पूर्वी भारत में सभ्यता का प्रसार | Spread of Civilization in Eastern India

 पूर्वी भारत में सभ्यता का प्रसार | Spread of Civilization in Eastern India

पूर्वी भारत में सभ्यता का प्रसार

सभ्यता के लक्षण

कोई भी क्षेत्र तभी सभ्य माना जाएगा जब वहाँ लिखने की कला ज्ञात हो, कर उगाहने
और सुव्यवस्था बनाए रखने की प्रणाली हो, तथा धार्मिक, प्रशासनिक और
उत्पादनात्मक कार्यों को चलाने के लिए सामाजिक वर्ग और विशेषज्ञ उपलब्ध हों।
सभ्य समाज में उतना उत्पादन करने की क्षमता होनी चाहिए जितने से शिल्पियों और
कृषकों जैसे वास्तविक उत्पादकों की ही नहीं, बल्कि उत्पादन कार्य से दूर रहनेवाले
उपभोक्ताओं की भी आवश्यकता पूरी की जा सके। ये सभी तत्त्व सभ्यता की ओर
बढ़ाने वाले हैं। परंतु ये सभी तत्त्व पूर्वी भारत के काफी बड़े हिस्से में यथेष्ठ मात्रा
में बहुत ही बाद में दिखाई देते हैं। पूर्वी मध्य प्रदेश के अधिकतर भागों में तथा
उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और असम के संलग्न क्षेत्रों में ईसा की चौथी सदी
के मध्य तक कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं के बराबर मिलता है।
चौथी से सातवीं सदी तक के काल की विशेषता है मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पूर्वी
और दक्षिण-पूर्वी बंगाल तथा असम में उन्नत कृषि अर्थव्यवस्था का प्रसार हुआ,
राज्यतंत्रों का गठन हुआ और सामाजिक वर्गों की स्थापना हुई। यह बात इन क्षेत्रों में बिखरे
पाए गए गुप्तकाल के बहुत सारे अभिलेखों से मालूम होती है। अनेक अभिलेखों में काल
का उल्लेख गुप्त संवत् में किया गया है। ये अभिलेख अधिकतर ऐसे शासनपत्र हैं जिनके
जरिए सामंतों और अन्य लोगों ने धर्मार्थ भूमि-दान बौद्धों और ब्राह्मणों को तथा वैष्णव
मंदिरों और बौद्ध विहारों को दिया है। इन अनुदानभोगियों ने संस्कृति के उन्नायक तत्त्वों
को फैलाने और मजबूत बनाने में बड़ा योगदान किया। इस प्रक्रिया को समझने के लिए
एक-एक इलाके का अलग-अलग सर्वेक्षण करना होगा।

उड़ीसा और पूर्वी एवं दक्षिणी मध्य प्रदेश

महानदी के दक्षिण में उड़ीसा का समुद्रतटवर्ती कलिंग अशोक के काल में सहसा उत्कर्ष
पर चढ़ गया, लेकिन वहाँ सुदृढ़ राज्य की स्थापना बहुत दिनों के बाद ईसा-पूर्व पहली
सदी में आकर हुई। इसका शासक खारवेल बढ़ते-बढ़ते मगध तक चढ़ आया। ईसा की
पहली और दूसरी सदियों में उड़ीसा के बंदरगाहों में मोती, हाथी दाँत और मलमल का
अच्छा व्यापार चलता था। भुवनेश्वर से 60 किलोमीटर दूर खारवेल की राजधानी
कलिंगनगरी के स्थल पर शिशुपालगढ़ में जो खुदाई हुई है उसमें रोम की कई वस्तुएँ मिली हैं। 
उनसे प्रकट होता है कि वहाँ रोमन साम्राज्य से व्यापारिक संपर्क था। परंतु,
उड़ीसा का अधिकतर भाग, खासकर उत्तर उड़ीसा में, न तो राज्य गठन था और न खास
वाणिज्य-संबंधी चहल-पहल थी। चौथी सदी में, समुद्रगुप्त द्वारा विजित प्रदेशों की सूची
