'पानी में मछरी, नौ-नौ कुटिया बखरा' (भविष्य की अनिश्चितता पर बिहारी लोकोक्ति)।
Q. 'पानी में मछरी, नौ-नौ कुटिया बखरा' (भविष्य की अनिश्चितता पर बिहारी लोकोक्ति)।
Ans -
भूमिका
बिहारी लोक-संस्कृति और जनमानस में रची-बसी लोकोक्तियां मात्र भाषाई अलंकार नहीं हैं, बल्कि वे मानव व्यवहार और प्रशासनिक यथार्थ के गहरे दार्शनिक सूत्रों को समेटे हुए हैं। प्रसिद्ध लोकोक्ति 'पानी में मछरी, नौ-नौ कुटिया बखरा' (अर्थात: मछली अभी पानी में ही है, लेकिन उसके नौ-नौ हिस्से पहले ही बाँट लिए गए हैं) भविष्य की अनिश्चितताओं, अति-आत्मविश्वास और समय-पूर्व अनुमानित लाभों के काल्पनिक वितरण पर एक तीखा व्यंग्य है।
लोक प्रशासन, अर्थव्यवस्था और नीति-निर्माण के आधुनिक संदर्भ में, यह उक्ति वित्तीय अविवेक (Fiscal Imprudence), लोकलुभावनवाद (Populism) और बिना संसाधन जुटाए काल्पनिक घोषणाओं (Unfunded Mandates) की प्रवृत्ति का सटीक वर्णन करती है। एक कल्याणकारी राज्य में जहाँ नीतियां ज़मीनी वास्तविकता पर आधारित होनी चाहिए, वहां भविष्य के संभावित और अनिश्चित लाभों पर नीतियां बनाना न केवल प्रशासनिक विफलता को जन्म देता है, बल्कि राज्य को गंभीर राजकोषीय संकट की ओर भी धकेल सकता है।
नीति-निर्माण एवं सुशासन में लोकोक्ति की प्रासंगिकता
प्रशासनिक कार्यप्रणाली में 'काल्पनिक मछली का बंटवारा' कई स्तरों पर नीतिगत विसंगतियों को उत्पन्न करता है:
1. राजकोषीय प्रबंधन और लोकलुभावनवाद
मुफ्तखोरी की राजनीति (Freebie Culture): चुनाव पूर्व राजनीतिक दलों द्वारा राजस्व प्राप्ति का ठोस आकलन किए बिना मुफ्त बिजली, पानी या ऋण माफी की घोषणाएं करना इसी लोकोक्ति का साक्षात रूप है।
FRBM अधिनियम का उल्लंघन: राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम राज्य को राजकोषीय घाटा GSDP के 3% (विशेष परिस्थितियों में 4%) तक सीमित रखने का निर्देश देता है। परंतु, अनुमानित राजस्व (पानी की मछली) के आधार पर अत्यधिक व्यय (बखरा) राजकोषीय अनुशासनहीनता को बढ़ावा देता है।
2. योजना निर्माण और क्रियान्वयन में अंतराल
डेटा और साक्ष्यों का अभाव: बिना प्रामाणिक आंकड़ों के वातानुकूलित कमरों में नीतियां बनाना और यह मान लेना कि संसाधन स्वतः उत्पन्न हो जाएंगे, 'नीतिगत पंगुता' का एक बड़ा कारण है।
अपूर्ण आधारभूत संरचना परियोजनाएं: परियोजनाओं का शिलान्यास बिना भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंजूरी सुनिश्चित किए कर देना। परिणामतः, धन आवंटित होने के बावजूद परियोजनाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं।
बिहार के विशेष संदर्भ में विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
बिहार के भौगोलिक, आर्थिक और निवेश परिदृश्य में इस लोकोक्ति के मर्म को अत्यंत सतर्कता से समझे जाने की आवश्यकता है। राज्य के संतुलित विकास के लिए यह अनिवार्य है कि कागजी घोषणाएं वास्तविक धरातल पर उतरें।
निवेश सम्मेलनों की यथार्थता: औद्योगिक विकास के लिए होने वाले इन्वेस्टर्स मीट में अक्सर हजारों करोड़ के MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर होते हैं, जिन्हें तुरंत ही बड़ी उपलब्धि मान लिया जाता है (मछली का बंटवारा)। परंतु वास्तविक सफलता तब है जब ये निवेश केवल कागजों पर न रहकर, पटना और बिहार के सभी ज़िलों में प्रत्यक्ष रूप से उद्योगों और रोजगार के रूप में स्थापित हों।
