सविनय अवज्ञा आंदोलन में बिहार के योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

 Q. सविनय अवज्ञा आंदोलन में बिहार के योगदान का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।

Ans - 

सविनय अवज्ञा आंदोलन और बिहार: एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1929 के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में पारित 'पूर्ण स्वराज' के प्रस्ताव को जमीनी धरातल पर उतारने के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) का सूत्रपात हुआ। 12 मार्च 1930 की दांडी यात्रा के साथ प्रारंभ हुए इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक सत्ता के अन्यायपूर्ण कानूनों की अहिंसक तरीके से अवज्ञा करना था।

बिहार, जो चंपारण सत्याग्रह (1917) के बाद से ही राष्ट्रीय चेतना का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था, ने इस आंदोलन में अभूतपूर्व ऊर्जा के साथ भागीदारी की। यहाँ के जनमानस ने भौगोलिक बाधाओं के बावजूद इस आंदोलन को एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया, जिसका आलोचनात्मक मूल्यांकन इसकी सफलताओं और अंतर्निहित सीमाओं दोनों के संदर्भ में किया जाना आवश्यक है।

बिहार में आंदोलन का बहुआयामी स्वरूप

बिहार एक भू-आबद्ध (Landlocked) राज्य होने के कारण यहाँ समुद्र तट उपलब्ध नहीं था, इसके बावजूद यहाँ के नेताओं और जनता ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल प्रतिरोध के नवीन तरीके ईजाद किए:

1. नमक सत्याग्रह का प्रतीकात्मक प्रयोग

  • समुद्र के अभाव में बिहार में नमकीन मिट्टी (शोरा/Shora) से नमक बनाकर कानून भंग करने की रूपरेखा तैयार की गई।

  • 15 अप्रैल 1930 को सारण और चंपारण जिलों से नमक सत्याग्रह की शुरुआत हुई। विपिन बिहारी वर्मा और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने इसका सफल नेतृत्व किया।

  • जल्द ही यह प्रतीकात्मक विरोध पटना (नखास पिंड क्षेत्र), मुंगेर, और भागलपुर तक फैल गया, जिसने ब्रिटिश प्रशासन को वैधानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों मोर्चों पर चुनौती दी।

2. चौकीदारी कर विरोधी आंदोलन: बिहार का मुख्य हथियार

  • नमक कानून भंग करना बिहार में केवल प्रतीकात्मक था; यहाँ आंदोलन का वास्तविक और सबसे शक्तिशाली स्वरूप चौकीदारी कर (Chowkidari Tax) का बहिष्कार था।

  • चौकीदार ब्रिटिश प्रशासन की खुफिया आंख और कान माने जाते थे। मई 1930 में बेतिया और सारण से इस कर को न चुकाने का अभियान शुरू हुआ, जो मुंगेर, भागलपुर और शाहाबाद तक फैल गया।

  • जनता के दबाव में सैकड़ों चौकीदारों और सरंपचों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा, जिससे ग्रामीण स्तर पर ब्रिटिश खुफिया और प्रशासनिक ढांचा पंगु हो गया।

3. स्वदेशी का प्रसार एवं विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार

  • विदेशी वस्त्रों और शराब की दुकानों पर धरना देना इस आंदोलन का प्रमुख अंग था।

  • पटना में हसन इमाम के नेतृत्व में एक स्वदेशी लीग की स्थापना की गई।

  • शराबबंदी आंदोलन में 'पासी' समुदाय (जो पारंपरिक रूप से ताड़ी निकालने के पेशे से जुड़े थे) से ताड़ी न निकालने की अपील की गई, जिसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा।

4. महिलाओं और जनजातियों की ऐतिहासिक भागीदारी

  • श्रीमती विंध्यवासिनी देवी, चंद्रावती देवी और हसन इमाम की पत्नी के नेतृत्व में बिहार की महिलाओं ने पर्दा प्रथा को त्यागकर पिकेटिंग और जुलूसों में भाग लिया।

  • छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड) क्षेत्र में ताना भगतों और संथालों ने गांधीवादी अहिंसात्मक तरीकों को अपनाते हुए सरकार को कर देने से मना कर दिया, जिसने आंदोलन को जनजातीय आधार प्रदान किया।

आलोचनात्मक मूल्यांकन: सफलताएँ और सीमाएँ

किसी भी बड़े जन-आंदोलन की तरह, बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन की भी अपनी विशिष्ट उपलब्धियाँ और कुछ अंतर्निहित सीमाएँ थीं:

सकारात्मक पक्ष (उपलब्धियाँ)

  • व्यापक जन-लामबंदी (Mass Mobilization): चंपारण और असहयोग आंदोलन की तुलना में इस आंदोलन का सामाजिक आधार कहीं अधिक विस्तृत था। इसमें शहरी मध्य वर्ग, महिलाओं, छात्रों और ग्रामीण किसानों ने एकजुट होकर भाग लिया।

  • अहिंसक अनुशासन: बिहपुर सत्याग्रह (भागलपुर) के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रो. अब्दुल बारी पर बर्बर लाठीचार्ज किया। इसके बावजूद, जनता ने गांधीवादी अहिंसा का कठोरता से पालन किया, जिसने औपनिवेशिक सत्ता की क्रूरता को बेनकाब कर दिया।

  • प्रशासनिक लकवा: चौकीदारी कर रोके जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रिटिश नियंत्रण लगभग समाप्त हो गया।

सीमाएँ एवं अंतर्विरोध (Limitations and Contradictions)

  • किसान-जमींदार अंतर्विरोध: यह आंदोलन मुख्य रूप से कांग्रेस के उच्चवर्गीय/जमींदार नेतृत्व के अधीन था। जब ग्रामीण किसानों ने लगान माफी और बकाश्त भूमि (Bakasht Land) की वापसी का मुद्दा उठाया, तो कांग्रेस नेतृत्व ने जमींदारों को नाराज न करने की नीति अपनाई। इसी असंतोष के कारण स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929) ने अपना एक समानांतर और अधिक उग्र कृषक आंदोलन खड़ा किया।

  • मुस्लिम वर्ग की सीमित भागीदारी: असहयोग और खिलाफत आंदोलन (1920) की तुलना में, सविनय अवज्ञा आंदोलन में बिहार के मुस्लिम समुदाय की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही। 1920 के दशक के अंत में उभरी सांप्रदायिक राजनीति और ब्रिटिश सरकार की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने इस अलगाव को बढ़ाया।

  • भौगोलिक और रणनीतिक सीमाएँ: नमक कानून तोड़ना केवल एक प्रतीकात्मक कृत्य बनकर रह गया क्योंकि बिहार में बड़े पैमाने पर नमक उत्पादन संभव नहीं था।

स्वतंत्रता के पथ पर एक मील का पत्थर

सविनय अवज्ञा आंदोलन में बिहार का योगदान केवल नमक बनाने या कर न देने तक सीमित नहीं था; यह भारतीय जनमानस के भीतर से ब्रिटिश सत्ता के भय के पूर्ण निष्कासन का उद्घोष था। यद्यपि किसान-जमींदार अंतर्विरोध और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसी कुछ सीमाएँ विद्यमान थीं, फिर भी इस आंदोलन ने बिहार में राजनीतिक चेतना का अभूतपूर्व लोकतंत्रीकरण किया।

इसी जन-जागरूकता और संगठनात्मक ढांचे का परिणाम था कि भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत हुए 1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने बिहार में भारी बहुमत प्राप्त कर श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पहली निर्वाचित सरकार का गठन किया। वर्तमान में, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन) और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के मूल आदर्शों की जड़ें, बिहार में चौकीदारी कर विरोधी आंदोलन जैसे जन-नेतृत्व वाले अभियानों में ही खोजी जा सकती हैं, जो आज भी सुशासन और जन-भागीदारी (Citizen Participation) के लिए एक प्रकाश स्तंभ है।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1