में कोसल और महाकांतार आए हैं। इन दोनों के अंतर्गत उत्तरी और पश्चिमी उड़ीसा के
भाग आते हैं। चौथी सदी के मध्य से छठी सदी तक उड़ीसा में कई राज्य स्थापित हुए,
और इनमें कम-से-कम पाँच की पहचान तो साफ-साफ की जा सकती है। इनमें
सबसे महत्त्वपूर्ण माठर वंश का राज्य है। इसे पितृभक्त वंश भी कहते हैं। जब उनकी
सत्ता चोटी पर थी तब महानदी और कृष्णा के बीच उनका राज्य फैला हुआ था।
वसिष्ठ, नल और मानवंशों के राज्य उनके पड़ोसी और समकालीन थे। वसिष्ठवंश
का राजा दक्षिण कलिंग में आंध्र की सीमाओं पर था, नलवंश का राज्य महाकांतार
के वन्य प्रदेशों में था, और मानवंश का राज्य महानदी के पार उत्तर और समुद्रतटवर्ती
क्षेत्र में था। प्रत्येक राज्य की अपनी-अपनी कर-संग्रह, प्रशासन और सैन्य संगठन की
पद्धति थी। नलवंश ने और संभवत: मानवंश ने भी सिक्के ढाले। हर राज्य ने ब्राह्मणों
को बुलाया था। अधिकांश राजा वैदिक यज्ञ करते थे, जिसका उद्देश्य न केवल पुण्य
अर्जित करना था, बल्कि अपनी शक्ति, प्रतिष्ठा और वैधता स्थापित करना भी था।
इस काल में उन्नत संस्कृति के तत्त्व न केवल कलिंग नाम से विदित
समुद्रतटवर्ती पट्टी तक ही सीमित थे, बल्कि उड़ीसा के अन्य भागों में भी दिखाई
देने लगे थे। मध्य प्रदेश में बस्तर के जनजातीय इलाकों में नलवंश की स्वर्णमुद्राओं
का मिलना महत्त्व का है। इससे पता चलता है कि वहाँ अर्थव्यवस्था विकसित हो
चुकी थी जिसमें बड़ी-बड़ी लेन-देन में और ऊँचे अधिकारियों के वेतनभुगतान में
स्वर्णमुद्रा का प्रयोग होता था। इसी तरह मानवंश ने भी शायद तांबे के सिक्के जारी
किए, जिसका मतलब होता है कि शिल्पियों और किसानों के बीच भी सिक्कों का
प्रचलन था। कई राज्यों ने ग्रामीण क्षेत्र में नई-नई राजस्व इकाइयाँ स्थापित करके
अपनी आय बढ़ाई। माठरों ने महेंद्र पर्वत के क्षेत्र में महेंद्रभोग नाम का नया जिला
बनाया। उसके पास द्वंतयवागुभोग नाम का एक ज़िला था जहाँ से इसके प्रशासकों को
हाथी दाँत और चावल का माड़ प्राप्त होता था। इससे पता चलता है कि वह जिला
किसी पिछड़े इलाके में बनाया गया होगा। माठरों ने एक प्रकार के न्यास स्थापित किए
जो अग्रहार कहलाते थे। इस न्यास में कुछ भूमि होती थी और गाँवों से होनेवाली
आय। इन अग्रहारों का उद्देश्य पठन-पाठन और धार्मिक अनुष्ठानों में लगे ब्राह्मणों का
भरण-पोषण करना था। यहाँ कुछ अग्रहारों से कर उगाहा जाता था, जबकि देश में
अन्यत्र ऐसे अग्रहार कर-मुक्त होते थे। जनजातीय, जंगली और लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों
में भूमिदान दे-दे कर ब्राह्मणों को बसाने से नई-नई परती जमीन में खेती शुरू हुई
और मौसम की अच्छी जानकारी के सहारे खेती के सुधरे तरीके भी शुरू हुए। 
आरंभ में वर्ष चार-चार महीनों के तीन भागों से बाँटा जाता था, और काल की गणना तीन
