शॉर्ट नोट्स: डार्क वेब और डीप वेब।

 Q. शॉर्ट नोट्स: डार्क वेब और डीप वेब।

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भूमिका

वर्तमान डिजिटल युग में इंटरनेट सूचनाओं का एक महासागर है, जिसे तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा 'आइसबर्ग' (Iceberg) मॉडल के माध्यम से समझा जाता है। इंटरनेट का केवल 4-5% हिस्सा ही सामान्य सर्च इंजनों (जैसे- Google या Bing) द्वारा अनुक्रमित (Indexed) होता है, जिसे 'सरफेस वेब' (Surface Web) कहा जाता है। शेष 95% से अधिक हिस्सा डीप वेब और डार्क वेब के अंतर्गत आता है। हालिया साइबर सुरक्षा रिपोर्टों और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के अनुसार, इंटरनेट के इन छिपे हुए हिस्सों (विशेषकर डार्क वेब) का बढ़ता दायरा और जटिलता, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और डेटा गोपनीयता के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है।

डीप वेब और डार्क वेब: अवधारणा एवं बहुआयामी विश्लेषण

इंटरनेट के इन दोनों अप्रत्यक्ष हिस्सों की कार्यप्रणाली, उपयोग और प्रभाव भिन्न-भिन्न हैं, जिन्हें निम्नलिखित उप-शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:

1. डीप वेब (Deep Web): ई-गवर्नेंस और डेटा सुरक्षा का आधार

  • परिभाषा: डीप वेब इंटरनेट का वह अदृश्य भाग है जो पारंपरिक सर्च इंजनों द्वारा अनुक्रमित (Index) नहीं किया जाता है। इसे एक्सेस करने के लिए विशिष्ट URL, पासवर्ड या प्रमाणीकरण (Authentication) की आवश्यकता होती है।

  • प्रमुख उपयोग: इसमें सरकार और निजी संस्थानों का गोपनीय डेटा, बैंकिंग पासवर्ड, ई-मेल खाते, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, ऑनलाइन शोध पत्र और अकादमिक डेटाबेस शामिल होते हैं।

  • प्रशासनिक महत्व और बिहार का संदर्भ: भारत और राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण डेटाबेस डीप वेब का ही सुरक्षित हिस्सा हैं। उदाहरण के लिए, पुलिस नेटवर्क CCTNS (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स), बिहार का ई-डिस्ट्रिक्ट (e-District) पोर्टल, और 'बिहार लोक सेवा अधिकार अधिनियम' (RTPS) का डेटाबेस डीप वेब के माध्यम से ही नागरिक गोपनीयता और सुशासन (Good Governance) सुनिश्चित करते हैं।

2. डार्क वेब (Dark Web): तकनीकी जटिलता और अवैध गतिविधियाँ

  • परिभाषा: डार्क वेब, डीप वेब का ही एक छोटा लेकिन अत्यधिक एन्क्रिप्टेड (Encrypted) और छिपा हुआ हिस्सा है। इसे सामान्य ब्राउज़र (जैसे- Chrome) से एक्सेस नहीं किया जा सकता।

  • तकनीकी आधार: इसके लिए विशिष्ट ब्राउज़रों जैसे 'टॉर' (The Onion Router - Tor) या I2P की आवश्यकता होती है। यह 'ओनियन राउटिंग' तकनीक पर काम करता है, जो डेटा ट्रैफ़िक को दुनिया भर के कई सर्वरों के माध्यम से बाउंस करता है, जिससे उपयोगकर्ता का IP एड्रेस और वास्तविक पहचान पूरी तरह गुप्त (Anonymous) रहती है।

  • सकारात्मक उपयोग: तानाशाही या दमनकारी शासन वाले देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स (Whistleblowers) द्वारा सूचनाओं को सुरक्षित रूप से साझा करने के लिए इसका उपयोग होता है।

