असहयोग आंदोलन में बिहार की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें।

 Q. असहयोग आंदोलन में बिहार की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें।

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1920 में प्रारंभ हुआ असहयोग आंदोलन प्रथम अखिल भारतीय जन-आंदोलन था। चंपारण सत्याग्रह (1917) की ऐतिहासिक सफलता ने बिहार के जनमानस में पहले ही राजनीतिक चेतना और गांधीवादी नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास के बीज बो दिए थे। इसी पृष्ठभूमि के कारण, जब असहयोग का बिगुल बजा, तो बिहार की भूमिका अत्यंत सक्रिय, बहुआयामी और राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देशक रही।

असहयोग आंदोलन में बिहार की भूमिका को निम्नलिखित प्रमुख आयामों के अंतर्गत विश्लेषित किया जा सकता है:

संगठनात्मक और राजनीतिक सूत्रपात

आंदोलन को सुनियोजित रूप देने के लिए प्रांतीय स्तर पर व्यापक तैयारियां की गईं, जिसने आम जनता को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ा।

  • बिहार प्रांतीय सम्मेलन: अगस्त 1920 में भागलपुर में आयोजित 12वें बिहार प्रांतीय सम्मेलन (जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने की थी) में असहयोग के प्रस्ताव को पूर्ण समर्थन प्रदान किया गया।

  • नेतृत्व का विस्तार: आंदोलन के सुचारू संचालन के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मज़हर-उल-हक़, और ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं ने प्रांतीय कमेटियों के माध्यम से गाँव-गाँव तक कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रमों का प्रसार किया।

संस्थागत बहिष्कार और रचनात्मक कार्य

असहयोग की रणनीति के तहत ब्रिटिश संस्थाओं के समानांतर राष्ट्रीय संस्थाओं के निर्माण पर विशेष बल दिया गया।

शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार एवं राष्ट्रीय शिक्षा

  • छात्रों ने बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया। सैयद महमूद और जयप्रकाश नारायण जैसे युवा नेताओं ने अपनी उच्च शिक्षा बीच में ही छोड़ दी (जयप्रकाश नारायण ने परीक्षा में मात्र 20 दिन शेष रहते हुए पटना कॉलेज छोड़ा था)।

  • राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 6 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी द्वारा पटना में 'बिहार विद्यापीठ' और 'राष्ट्रीय महाविद्यालय' का औपचारिक उद्घाटन किया गया।

  • मज़हर-उल-हक़ को बिहार विद्यापीठ का कुलाधिपति (Chancellor) और ब्रजकिशोर प्रसाद को कुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त किया गया।

अदालतों और वकालत का बहिष्कार

  • न्यायिक प्रणाली का बहिष्कार करते हुए बिहार के शीर्ष अधिवक्ताओं ने अपनी लाभप्रद वकालत का त्याग कर दिया। इनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, श्री कृष्ण सिंह और मथुरा प्रसाद के नाम सर्वोपरि हैं।

  • विवादों के समाधान के लिए ग्राम पंचायतों और स्थानीय मध्यस्थता केंद्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया गया।

जन-जागरूकता और आश्रम व्यवस्था

  • सदाकत आश्रम की स्थापना: हिंदू-मुस्लिम एकता और रचनात्मक कार्यों के केंद्र के रूप में मज़हर-उल-हक़ ने पटना के दीघा में अपने मित्र खैरुद्दीन से प्राप्त भूमि पर 'सदाकत आश्रम' की स्थापना की।

  • 'द मदरलैंड' का प्रकाशन: इसी आश्रम से मज़हर-उल-हक़ ने 'द मदरलैंड' (The Motherland) नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया। इसके माध्यम से ब्रिटिश नीतियों की कटु आलोचना की गई और जनता में राष्ट्रीय भावना का संचार किया गया।

आर्थिक बहिष्कार और स्वदेशी का प्रसार

आर्थिक मोर्चे पर ब्रिटिश सत्ता को कमज़ोर करने के लिए बिहार में व्यापक स्तर पर अभियान चलाए गए।

  • विदेशी वस्त्रों की होली: पूरे प्रांत में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। कांग्रेस कमेटियों द्वारा घर-घर चरखा और खादी का वितरण किया गया, जिससे स्थानीय कुटीर उद्योगों को नवजीवन मिला।

  • मद्यनिषेध आंदोलन: शराब और ताड़ी की दुकानों पर महिलाओं और युवाओं द्वारा शांतिपूर्ण पिकेटिंग (धरना) की गई। इसका प्रभाव इतना गहरा था कि बिहार-उड़ीसा सरकार के आबकारी राजस्व (Excise Revenue) में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे सरकार को 'शराब पीने के लाभ' गिनाने के लिए बकायदा पर्चे बंटवाने पड़े।

समाज के विविध वर्गों का एकीकरण

इस आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता इसका सीमित शहरी वर्ग से निकलकर ग्रामीण और हाशिए के वर्गों तक पहुँचना था।

  • किसानों की भागीदारी: उत्तर बिहार (विशेषकर दरभंगा एवं सारण) में स्वामी विद्यानंद के नेतृत्व में किसानों ने दरभंगा राज के शोषणकारी नियमों के खिलाफ आवाज़ उठाई, जिसे असहयोग आंदोलन से वैचारिक और संगठनात्मक बल मिला।

  • जनजातीय चेतना: छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों में ताना भगतों (उरांव जनजाति) ने गांधीवादी आदर्शों को आत्मसात किया। उन्होंने मांस-मदिरा का त्याग किया और कर (Tax) न देने का संकल्प लेते हुए आंदोलन में अदम्य साहस का परिचय दिया।

  • प्रिंस ऑफ वेल्स का विरोध: 22 दिसंबर 1921 को जब प्रिंस ऑफ वेल्स का पटना आगमन हुआ, तो पूरे शहर में अभूतपूर्व हड़ताल रखी गई। सड़कें सुनसान रहीं और उन्हें काले झंडे दिखाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का कड़ा विरोध दर्ज किया गया।

चौरी-चौरा की हिंसक घटना (फरवरी 1922) के पश्चात महात्मा गांधी द्वारा आंदोलन को अचानक वापस लिए जाने से बिहार के नेताओं में निराशा अवश्य हुई, किंतु इससे उपजी चेतना क्षीण नहीं हुई। असहयोग आंदोलन ने बिहार की राजनीति के चरित्र को पूर्णतः रूपांतरित कर दिया। इसने राजनीति को कुलीन वर्ग के ड्राइंग रूम से निकालकर किसानों, जनजातियों, महिलाओं और छात्रों के बीच ला खड़ा किया। इसी मज़बूत राजनीतिक और संगठनात्मक आधारभूत ढांचे ने कालांतर में सविनय अवज्ञा (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में बिहार को राष्ट्रीय पटल पर नेतृत्वकारी भूमिका में स्थापित किया।

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