ऋतुओं के आधार पर की जाती थी। माठरों के अमल में पाँचवी सदी के मध्य से
वर्ष को बारह चंद्र मासों में विभाजित करने की परंपरा चली। इसमें मौसम की स्थिति
को ठीक से जानना आवश्यक हुआ, जो कृषि कार्य के लिए बड़ा उपयोगी था।
उड़ीसा के समुद्रतटवर्ती भाग में लेखन-कला ईसा-पूर्व तीसरी सदी से ही ज्ञात थी,
और ईसा की चौथी सदी तक के अभिलेख प्राकृत में मिलते हैं। परंतु 350 ई० के
आसपास से संस्कृत का प्रयोग शुरू हुआ। इससे भी महत्त्व की बात यह है कि इस
भाषा में लिखे भूमि अनुदानपत्र समुद्रतटर्वी क्षेत्र के बाहर उत्तर में महानदी के पार भी
मिलते हैं। इस प्रकार प्रकट होता है कि लिखने की कला और संस्कृत भाषा का प्रसार
उड़ीसा के बड़े हिस्से में हो गया था, और इस काल के संस्कृत श्लोक पाए गए हैं। 
इन नए क्षेत्रों में संस्कृत न केवल ब्राह्मण धर्म और संस्कृति के लिए, बल्कि संपत्ति संबंधी 
कानूनों और सामाजिक नियमों के लिए भी सामान्य माध्यम का काम देती रही। 
संस्कृत के शासनपत्रों (चार्टरों) में पुराणों और धर्मशास्त्रों के वचन उद्धृत किए गए हैं। 
इनमें राजा अपने को वर्णव्यवस्था का रक्षक कहता है।
इनमें गंगा के मैदान की संस्कृति से लोगों के लगाव पर जोर दिया गया है। 
प्रयाग के गंगा-यमुना संगम में स्नान को पवित्र माना गया है और विजयी 
राजा प्रयाग की तीर्थयात्रा करते हैं, यह भी कहा गया है।

बंगाल

बंगाल के बारे में, इस बात का प्रमाण मिलता है कि उत्तरी बंगाल के कई भागों में,
जहाँ अब बोगरा ज़िला है, अशोक के काल में लेखन प्रचलित था। एक अभिलेख
से ज्ञात होता है कि कई बस्तियों में बौद्ध भिक्षुओं के भरण-पोषण के लिए अनाज
और सिक्कों से भरे भंडार-घर थे। स्पष्ट है कि स्थानीय किसान ऐसी स्थिति में थे
कि अपनी उपज का कुछ भाग बचाकर कर चुकाएँ और दान-पुण्य करें। इस इलाके
के लोग प्राकृत जानते थे और बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। इसी तरह दक्षिण-पूर्व बंगाल
के समुद्रतटवर्ती नोआखली जिले में मिले एक अभिलेख से प्रकट होता है कि उस
इलाके के लोग ईसा-पूर्व दूसरी सदी में प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि जानते थे।
लगता है कि दक्षिण-पूर्व बंगाल में खरोष्ठी लिपि भी प्रचलित थी। परंतु बंगाल के
अधिकतर भाग के बारे में हम तब तक कुछ नहीं जानते जब तक ईसा की चौथी
सदी में नहीं पहुँचते हैं। लगभग मध्य चौथी सदी में महाराज उपाधिधारी एक राजा
बाँकुरा जिले के दामोदर तटवर्ती पोखरना में राज करता था। वह संस्कृत जानता था
और विष्णु का उपासक था, जिसकी पूजा के लिए उसने शायद एक गाँव का अनुदान
किया था।
गंगा और ब्रह्मपुत्र के बीच का प्रदेश, जो अब बांग्लादेश का भाग है, पाँचवी और
छठी सदियों में बस्तियों से भरा-पूरा था और वहाँ संस्कृत शिक्षा प्रचलित हो चुकी
थी। लगता है 550 ई० के बाद गुप्त राजाओं के गवर्नर स्वतंत्र हो गए और उन्होंने उत्तरी