कृषि क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता: बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। मानसून के पूर्वानुमान पर ही राज्य की आर्थिक वृद्धि (GSDP) का अनुमान लगा लेना जोखिम भरा है, क्योंकि उत्तर बिहार की बाढ़ (कोसी, गंडक) और दक्षिण बिहार का सूखा पल भर में लहलहाती फसलों को नष्ट कर सकता है। ऐसे में, फसल कटाई से पूर्व ही उसका आर्थिक वितरण तय कर लेना प्रशासनिक अदूरदर्शिता है।
बजटीय आवंटन बनाम वास्तविक व्यय: बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े कई बार यह दर्शाते हैं कि कुछ विभागों में आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा वित्तीय वर्ष के अंत तक खर्च ही नहीं हो पाता। योजनाएं बनती हैं, धन का 'बखरा' (बंटवारा) होता है, लेकिन 'मछली' (परिणाम) पकड़ में नहीं आती।
इस प्रवृत्ति के व्यापक दुष्परिणाम
बिना संसाधनों की सुनिश्चितता के हवा-हवाई नीतियां बनाने के कई गंभीर परिणाम सामने आते हैं:
विश्वसनीयता का संकट (Trust Deficit): जब सरकार द्वारा किए गए वादे ज़मीन पर नहीं उतरते, तो शासन और नागरिकों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो जाती है।
कर्ज का जाल (Debt Trap): संभावित आय के आधार पर वर्तमान में अंधाधुंध खर्च करने से राज्य भारी कर्ज के जाल में फंस जाता है, जिसका सीधा प्रभाव शिक्षा और स्वास्थ्य (सामाजिक पूंजी) पर होने वाले व्यय पर पड़ता है।
संसाधनों का अपव्यय: अनियोजित परियोजनाओं में लगाया गया प्रारंभिक धन भी व्यर्थ हो जाता है, जिससे नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) में राज्य के प्रदर्शन पर नकारात्मक असर पड़ता है।
आगे की राह (यथार्थवादी और साक्ष्य-आधारित प्रशासन)
इस 'काल्पनिक बंटवारे' की प्रवृत्ति से बाहर निकलने के लिए प्रशासन को 'आउटपुट' (धन के आवंटन) से अधिक 'आउटकम' (वास्तविक परिणाम) पर केंद्रित होना होगा:
आउटकम बजट (Outcome Budgeting) को अपनाना: केवल योजनाओं के लिए धन आवंटित (बखरा) करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिणामों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
साक्ष्य-आधारित नीति (Evidence-Based Policy): नीतियों का निर्माण भावनाओं या काल्पनिक अनुमानों के बजाय 'बिग डेटा' (Big Data) और ई-गवर्नेंस के ठोस आंकड़ों पर किया जाना चाहिए।
संस्थागत क्षमता निर्माण: परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करते समय भूमि, वित्त और तकनीकी चुनौतियों का यथार्थवादी मूल्यांकन (Feasibility Study) अनिवार्य किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
'पानी में मछरी, नौ-नौ कुटिया बखरा' लोकोक्ति आधुनिक प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि यथार्थवादी संसाधनों के बिना की गई कोरी कल्पनाएं अंततः विफलता का कारण बनती हैं। संविधान के अनुच्छेद 293 (राज्यों द्वारा उधार लेना) और वित्तीय अनुशासन के कठोर अनुपालन के बिना कोई भी विकास योजना सफल नहीं हो सकती। बिहार के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य की नीतियां लोकलुभावन घोषणाओं के मायाजाल से बाहर आएं और संसाधन-आधारित यथार्थवादी मॉडल पर कार्य करें। जब विकास योजनाएं पटना और बिहार के सभी ज़िलों में समान और सुनिश्चित संसाधनों के साथ धरातल पर उतरेंगी, तभी राज्य 'संभावित' लाभांश को 'वास्तविक' सुशासन में बदल सकेगा।