भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में बिहार की भूमिका और यहाँ के छात्रों के योगदान की चर्चा करें।
Q. भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में बिहार की भूमिका और यहाँ के छात्रों के योगदान की चर्चा करें।
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भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और स्वतंत्रता संग्राम में बिहार का अद्वितीय योगदान
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी द्वारा दिए गए 'करो या मरो' (Do or Die) के ऐतिहासिक आह्वान के साथ भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद हुआ। यह औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीय जनमानस का अंतिम और सबसे प्रलयंकारी प्रहार था। तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इसे '1857 के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह' स्वीकार किया था। इस स्वतःस्फूर्त जन-आंदोलन (Spontaneous Mass Movement) में बिहार मात्र एक भागीदार नहीं, बल्कि इसका मुख्य केंद्र (Nerve Center) बनकर उभरा, जहाँ जनता और विशेषकर छात्रों ने अदम्य साहस और शहादत का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारत छोड़ो आंदोलन में बिहार की भूमिका का बहुआयामी विश्लेषण
ब्रिटिश सरकार द्वारा 'ऑपरेशन जीरो आवर' के तहत शीर्ष नेतृत्व की त्वरित गिरफ्तारी के बाद, बिहार में यह आंदोलन एक नेतृत्वविहीन परंतु अत्यधिक संगठित जनाक्रोश के रूप में भड़क उठा।
नेतृत्व की गिरफ्तारी और तीव्र प्रतिक्रिया: 9 अगस्त 1942 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल (पटना) भेज दिया गया। अनुग्रह नारायण सिन्हा, श्रीकृष्ण सिंह और अन्य प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी ने बिहार की जनता को उद्वेलित कर दिया, जिससे संपूर्ण राज्य में अभूतपूर्व हड़ताल और प्रदर्शन शुरू हो गए।
प्रशासनिक ढांचे को पंगु बनाना: बिहार की जनता ने ब्रिटिश संचार और परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह से ठप कर दिया। रेलवे लाइनें उखाड़ दी गईं, टेलीग्राफ के तार काट दिए गए और सैकड़ों पुलिस स्टेशनों एवं डाकघरों पर जनता ने अधिकार कर लिया। सारण जिले में विद्रोह इतना उग्र था कि ब्रिटिश सरकार ने इसे 'अपराधी जिला' (Criminal District) घोषित कर दिया।
भूमिगत प्रतिरोध और 'आजाद दस्ता': 9 नवंबर 1942 (दीपावली की रात) को जयप्रकाश नारायण अपने सहयोगियों (रामानंदन मिश्र, योगेंद्र शुक्ल आदि) के साथ हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर भाग निकले। उन्होंने नेपाल के राजविलास जंगलों में 'आजाद दस्ता' का गठन किया। इस दस्ते ने छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) के माध्यम से ब्रिटिश संचार लाइनों को ध्वस्त करने और आंदोलनकारियों को गुप्त प्रशिक्षण देने का ऐतिहासिक कार्य किया।
समानांतर सरकारों की स्थापना: मुंगेर, भागलपुर और उत्तरी बिहार के कई क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन कुछ समय के लिए पूरी तरह से समाप्त हो गया और जनता ने अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर ली।
बिहार के छात्रों का अप्रतिम योगदान और शहादत
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति में छात्रों और युवाओं ने प्रथम पंक्ति (Vanguard) का नेतृत्व संभाला। बिहार के छात्रों का योगदान राष्ट्रीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है:
ऐतिहासिक पटना सचिवालय गोलीकांड (11 अगस्त 1942):
छात्रों के एक विशाल जुलूस ने पटना स्थित विधानसभा (वर्तमान सचिवालय) भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का साहसिक संकल्प लिया।
तत्कालीन पटना के जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर (W.G. Archer) के आदेश पर निहत्थे छात्रों पर क्रूरतापूर्वक गोलियां चलाई गईं।
इस घटना में बिहार के सात युवा छात्र शहीद हुए: उमाकांत प्रसाद सिन्हा, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार, देवीपद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह। इनकी शहादत ने पूरे बिहार में क्रांति की ऐसी दावानल सुलगाई जिसने ब्रिटिश प्रशासन की चूलें हिला दीं।
शैक्षणिक संस्थानों का बहिष्कार: महात्मा गांधी के आह्वान पर हजारों छात्रों ने स्कूल-कॉलेजों का पूर्णतः बहिष्कार किया। पटना कॉलेज, बी.एन. कॉलेज और राज्य के अन्य शिक्षण संस्थान आंदोलन के प्रमुख रणनीतिक केंद्र बन गए।
सूचना तंत्र का संचालन और जन-जागरण: प्रेस पर कठोर ब्रिटिश प्रतिबंधों के बावजूद, छात्रों ने साइक्लोस्टाइल मशीनों के माध्यम से गुप्त पत्रिकाओं और पर्चों (जैसे- 'बागी', 'हमारा देश') का मुद्रण और वितरण किया। उन्होंने गांवों में जाकर किसानों और मजदूरों को आंदोलन से जोड़ने के लिए संदेशवाहकों (Couriers) की भूमिका निभाई।
अहिंसक और उग्र दोनों मोर्चों पर सक्रियता: जहाँ एक ओर छात्रों ने जुलूस, धरना और पिकेटिंग के माध्यम से शांतिपूर्ण प्रतिरोध किया, वहीं दूसरी ओर संचार व्यवस्था को भंग करने और सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराने जैसे साहसिक कार्य भी किए।
भावी प्रभाव और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
भारत छोड़ो आंदोलन में बिहार और यहाँ के छात्रों की शहादत ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रिटिश सत्ता अब बल प्रयोग के माध्यम से भारत पर शासन नहीं कर सकती। पटना सचिवालय के सात शहीदों का रक्त और जयप्रकाश नारायण के आजाद दस्ते की रणनीतिक सफलता ने औपनिवेशिक शासन के कफन में अंतिम कील ठोकने का कार्य किया।
इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को उसके तार्किक मुकाम—पूर्ण स्वतंत्रता—तक पहुँचाया। बिहार के युवाओं ने जिस त्याग, लोकतांत्रिक चेतना और नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन 1942 में किया, वह न केवल 1947 की स्वतंत्रता का आधार बना, बल्कि आज भी राज्य के सामाजिक-राजनीतिक नवनिर्माण और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक शाश्वत प्रेरणा स्रोत है।