बंगाल पर कब्जा कर लिया। इसके कुछ भाग को कामरूप के राजाओं ने हथिया लिया
होगा। स्थानीय अधीनस्थ राजाओं ने, जो सामंत महाराज कहलाते थे, स्थानीय प्रजा से
कर वसूलने के लिए तथा अपने प्रतिद्वंद्वियों से लड़ाई में सामना करने के लिए
अपना-अपना प्रशासन तंत्र स्थापित किया; हाथियों, घोड़ों और पैदल सिपाहियों की
सेना गठित की। 600 ई० में आकर यह प्रदेश गौड़ कहलाने लगा और यहाँ हर्ष के
शत्रु शशांक ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
432-33 ई० से लेकर लगभग सौ वर्षों तक हमें पुंड्रवर्धनभुक्ति में, जो लगभग
समूचे उत्तरी बंगाल में स्थित था और अब जिसमें अधिकतर बांग्लादेश शामिल है,
बड़ी संख्या में ताम्रपत्र मिले हैं, जिन पर भूमि के विक्रय और अनुदान अभिलिखित
हैं। अधिकतर अनुदानपत्रों से ज्ञात होता है कि भूमि का मूल्य दीनार नामक
स्वर्ण-मुद्राओं में चुकाया जाता था। परंतु जब कभी भूमि का अनुदान धार्मिक प्रयोजनों
के लिए किया जाता था तब अनुदानभोगियों को कर नहीं लगता था। भूमि-हस्तांतरण
के इन अभिलेखों से पता चलता है कि इस प्रक्रिया में प्रमुख लिपिकारों (कातिबों),
वणिकों, शिल्पियों, भूस्वामियों आदि के नाम रहते थे जो गुप्त साम्राज्य में गवर्नरों द्वारा
संचालित स्थानीय प्रशासन से संबद्ध होते थे। इन भूमि-हस्तांतरण अभिलेखों से हमें
न केवल विभिन्न सामाजिक समूहों और स्थानीय अधिकारियों के बारे में, अपितु कृषि
के विस्तार के बारे में भी बहुत बातें मालूम होती हैं। अधिकतर, धार्मिक अनुदान के
लिए खरीदी गई भूमि को परती, गैर-आबाद और इसलिए कर-हीन बताया गया है। इनमें
खेती होने लगी और बस्तियाँ बसने लगी होंगी।
बंगाल का ब्रह्मपुत्र द्वारा गठित त्रिभुजाकर भाग समतट कहलाता था, जिसे चौथी
सदी में समुद्रगुप्त ने जीता था। दक्षिण-पूर्वी बंगाल इसी में पड़ता है। इसका कुछ भाग
आबादी वाला और मूल्यवान रहा होगा, इसीलिए तो विजेता गुप्त राजा का ध्यान इधर
आंकृष्ट हुआ होगा। लेकिन शायद इसके शासक ब्राह्मणधर्मावलंबी नहीं हुए थे,
इसीलिए यहाँ न संस्कृत भाषा का प्रयोग पाते हैं और न वर्णव्यवस्था का प्रचलन; जैसा
कि उत्तरी बंगाल में पाते हैं। लगभग 525 ई० से इस प्रदेश में सुसंगठित राज्य रहा
है जिसमें समतट के अतिरिक्त उसकी पश्चिमी सीमा से सटा वंग का भाग भी
शामिल था। यह समतट राज्य या वंग कहलाता था। सम हरदेव सहित इसके शासकों
ने छठी सदी के उत्तरार्द्ध में स्वर्णमुद्राएँ जारी की।
इस राज्य के अतिरिक्त, हम सातवीं सदी में ढाका क्षेत्र में खड्ग वंश का राज्य पाते
हैं। यहाँ और दो राज्य थे, लोकनाथ नामक ब्राह्मण सासंत का राज्य और राट वंश का राज्य। 
दोनों कुमिल्ला क्षेत्र में पड़ते हैं। दक्षिण-पूर्व और मध्य बंगाल के इन सभी राजाओं ने छठी 
और सातवीं सदियों में भूमि के अनुदानपत्र जारी किए। उड़ीसा के
