जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) ने कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में कैसे मदद की है? (GM फसलों के संदर्भ में)।
Q. जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) ने कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में कैसे मदद की है? (GM फसलों के संदर्भ में)।
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कृषि में जैव प्रौद्योगिकी और जीएम (GM) फसलें: उत्पादन एवं खाद्य सुरक्षा
भूमिका
बढ़ती वैश्विक आबादी, सिकुड़ती कृषि योग्य भूमि और जलवायु परिवर्तन के इस युग में, पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने में अपर्याप्त सिद्ध हो रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) विज्ञान का वह नवोन्मेषी आयाम है जो जीवों या उनके घटकों का उपयोग कर कृषि में अभूतपूर्व समाधान प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified - GM) फसलें—जिनके डीएनए (DNA) में जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से वांछित गुणों वाले बाहरी जीन प्रविष्ट कराए जाते हैं—सतत विकास लक्ष्य-2 (SDG-2: शून्य भुखमरी) को प्राप्त करने की दिशा में एक रणनीतिक और वैज्ञानिक उपकरण बन गई हैं।
कृषि उत्पादन बढ़ाने में जैव प्रौद्योगिकी (GM फसलों) का योगदान
GM फसलों के माध्यम से कृषि उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में गुणात्मक सुधार परिलक्षित हुए हैं:
कीट एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता (Pest and Disease Resistance): बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) जीवाणु से 'Cry' जीन निकालकर फसलों में डालने से वे स्वतः कीटनाशक प्रोटीन उत्पन्न करने लगती हैं। भारत में Bt कपास (Bt Cotton) की व्यावसायिक खेती (2002 से) ने बॉलवर्म कीट के प्रकोप को समाप्त कर कीटनाशकों के उपयोग को कम किया है और उत्पादन में भारी वृद्धि दर्ज की है।
अजैविक तनाव सहिष्णुता (Abiotic Stress Tolerance): जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़, लवणता और अत्यधिक तापमान जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। जैव प्रौद्योगिकी ने ऐसी GM फसलें विकसित की हैं जो इन प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन कर सकती हैं। इससे बंजर या कम उपजाऊ भूमि पर भी कृषि उत्पादन संभव हो पाया है।
शाकनाशी सहिष्णुता (Herbicide Tolerance - HT): HT फसलों (जैसे HT सोयाबीन या HT सरसों) में खरपतवार नाशकों को सहन करने की क्षमता होती है। इससे किसान मुख्य फसल को नुकसान पहुँचाए बिना रसायनों के छिड़काव से खरपतवार नष्ट कर सकते हैं, जिससे संसाधनों की प्रतिस्पर्धा कम होती है और फसल की उपज बढ़ती है।
खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने में भूमिका
खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि पोषण युक्त आहार की सुलभता भी है। इस दिशा में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
जैव-सुदृढ़ीकरण (Biofortification) और कुपोषण निवारण: GM तकनीक द्वारा फसलों के पोषण मूल्य में वृद्धि की जा रही है। इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण 'गोल्डन राइस' (Golden Rice) है, जिसमें डैफोडिल (Daffodil) पौधे के जीन का उपयोग कर प्रो-विटामिन A (बीटा-कैरोटीन) की मात्रा बढ़ाई गई है। यह विकासशील देशों में रतौंधी और कुपोषण की समस्या को दूर करने में एक क्रांतिकारी कदम है।
फसलों की शेल्फ-लाइफ (Shelf-life) में वृद्धि: फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (Post-harvest losses) खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। 'फ्लेवर सेवर' (Flavr Savr) टमाटर जैसी GM फसलें पकने की प्रक्रिया को धीमा कर देती हैं, जिससे परिवहन के दौरान उन्हें खराब होने से बचाया जा सकता है।
उच्च उत्पादकता से खाद्य आपूर्ति का स्थिरीकरण: प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ने से 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले देश की खाद्य मांग को पूरा करना संभव हुआ है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और बफर स्टॉक बनाए रखने में सहायता मिलती है।
बिहार के संदर्भ में जैव प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता
बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था और भौगोलिक जटिलताओं के समाधान में कृषि जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका अत्यंत निर्णायक है:
जलवायु-अनुकूल कृषि: उत्तर बिहार की चिरस्थायी बाढ़ और दक्षिण बिहार के सूखे की स्थिति को देखते हुए, 'स्वर्णा सब-1' (Swarna Sub-1) जैसी जल-प्लावित (Flood-tolerant) धान की किस्मों और सूखा-सहिष्णु बीजों का उपयोग पटना और बिहार के सभी जिलों में कृषि उत्पादन को स्थिर रखने के लिए अनिवार्य है।
पोषण सुरक्षा: पटना और बिहार के सभी जिलों में महिलाओं और बच्चों में एनीमिया एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (Micro-nutrient deficiency) एक गंभीर चिंता का विषय है। जिंक और आयरन से समृद्ध बायोफोर्टिफाइड फसलों का विस्तार राज्य की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक मजबूत नीतिगत कदम सिद्ध हो सकता है।
चुनौतियाँ और चिंताएँ (Challenges and Concerns)
पारिस्थितिक और पर्यावरणीय जोखिम: GM फसलों से जीन प्रवाह (Gene flow) के कारण 'सुपरवीड्स' (Superweeds) उत्पन्न होने तथा गैर-लक्षित जीवों (जैसे मधुमक्खियों और तितलियों) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है।
बौद्धिक संपदा और कॉर्पोरेट एकाधिकार: मोनसेंटो (Monsanto) जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज पेटेंट के कारण बीजों की लागत अधिक होती है, जो सीमांत और छोटे किसानों को ऋण जाल में फँसा सकती है।
मानव स्वास्थ्य पर अनिश्चित प्रभाव: लंबे समय तक GM खाद्य पदार्थों के सेवन से एलर्जी या एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antibiotic resistance) उत्पन्न होने की आशंकाएं पूर्णतः समाप्त नहीं हुई हैं।
नियामक बाधाएँ: भारत में जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) की मंजूरी प्रक्रिया लंबी और जटिल है, जिससे 'धारा सरसों हाइब्रिड-11' (DMH-11) जैसी स्वदेशी GM फसलों का व्यावसायिक उपयोग विवादों में घिरा रहता है।
आगे की राह (Way Forward)
जैव प्रौद्योगिकी निसंदेह खाद्य संकट का एक अत्यंत शक्तिशाली समाधान है, किंतु इसका उपयोग वैज्ञानिक प्रमाणों और कठोर नियामक ढांचे के अधीन होना चाहिए:
सशक्त नियामक संस्था: कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान और व्यावसायीकरण को विनियमित करने के लिए एक स्वतंत्र, पारदर्शी और वैज्ञानिक संस्था (जैसे प्रस्तावित BRAI - Biotechnology Regulatory Authority of India) का गठन आवश्यक है।
सार्वजनिक क्षेत्र में अनुसंधान: बीज कंपनियों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के R&D बजट में व्यापक वृद्धि की जानी चाहिए।
जैव-सुरक्षा (Biosafety): कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol) के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करते हुए फील्ड ट्रायल (Field Trials) की निगरानी मजबूत की जानी चाहिए।
तकनीक अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती, बल्कि उसका अनुप्रयोग उसका स्वरूप तय करता है। यदि उचित नीतिगत सुरक्षा उपायों के साथ जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए, तो यह भारतीय कृषि को न केवल आत्मनिर्भर बनाएगी, बल्कि समग्र राष्ट्रीय समृद्धि और खाद्य सुरक्षा का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।