जलवायु परिवर्तनः एक वैश्विक आपातकाल। (पर्यावरण विषय)
Q. जलवायु परिवर्तनः एक वैश्विक आपातकाल। (पर्यावरण विषय)
Ans -
जलवायु परिवर्तन: एक वैश्विक आपातकाल - विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
भूमिका
जलवायु परिवर्तन आज मात्र एक पर्यावरणीय विमर्श नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव सभ्यता के अस्तित्व के समक्ष सबसे गंभीर वैश्विक आपातकाल (Global Emergency) है। अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट ने इसे "मानवता के लिए कोड रेड" (Code Red for Humanity) करार दिया है। औद्योगिक क्रांति के बाद से अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों, विशेषकर ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण, पृथ्वी के औसत तापमान में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, वर्तमान वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक हो चुका है, जिसके परिणाम भौगोलिक सीमाओं को पार कर वैश्विक अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहे हैं।
वैश्विक आपातकाल के रूप में उभरने के प्रमुख कारण
जलवायु परिवर्तन की यह गति प्राकृतिक चक्र का हिस्सा न होकर मुख्यतः मानवजनित (Anthropogenic) है:
जीवाश्म ईंधनों का अनियंत्रित दोहन: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का अंधाधुंध उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है।
असतत औद्योगीकरण और शहरीकरण: बिना पारिस्थितिक संतुलन के तीव्र बुनियादी ढांचा विकास और ऊर्जा-गहन उद्योगों का विस्तार।
व्यापक निर्वनीकरण (Deforestation): कार्बन सिंक (Carbon Sinks) के रूप में कार्य करने वाले अमेज़न जैसे वैश्विक वर्षावनों का कृषि और वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए विनाश।
आधुनिक कृषि पद्धतियां: रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग और पशुपालन से मीथेन (CH4) तथा नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) का भारी मात्रा में उत्सर्जन।
बहुआयामी प्रभाव: क्यों यह एक आपातकाल है?
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव केवल तापमान वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक शृंखलाबद्ध आपदा का रूप ले चुका है:
चरम मौसमी घटनाएं (Extreme Weather Events): चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि, बेमौसम बारिश, और विनाशकारी वनाग्नि (Wildfires) एक सामान्य घटना बन गई हैं।
समुद्र के जलस्तर में वृद्धि: ग्लेशियरों के पिघलने से तटीय शहरों और द्वीपीय राष्ट्रों (Small Island Developing States) के डूबने का खतरा उत्पन्न हो गया है, जिससे भविष्य में जलवायु शरणार्थियों (Climate Refugees) का एक बड़ा संकट खड़ा होगा।
आर्थिक एवं कृषि संकट: विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि उत्पादकता में भारी गिरावट आ सकती है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
बिहार के विशेष संदर्भ में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
अपनी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के कारण बिहार जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक सुभेद्य (Vulnerable) है:
बाढ़ और सूखे का दोहरा संकट: राज्य के पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन देखा जा रहा है। एक ओर जहाँ कोसी और गंडक बेसिन में बेमौसम और तीव्र वर्षा से विनाशकारी बाढ़ आती है, वहीं दूसरी ओर मानसून की अनिश्चितता के कारण राज्य के दक्षिणी हिस्सों में गंभीर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।
तापमान में वृद्धि और लू (Heatwaves): वर्तमान में पटना और बिहार के सभी ज़िलों में ग्रीष्मकाल के दौरान लू (Heatwaves) का प्रकोप और अवधि चिंताजनक रूप से बढ़ी है, जिससे न केवल जनस्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि रबी और खरीफ दोनों फसलों की उत्पादकता में भी कमी आ रही है।
प्रशासनिक पहल: इस आपातकाल से निपटने के लिए बिहार सरकार द्वारा 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान चलाया जा रहा है, जो सूक्ष्म सिंचाई, वृक्षारोपण और जल संचयन के माध्यम से जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) का एक उत्कृष्ट मॉडल है।
प्रमुख चुनौतियाँ
इस वैश्विक आपातकाल से निपटने में कुछ गंभीर संस्थागत और कूटनीतिक बाधाएं हैं:
समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR): विकसित और विकासशील देशों के बीच ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी को लेकर लगातार विवाद की स्थिति है।
जलवायु वित्त (Climate Finance) का अभाव: विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर प्रदान करने की प्रतिबद्धता अभी तक पूर्ण रूप से ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाई है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): हरित और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर पेटेंट और उच्च लागत के कारण गरीब राष्ट्रों तक इनकी पहुँच सीमित है।
आगे की राह एवं समाधान
इस अस्तित्वगत संकट का समाधान केवल कूटनीतिक सम्मेलनों (COPs) से नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सामूहिक और नीतिगत कार्रवाइयों से संभव है:
संवैधानिक और नैतिक दायित्व: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है, तथा अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है। इन प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता है।
'पंचामृत' लक्ष्यों की प्राप्ति: COP26 में भारत द्वारा प्रस्तुत 2070 तक 'नेट ज़ीरो' (Net Zero) उत्सर्जन का लक्ष्य, और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को 500 GW तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता को मिशन मोड में पूरा करना होगा।
मिशन लाइफ (Mission LiFE): नीति आयोग द्वारा समर्थित 'पर्यावरण के लिए जीवन शैली' (Lifestyle for Environment) को एक वैश्विक जन-आंदोलन बनाने की आवश्यकता है, जो उपभोगवादी संस्कृति को सतत प्रथाओं में बदल सके।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) जैसे भारतीय नेतृत्व वाले वैश्विक मंचों को और अधिक वित्तीय व तकनीकी शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।
महात्मा गांधी ने कहा था, "पृथ्वी हर इंसान की ज़रूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी के लालच की नहीं।" जलवायु परिवर्तन रूपी वैश्विक आपातकाल इस कथन की सत्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। इसका समाधान केवल सरकारों के तकनीकी उपायों में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के सतत विकास (Sustainable Development) और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व में निहित है।