अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के दुरुपयोग को रोकने में एस. आर. बोम्मई केस के महत्व की चर्चा करें।
Q. अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के दुरुपयोग को रोकने में एस. आर. बोम्मई केस के महत्व की चर्चा करें।
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत वर्णित 'राष्ट्रपति शासन' (राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता) का प्रावधान केंद्र-राज्य संबंधों में ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक विवादास्पद रहा है। संविधान निर्माताओं ने इसे एक अंतिम विकल्प के रूप में परिकल्पित किया था, परंतु राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसका निरंतर दुरुपयोग हुआ। इस परिप्रेक्ष्य में, सर्वोच्च न्यायालय का एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) निर्णय भारतीय संघवाद और संवैधानिक न्यायशास्त्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जिसने इस अनुच्छेद के मनमाने प्रयोग पर प्रभावी अंकुश लगाया।
अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग और बिहार का संदर्भ
स्वतंत्रता के पश्चात दशकों तक अनुच्छेद 356 का उपयोग विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया गया।
आंकड़ों का विश्लेषण: 1994 से पूर्व 100 से अधिक बार इस अनुच्छेद का प्रयोग किया गया, जिनमें से अधिकांश निर्णय राजनीति से प्रेरित और मनमाने थे।
बिहार राज्य का अनुभव: बिहार में अब तक कुल 8 बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है (प्रथम बार 1968 में)। वर्ष 1999 और 2005 में बिहार विधानसभा भंग करने के विवादित निर्णयों ने भी इस अनुच्छेद की कमजोरियों को उजागर किया। 2005 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने रामेश्वर प्रसाद केस (2006) में विधानसभा भंग करने के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया था, जिसकी वैचारिक और विधिक नींव बोम्मई केस में ही रखी गई थी।
एस. आर. बोम्मई निर्णय (1994) के स्थापित सिद्धांत और महत्व
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केंद्र सरकार की शक्तियों को सीमित करते हुए निम्नलिखित ऐतिहासिक सिद्धांत प्रतिपादित किए, जिन्होंने राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग को रोका:
संवैधानिक और न्यायिक समीक्षा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति का शासन लागू करने का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है। यदि यह निर्णय दुर्भावनापूर्ण (Mala fide) या अप्रासंगिक आधारों पर लिया गया है, तो न्यायालय इसे रद्द कर सकता है।
शक्ति परीक्षण (Floor Test) की अनिवार्यता: किसी भी राज्य सरकार के बहुमत का निर्धारण राजभवन में राज्यपाल की व्यक्तिपरक राय के आधार पर नहीं, बल्कि केवल विधानसभा के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए।
विधानसभा का विघटन: संसदीय अनुमोदन प्राप्त होने तक राष्ट्रपति को विधानसभा भंग करने का अधिकार नहीं है। संसद की मंजूरी मिलने तक विधानसभा को केवल निलंबित (Suspended animation) ही रखा जा सकता है।
यथास्थिति बहाल करने की शक्ति: यदि न्यायालय अपनी जांच में पाता है कि राष्ट्रपति शासन असंवैधानिक रूप से लगाया गया है, तो उसे बर्खास्त राज्य सरकार और निलंबित विधानसभा को पुनः स्थापित करने का पूर्ण अधिकार है।
धर्मनिरपेक्षता मूल ढांचा है: न्यायालय ने 'धर्मनिरपेक्षता' को संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure) माना और स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध कार्य करने वाली राज्य सरकार को अनुच्छेद 356 के तहत बर्खास्त किया जा सकता है।
बोम्मई निर्णय का भारतीय राजनीति पर प्रभाव
| बोम्मई निर्णय से पूर्व की स्थिति | बोम्मई निर्णय के बाद की स्थिति |
| अनुच्छेद 356 का मनमाना और अत्यधिक प्रयोग। | इसके प्रयोग में भारी कमी आई (वास्तविक अंतिम विकल्प के रूप में)। |
| राज्यपाल की रिपोर्ट को अंतिम सत्य माना जाता था। | राजभवन की भूमिका न्यायिक जांच के दायरे में आ गई। |
| केंद्र सरकार असीमित शक्तियों का उपभोग करती थी। | केंद्र सरकार को न्यायालय के समक्ष पर्याप्त कारण और साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं। |
आगे की राह
संवैधानिक तंत्र की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि संघीय व्यवस्था में राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान किया जाए:
संस्थागत सुधार: सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग की सिफारिशों को पूर्णतः लागू किया जाना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 356 को अंतिम उपाय के रूप में सीमित करने की वकालत करते हैं।
राज्यपाल पद की गरिमा: राज्यपालों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी तथा दलगत राजनीति से मुक्त बनाया जाना चाहिए ताकि वे केंद्र के एजेंट के बजाय संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करें।
आंतरिक चेतावनी: राज्य सरकार को सीधे बर्खास्त करने से पूर्व केंद्र को अनुच्छेद 355 के तहत राज्य को चेतावनी देनी चाहिए और स्थिति सुधारने का अवसर प्रदान करना चाहिए।
संविधान सभा में डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने आशा व्यक्त की थी कि अनुच्छेद 356 एक 'मृत पत्र' (Dead Letter) बना रहेगा। एस. आर. बोम्मई मामले ने इस संवैधानिक भावना को न्यायिक रूप से लागू कर भारतीय संघवाद (Federalism) को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान की है। भविष्य में भी सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को सशक्त बनाने के लिए बोम्मई निर्णय के दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाना अनिवार्य है।