भारत की ऊर्जा सुरक्षा में परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) के महत्व और इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों का विश्लेषण करें।
Q. भारत की ऊर्जा सुरक्षा में परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) के महत्व और इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों का विश्लेषण करें।
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भारत की ऊर्जा सुरक्षा में परमाणु ऊर्जा का महत्व और सुरक्षा चुनौतियाँ
भूमिका
भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसके लिए निर्बाध, धारणीय और लागत-प्रभावी ऊर्जा आपूर्ति राष्ट्र-निर्माण की प्राथमिक शर्त है। COP-26 (ग्लासगो) में भारत द्वारा वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए जाने के बाद, ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) की अनिवार्यता और बढ़ गई है। इस परिप्रेक्ष्य में, डॉ. होमी जहाँगीर भाभा द्वारा परिकल्पित 'त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम' (Three-Stage Nuclear Programme) के आधार पर विकसित परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy), भारत की ऊर्जा सुरक्षा टोकरी (Energy Security Basket) का एक रणनीतिक और अपरिहार्य घटक बन गई है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा में परमाणु ऊर्जा का महत्व
देश के सतत आर्थिक विकास में परमाणु ऊर्जा के रणनीतिक और पर्यावरणीय महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
बेसलोड ऊर्जा (Baseload Power) की निरंतरता: सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत मौसमी विविधताओं पर निर्भर (Intermittent) हैं। इसके विपरीत, परमाणु ऊर्जा संयंत्र 24×7 निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। यह भारी उद्योगों और निरंतर बढ़ती घरेलू मांग के लिए एक विश्वसनीय 'बेसलोड' प्रदान करता है।
कार्बन उत्सर्जन में कमी (Decarbonization): भारत वर्तमान में अपनी 50% से अधिक ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए कोयला आधारित ताप विद्युत (Thermal Power) पर निर्भर है। परमाणु ऊर्जा एक स्वच्छ स्रोत है, जिसके संचालन में ग्रीनहाउस गैसों (GHG) का उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। यह पेरिस जलवायु समझौते के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।
उच्च ऊर्जा घनत्व (High Energy Density): परमाणु ईंधन का ऊर्जा घनत्व अत्यंत उच्च होता है। यूरेनियम के एक छोटे से छर्रे (Pellet) से उत्पन्न ऊर्जा, एक टन कोयले या कई बैरल तेल के बराबर होती है। इससे ईंधन के परिवहन, भंडारण की लागत और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ न्यूनतम हो जाती हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता और थोरियम भंडार: भारत में यूरेनियम सीमित है, किंतु तटीय क्षेत्रों की मोनाज़ाइट रेत (Monazite Sand) के रूप में थोरियम का विश्व का सबसे बड़ा भंडार (लगभग 25%) मौजूद है। परमाणु कार्यक्रम के तीसरे चरण के पूर्ण होते ही, भारत जीवाश्म ईंधन के आयात निर्भरता (Import Dependency) से पूर्णतः मुक्त हो जाएगा।
बिहार के संदर्भ में ऊर्जा आवश्यकता और परमाणु ऊर्जा की प्रासंगिकता
तीव्र औद्योगिकीकरण, कृषि विद्युतीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण, पटना और बिहार के सभी जिलों में बिजली की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
राज्य वर्तमान में अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए मुख्य रूप से राष्ट्रीय ग्रिड और महंगी ताप विद्युत पर निर्भर है।
यद्यपि बिहार में कोई सक्रिय परमाणु संयंत्र नहीं है, किंतु राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु ऊर्जा का विस्तार राज्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। राष्ट्रीय ग्रिड में सस्ती और हरित बेसलोड ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ने से पटना और राज्य के सभी जिलों के कृषि फीडर (Agriculture Feeders) और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को निर्बाध बिजली मिलेगी, जो राज्य के समावेशी विकास को गति प्रदान करेगा।
सुरक्षा चुनौतियाँ और चिंताएँ
महत्वपूर्ण लाभों के बावजूद, परमाणु ऊर्जा के विस्तार के समक्ष कई गंभीर ढांचागत, पर्यावरणीय और विधिक चुनौतियाँ विद्यमान हैं:
परमाणु दुर्घटना और विकिरण का जोखिम (Risk of Accidents): चेरनोबिल (1986) और फुकुशिमा दाइची (2011) जैसी त्रासदियों ने विकिरण रिसाव के भयावह और दीर्घकालिक विनाशकारी प्रभावों को उजागर किया है। इसी कारण स्थानीय आबादी में अक्सर 'निमबी' (NIMBY - Not In My Backyard) सिंड्रोम और जन-विरोध (जैसे कुडनकुलम और जैतापुर संयंत्रों का विरोध) देखा जाता है।
रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन (Radioactive Waste Management): परमाणु संयंत्रों से निकलने वाले 'स्पेंट फ्यूल' (Spent Fuel) और अन्य कचरे का सुरक्षित निपटान एक अत्यंत जटिल भू-वैज्ञानिक चुनौती है। यह कचरा हजारों वर्षों तक अत्यधिक रेडियोधर्मी बना रहता है, जो भूजल संदूषण और पारिस्थितिक क्षरण का कारण बन सकता है।
भू-राजनीतिक और विधिक बाधाएँ: भारत का नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) का सदस्य न होना वैश्विक स्तर पर उन्नत तकनीकी और यूरेनियम आयात में बाधा उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, भारत के परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 (CLND Act) के कड़े प्रावधानों के कारण विदेशी आपूर्तिकर्ता (Suppliers) भारत में निवेश करने से झिझकते हैं।
साइबर सुरक्षा खतरे: आधुनिक परमाणु रिएक्टर डिजिटल नियंत्रण प्रणालियों (SCADA) पर अत्यधिक निर्भर हैं। विगत वर्षों में कुडनकुलम संयंत्र के नेटवर्क पर हुए साइबर हमले के प्रयास ने देश की महत्वपूर्ण अवसंरचना (Critical Infrastructure) की साइबर भेद्यता को रेखांकित किया है।
आगे की राह (Way Forward)
परमाणु ऊर्जा भारत की विकासात्मक आकांक्षाओं और पारिस्थितिक संतुलन के मध्य एक महत्वपूर्ण सेतु है। इसके सुरक्षित और धारणीय विस्तार के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:
विनियामक स्वायत्तता: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को पूर्ण वैधानिक शक्ति देकर एक स्वतंत्र नियामक संस्था में परिवर्तित किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक सुरक्षा मानकों (IAEA गाइडलाइंस) का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs): नीति आयोग की अनुशंसा के अनुरूप, बड़े संयंत्रों के स्थान पर SMRs के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। ये संयंत्र कम लागत, कम निर्माण समय और अधिक 'पैसिव सेफ्टी फीचर्स' (Passive Safety Features) से युक्त होते हैं।
पारदर्शी संवाद: स्थानीय समुदायों के साथ पारदर्शी संवाद स्थापित कर विकिरण से जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जाना चाहिए, ताकि भूमि अधिग्रहण और संयंत्र स्थापना में बाधा न आए।
ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्र की संप्रभुता का ही एक विस्तार है। स्वदेशी 'फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों' (FBR) के वाणिज्यिक संचालन को गति देकर और अपने सुरक्षा प्रोटोकॉल को सुदृढ़ कर, भारत न केवल अपनी विशाल ऊर्जा मांग को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक 'स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण' में एक मार्गदर्शक राष्ट्र के रूप में भी स्थापित हो सकता है।