राजाओं की भांति उन्होंने भी अग्रहारों की स्थापना की। ये अनुदानपत्र बतलाते हैं कि
और उन इलाकों में सातवीं सदी के उत्तरार्द्ध में संस्कृत की शिक्षा प्रचलित थी,
इसीलिए अनुदानपत्रों में कई जटिल छंदों का प्रयोग मिलता है। साथ ही इनसे खेती
के और ग्रामीण बस्तियों के फैलाव का भी पता चलता है। बंगाल और उड़ीसा के
बीच वाले सीमांत क्षेत्रों में दंडभुक्ति नाम की राजस्व और प्रशासन संबंधी इकाई
बनाई गई थी। दंड का अर्थ है सजा, और भुक्ति का अर्थ है भोग। अत: लगता है
कि इस इकाई की स्थापना उस इलाके के जनजातीय लोगों को सुधारने और सज़ा
देने के उद्देश्य से की गई होगी। इससे जनजातीय क्षेत्रों में संस्कृत भाषा का तथा
संस्कृति के अन्य तत्त्वों का प्रचार बढ़ा होगा। वर्धमानभुक्ति (बर्दवान) में भी ऐसा
ही हुआ होगा, जिसका पता हमें छठीं सदी में आकर चलता है। दक्षिण-पूर्वी बंगाल
में फ़रीदपुर क्षेत्र में पाँच किता ज़मीन एक बौद्ध विहार को दी गई, जो परती थी,
पानी में डूबी रहती थी और इसलिए कर लगाने लायक नहीं थी। इसी तरह, कुमिल्ला
जिले में हरिणों, सूअरों, भैंसों, बाघों, सांपों आदि से भरे जंगली इलाके में बहुत-सारी
ज़मीन 200 ब्राह्मणों को दान में दी गईं। ये सभी उदाहरण बतलाते हैं कि नए-नए
क्षेत्रों में जनपदनिवेश और सभ्यता के प्रसारण की प्रक्रिया चालू थी।
बंगाल के इतिहास में लगभग पाँचवीं सदी के मध्य से दो सदियाँ बड़ी ही
गतिशील मालूम पड़ती हैं। इस अवधि में लगभग आधे दर्जन राज्य उदित हुए-कुछ
छोटे, कुछ बड़े, कुछ स्वतंत्र और कुछ सामंती। पर हर राज्य का अपना-अपना
विजय-शिविर या सैन्य-शिविर था जिसमें पैदल, घुड़सवार, हाथी और नाव वाली
टुकड़ियाँ रहती थीं। हर राज्य के अपने-अपने कर-संबंधी और प्रशासनिक जिले थे
जिनमें कर-संग्रह और शांति-सुव्यवस्था के लिए कर्मचारी दल रहते थे। हर राज्य युद्ध
करके तथा बौद्धों और ब्राह्मणों को भूमिदान देकर अपनी सत्ता का विस्तार करता था।
धार्मिक न्यासों की संख्या इतनी बढ़ गई कि अंततोगत्वा उनकी देखभाल करने के
लिए अग्रहारिक नाम का एक अधिकारी नियुक्त करना पड़ा। भूमिदान से ग्रामों का
विस्तार हुआ और भूमि पर कई नए-नए अधिकार सृजित हुए। सामान्यतया भूमि पर
स्वामित्व अलग-अलग परिवारों का होता था, लेकिन भूमि की खरीद-बिक्री पर
ऊपरी नियंत्रण स्थानीय समितियों का रहता था जिनमें मुख्य-मुख्य शिल्पियों,
वणिकों, भूस्वामियों, लिपिकारों आदि का हाथ रहता था। ये समितियाँ स्थानीय
राज-प्रतिनिधियों की मदद करती थीं। लेकिन गाँव की जमीन की बिक्री के मामले
में गाँव के किसानों की सलाह ली जाती थी। लगता है कि अतीत में भूमि कबीले
की या समुदाय की होती थी, इसलिए भूमि वही किसी को दे सकता था। अत: 
जब कोई अपनी व्यक्तिगत भूमि भी किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए दान देना चाहता था
तो उसमें समुदाय की अनुमति लेने की प्रथा का पालन करता था। संभवत: पूर्वकालीन
