुछ नए राज्यों
के शासक ब्राह्मण बने। मध्य प्रदेश में और उससे पूर्व साम्राज्य के अवशेषों पर शासन
करने वाले शुंग और कण्व ब्राह्मण थे। इसी प्रकार पश्चिम दकन और आंध्र में
चिरस्थायी राज्य स्थापित करने वाले सातवाहन भी अपने को ब्राह्मण मानते थे। इन
ब्राह्मण राजाओं ने वैदिक यज्ञ किए, जिनकी अशोक ने उपेक्षा की थी।
वित्तीय संकट
सेना पर और प्रशासनिक अधिकारियों पर होने वाले भारी खर्च के बोझ से मौर्य
साम्राज्य के सामने वित्तीय संकट खड़ा हो गया। जहाँ तक हमें गलूम है प्राचीन काल
में सबसे विशाल सेना मौर्यों की थी और सबसे बड़ा प्रशासन तंत्र भी उन्हीं का था।
प्रजा पर तरह-तरह के कर थोपने के बावजूद, इतने विशाल ऊपरी ढाँचे को बनाए
रखना बड़ा ही कठिन था। लगता है कि अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं को इतना दान दिया
कि राजकोष ही खाली हो गया। अंतिम अवस्था में अपने खर्च को पूरा करने के लिए
मौर्यों को सोने की देवप्रतिमाएँ तक गलानी पड़ी।
दमनकारी शासन
साम्राज्य के टूटने का एक बड़ा कारण था प्रांतों में दमनकारी शासन। बिंदुसार के
शासनकाल में तक्षशिला के नागरिकों ने दुष्टामात्यों अर्थात् दुष्ट अधिकारियों के
कुशासन की कड़ी शिकायतें की थीं। अशोक की नियुक्ति होने पर नागरिकों की
शिकायतें दूर हुई। पर जब अशोक सम्राट हो गया तब फिर उसी नगर में वे वैसी ही
शिकायत आ गई। अशोक के कलिंग अभिलेख से प्रकट होता है कि प्रांतों में हो रहे
अत्याचारों से वह बड़ा चिंतित था और इसलिए उसने महामात्रों को आदेश दिया कि
समुचित कारण के बिना वे नागरिकों को सताएँ नहीं। इसी दृष्टि से उसने तोसली
(कलिंग स्थित), उज्जैन और तक्षशिला के अधिकारियों के स्थानांतरण की परिपाटी
चलाई। उसने स्वयं 256 रातें धम्मयात्रा पर बिताईं ताकि इस क्रम से प्रशासन की
देखभाल की जाए। पर इतना सारा होने पर भी दूर के प्रांतों में दमन का अंत न हुआ,
और अशोक के राज्यकाल के समाप्त होते ही तक्षशिला को साम्राज्य का जुआ फेंक
डालने में तनिक भी देर न लगी।
दूरवर्ती क्षेत्र में नए ज्ञान की पहुँच
हम देख चुके हैं कि किस प्रकार मगध अपनी कतिपय मूलभूत भौतिक उत्कृष्टताओं
के कारण फूलता-फलता गया। मगध साम्राज्य के विस्तार के फलस्वरूप ज्योंही
भौतिक संस्कृति के ये तत्त्व मध्य भारत, दकन और कलिंग पहुँच गए, त्योंही गंगा
के मैदान का, जो साम्राज्य का हृदय-स्थल था, वर्चस्व घटने लगा। ज्यों-ज्यों मध्य
गंगा क्षेत्र से बाहर वाले प्रांतों में लोहे के औज़ारों का प्रयोग बढ़ता गया, त्यों-त्यों मौर्य
साम्राज्य का ह्रास और पतन होता गया। मगध से प्राप्त भौतिक संस्कृति की बदौलत
नए-नए राज्य स्थापित और विकसित होते गए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मध्य भारत
में शुंगों और कण्वों का, कलिंग में चेदियों का और दकन में सातवाहनों का उदय
कैसे हुआ।
पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की उपेक्षा और चीन की महादीवार
अशोक देश और विदेशों में मुख्यतः धर्म प्रचार के काम में ही व्यस्त रहा, अत: ध्यान
नहीं दे सका कि पश्चिमोत्तर सीमावर्ती दरें की रक्षा कैसे हो। ईसा-पूर्व तीसरी सदी
में मध्य एशिया में कबीलों की जो गतिविधि थी उसे देखते हुए, उस दर्रे की ओर
नज़र रखना जरूरी हो गया था। सीथियन निरंतर गतिशील थे। वे खानाबदोश थे और
मुख्यतः घोड़े के इस्तेमाल पर निर्भर थे। वे चीन और भारत के व्यवस्थित साम्राज्यों
के लिए गंभीर खतरा बन गए। चीन के राजा शीह हुआँग टी (247-210 ई० पू० )
ने इन सीथियन जनों के हमले से अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए लगभग 200 ई० पू०
में चीनी महादीवार (Great Wall) बनवाई। अशोक ने ऐसा कोई उपाय नहीं
किया। स्वभावत: जब सीथियन जन भारत की ओर बढ़े तो उन्होंने पार्थिअनौ, शकों और
यूनानियों को भारत की ओर ढकेल दिया। यूनानियों ने उत्तर अफगानिस्तान में बैक्ट्रिया
नाम का राज्य स्थापित किया था। सर्वप्रथम उन्होंने ही 206 ई० पू० मैं भारत पर आक्रमण
किया। इसके बाद आक्रमणों का तांता लग गया, और यह सिलसिला ईसवी सन् के
आरंभ तक जारी रहा।
मौर्य साम्राज्य को पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई० पू० में अंतिम रूप से नष्ट कर दिया।
ब्राह्मण होते हुए भी वह अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ का सेनापति था। कहा जाता है कि
उसने लोगों के सामने बृहद्रथ को मार डाला और बलपूर्वक पाटलिपुत्र का राजसिंहासन
हड़प लिया। शुंगवंशियों ने पाटलिपुत्र और मध्य भारत में शासन किया और ब्राह्मण
जीवन-पद्धति का पुनरारंभ दिखाने के लिए कई वैदिक यज्ञ किए। कहा जाता है कि
उन्होंने बौद्धों को सताया भी। उनकी जगह कण्ववंशी आए और वे भी ब्राह्मण थे।