  • नकारात्मक उपयोग (साइबर अपराध का केंद्र): पहचान की शून्यता के कारण यह संगठित अपराध का पनाहगाह बन गया है। यहाँ क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) के माध्यम से अवैध हथियारों, मादक पदार्थों, बाल पोर्नोग्राफी, और साइबर मालवेयर (जैसे- पेगासस या रैंसमवेयर) की खरीद-फरोख्त होती है।

कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष चुनौतियाँ

  • पहचान और साक्ष्य की शून्यता: डार्क वेब पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के कारण साइबर अपराधियों को ट्रैक करना और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत न्यायालय में उनके खिलाफ डिजिटल साक्ष्य (Digital Evidence) प्रस्तुत करना कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEAs) के लिए अत्यंत कठिन होता है।

  • टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग: वित्तीय लेन-देन 'बिटकॉइन' (Bitcoin) जैसी अनाम वर्चुअल मुद्राओं में होने के कारण आतंकवाद के वित्तपोषण को ट्रैक करना एक बड़ी विधिक और तकनीकी चुनौती है।

  • साइबर ठगी के उभरते नेटवर्क: जामताड़ा या मेवात जैसे साइबर अपराध हब अब डार्क वेब से लोगों का संवेदनशील डेटा (क्रेडिट कार्ड की जानकारी, आधार विवरण) खरीदकर बिहार सहित पूरे देश में आर्थिक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं।

भारत एवं बिहार के स्तर पर उठाए गए कदम

  • विधिक प्रावधान: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 की धारा 43, 66 और 67 के तहत साइबर अपराधों को दंडनीय बनाया गया है।

  • राष्ट्रीय संस्थागत उपाय: राष्ट्रीय स्तर पर CERT-In (Indian Computer Emergency Response Team) नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रही है, और गृह मंत्रालय के अधीन I4C (Indian Cyber Crime Coordination Centre) की स्थापना की गई है।

  • बिहार के संदर्भ में: बिहार सरकार ने साइबर अपराधों पर त्वरित कार्रवाई हेतु हाल ही में राज्य के सभी 38 जिलों में 44 डेडिकेटेड साइबर पुलिस स्टेशन स्थापित किए हैं। इसके अतिरिक्त, बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) को उन्नत साइबर फोरेंसिक उपकरणों से लैस किया जा रहा है ताकि डार्क वेब पर संचालित अवैध सिंडिकेट्स को नष्ट किया जा सके।

आगे की राह (Way Forward)

  • उन्नत तकनीकी अवसंरचना का विकास: पुलिस बलों को डार्क वेब की निगरानी हेतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित 'डार्क वेब क्रॉलर्स' (Dark Web Crawlers) और उन्नत ब्लॉकचेन एनालिटिक्स टूल्स के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

  • अंतरराष्ट्रीय विधिक सहयोग: डार्क वेब की सीमाहीन (Borderless) प्रकृति को देखते हुए, भारत को 'बुडापेस्ट कन्वेंशन' (Budapest Convention) जैसी वैश्विक संधियों के प्रावधानों के अनुरूप इंटरपोल (INTERPOL) के साथ मजबूत सूचना-साझाकरण नेटवर्क स्थापित करना चाहिए।

  • डिजिटल साक्षरता और साइबर स्वच्छता: नागरिकों के बीच उनके डेटा की सुरक्षा और डार्क वेब के खतरों के प्रति व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

इंटरनेट का निरंतर विस्तार एक दोधारी तलवार के समान है। जहाँ एक ओर डीप वेब 'डिजिटल इंडिया' और ई-गवर्नेंस की रीढ़ है, जो नागरिकों के डेटा को सुरक्षित रखता है, वहीं डार्क वेब साइबर आतंकवाद और संगठित अपराध का एक परिष्कृत केंद्र बन गया है। भारत, और विशेषकर बिहार को, सुशासन के अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु तकनीकी आधुनिकीकरण और मजबूत कानूनी ढांचे के बीच एक रणनीतिक संतुलन स्थापित करना होगा। एक सुरक्षित साइबर स्पेस ही एक सशक्त और आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव रख सकता है।

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