समुदाय धार्मिक कार्यों के लिए ब्राह्मणों को भूमि देता था और सैनिक और राजनीतिक
सेवाओं के लिए राजा को कर देता था। बाद में, राजा ने प्रजा-समुदाय से बहुत-सी
जमीन अपने हाथ में ले ली और अपनी सत्ता बढ़ा ली जिससे वह कर वसूलने में
समर्थ हो गया, तथा बंजर और परती भूमि पर अपना अधिकार जमा लिया। हर राज्य
के प्रशासनिक अधिकारी संस्कृत जानते थे जो राजकाज की भाषा थी। वे पुराणों और
धर्मशास्त्रों का सार जानते थे। इस प्रकार यह अवधि बड़े महत्त्व की रही, क्योंकि इस
काल में सभ्यता फैलाने का अभियान इस क्षेत्र में खूब आगे बढ़ा।
इस काल में ब्राह्मणवाद फैला, और बौद्ध धर्म बंगाल के नए क्षेत्रों में पहुँचा। बोध
गया, साँची, मथुरा और गंधार में बुद्ध की मूर्तियाँ ईसवी सन् के आरंभिक वर्षों में
मिलती हैं, और कुछ जगह बंगाल में भी। पर पाँचवीं सदी आते-आते बौद्ध महाविहार
नालंदा, विक्रमशिला और उत्तरी बंगाल में स्थापित हो गए।

असम

ब्रह्मपुत्र मैदान में पूरब से पश्चिम तक फैला कामरूप सातवीं सदी में उभरकर आगे
आया। लेकिन उत्खननों से पता चलता है कि गुवाहाटी के निकट बस्तियाँ ईसवी सन्
की चौथी सदी में बस चुकी थीं। इसी सदी में समुद्रगुप्त ने डवाक और कामरूप से
कर वसूला था। डवाक शायद नवगाँव जिले का भाग था और कामरूप तो निश्चय
ही ब्रह्मपुत्र के मैदान का नाम था। समुद्रगुप्त ने जिन शासकों से कर वसूला था वे
जनजातीय किसानों से कर वसूलकर निर्वाह करते रहे होंगे।
गुवाहाटी के पास अंबारी में हुए उत्खननों से प्रकट होता है कि वहाँ छठी और
सातवीं सदी में बस्तियाँ अच्छी तरह विकसित हो चुकी थीं। इसकी पुष्टि अभिलेखों
से भी होती है। छठी सदी के आरंभ तक लेखन-कला और संस्कृत भाषा प्रचलित
हो चुकी थी। कामरूप के राजाओं ने वर्मन् उपाधि धारण की। यह उपाधि केवल
उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में ही नहीं फैली अपितु बंगाल, उड़ीसा, आंध्र,
कर्नाटक और तमिलनाडु में भी पाई जाती है। इस उपाधि का अर्थ है कवच या
जिरह-बख्तर और यह योद्धा होने का प्रतीक है; इसे मनु ने क्षत्रियों के लिए निर्धारित
की है। कामरूप के राजाओं ने ब्राह्मणों को भूमिदान दे-देकर अपनी स्थिति को सुदृढ़
किया। सातवीं सदी में भास्करवर्मन् ऐसे राज्य के प्रधान के रूप में खड़ा हुआ,
जिसका नियंत्रण ब्रह्मपुत्र मैदान के बड़े भाग पर और उसके आगे के कुछ
भी था। यहाँ बौद्ध धर्म के भी पैर जमे हुए थे और चीनी यात्री हुआन सांग इस राज्य
में घूमा था। 

रचनात्मक काल

यद्यपि पूर्वी भारत के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न कालों में उत्कर्ष पर पहुँचे, तथापि
चौथी सदी से सातवीं सदी तक के काल को रचनात्मक काल कह सकते हैं। इस
काल में पूर्वी मध्य प्रदेश, उत्तरी उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और असम में तथा बांग्लादेश
के बड़े भाग में संस्कृत विद्या, वैदिक कर्मकांड, वर्णव्यवस्था और राज्यतंत्र फैले और
। विकसित हुए। गुप्त साम्राज्य से सांस्कृतिक संपर्क के परिणामस्वरूप पूर्वांचल में
सभ्यता का प्रसार हुआ। उत्तरी बंगाल और पश्चिमोत्तर उड़ीसा पर गुप्तों का राज छाया।
इस अंचल के अन्य क्षेत्रों में गुप्त साम्राज्य से संपर्क का अनुमान हम इस बात से लगा
सके हैं कि यहाँ के अभिलेखों में गुप्त संवत् का प्रयोग किया गया है। बंगाल में सामंतों
ने नए-नए राज्य स्थापित किए, जो हाथी, घोड़े, नाव आदि साधन भारी मात्रा में अपने
सैन्य-शिविरों में रखते थे। जाहिर है कि वे वेतनभोगी सेना के रख-रखाव के लिए
ग्रामीण समुदायों से नियमित रूप से कर वसूलते थे। पहली बार हम इस अंचल में
पाँचवीं और छठी सदियों में स्पष्ट रूप से बड़े पैमाने पर लेखन, संस्कृत भाषा का
प्रयोग, वर्णभेदमूलक समाज का गठन तथा बौद्ध धर्म का प्रचलन पाते हैं। हम शैव
और वैष्णव संप्रदाय के रूप में ब्राह्मण धर्म की प्रगति देखते हैं। भूमि पर सामुदायिक
स्वामित्व का तो अवशेष पाते हैं, परंतु ज़मीन के रूप में व्यक्तिगत संपत्ति का अस्तित्व
पाते है। ये सभी सिद्ध करते हैं कि खाद्य-उत्पादक अर्थव्यवस्था उन्नत अवस्था में
पहुँच चुकी थी। कहना न होगा कि लोहे के फाल वाले हलों से कृषि, पानी में रोप
कर धान की खेती, और तरह-तरह के शिल्प-कौशल की जानकारी इस अर्थव्यवस्था
की आधारशिला थी। कालिदास ने वंग में होनेवाली धान के बिचड़ों की रोपाई का
वर्णन किया है, पर मालूम नहीं कि यह कृषि परंपरा स्थानीय थी या मगध से सीखी
हुई। उत्तरी बंगाल में ऊँची किस्म की ईख उपजाई जाती थी। इन सबों से पर्याप्त मात्रा
में उत्पादन संभव हुआ, जिससे कि प्रजा और राजा दोनों का निर्वाह हो पाया, तथा
गैर-आबाद और विरल आबादी वाले क्षेत्रों में ग्रामीण बस्तियों के प्रसार को बल मिला।
उस काल के राजाओं, राजवंशों और सामंतों की तथा उन पर शासन करने वाली
केंद्रीय सत्ता की स्पष्ट रूपरेखा खींच पाना संभव नहीं है, लेकिन पूर्वांचल के दूरवर्ती
प्रांतों में संस्कृति का विकास और सभ्यता का प्रसार हुआ, इसके बारे में संदेह की
गुंजाइश नहीं है।
एक ओर गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ, तो दूसरी ओर उसी समय बाहरी प्रांतों
में उल्लेखनीय प्रगति हुई। बहुत-से ऐसे अनदेखे क्षेत्र, जो संभवत: जनजातीय सरदारों के
अधीन थे और विरल आबादीवाले थे, इतिहास की रोशनी में चमके। यह बात लाल
मिट्टी वाले उस भू-भाग पर लागू होती है जो पश्चिमी बंगाल और उत्तरी उड़ीसा में
तथा मध्य प्रदेश से सटे क्षेत्रों में झारखंड पठार के भीतर पड़ता है और कठिनाई से 
ही खेती करने और बसने के लायक हो सकता है। बांग्लादेश के जलोढ़ मिट्टी और भारी
वर्षा वाले जंगली इलाकों तथा ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों पर भी यह बात लागू होती है।
और नया पुराने