युवा और रोजगारः भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कहीं 'जनसांख्यिकीय आपदा' न बन जाए।

 Q. युवा और रोजगारः भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कहीं 'जनसांख्यिकीय आपदा' न बन जाए।

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भूमिका

किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में कार्यशील जनसंख्या (15-59 वर्ष) की अधिकता को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) द्वारा 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) के रूप में परिभाषित किया गया है। वर्तमान में भारत विश्व का सबसे युवा देश है, जहाँ की औसत आयु (Median Age) लगभग 28 वर्ष है। जनसांख्यिकीय लाभांश की यह खिड़की भारत के लिए 2055 तक खुली हुई है। किंतु, हाल ही में जारी अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 'भारत रोजगार रिपोर्ट 2024' इस बात की पुष्टि करती है कि देश में बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 83% है। यदि इस विशाल युवा ऊर्जा को उचित शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसरों से नहीं जोड़ा गया, तो यह लाभांश एक गंभीर 'जनसांख्यिकीय आपदा' (Demographic Disaster) में परिवर्तित हो सकता है।

जनसांख्यिकीय आपदा की ओर धकेलने वाले अंतर्निहित कारण

भारत के युवा वर्ग और रोजगार बाजार के मध्य एक गहरी खाई उत्पन्न हो गई है, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • रोजगारविहीन संवृद्धि (Jobless Growth): भारत की आर्थिक वृद्धि मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र (Service Sector) द्वारा संचालित है, जो पूंजी-गहन है न कि श्रम-गहन। विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान लगभग 16-17% पर स्थिर है, जो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में विफल रहा है।

  • कौशल और बाजार की मांग में बेमेल (Skill Deficit): इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत के लगभग 50% स्नातक ही रोजगार के योग्य (Employable) हैं। शिक्षण संस्थानों का पाठ्यक्रम 'इंडस्ट्री 4.0' (AI, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स) की आधुनिक मांगों से मेल नहीं खाता है।

  • कृषि क्षेत्र में प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment): देश का एक बड़ा युवा वर्ग आज भी पारंपरिक कृषि में संलिप्त है, जहाँ उनकी सीमांत उत्पादकता शून्य है। यह एक अदृश्य बेरोजगारी है जो मानव पूंजी का अपव्यय करती है।

  • अनौपचारिक क्षेत्र का वर्चस्व: रोजगार प्राप्त युवाओं में से लगभग 80% से अधिक अनौपचारिक क्षेत्र (असंगठित क्षेत्र) में कार्यरत हैं, जहाँ सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य लाभ और उचित वेतन का सर्वथा अभाव है।

जनसांख्यिकीय आपदा के गंभीर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

यदि समय रहते रोजगार सृजन की गति को नहीं बढ़ाया गया, तो इसके अत्यंत नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं:

  • सामाजिक अस्थिरता और अपराध: रोजगार का अभाव युवाओं में कुंठा और निराशा (Demographic Frustration) को जन्म देता है, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है और संगठित अपराधों में वृद्धि होती है।

  • मानव पूंजी का पलायन (Brain Drain): प्रतिभाओं को देश के भीतर उचित मंच न मिलने के कारण वे विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे राष्ट्र अपनी सर्वश्रेष्ठ मेधा से वंचित हो रहा है।

  • आर्थिक विषमता: नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार, रोजगार की कमी सीधे तौर पर आय की असमानता और वंचना के दुष्चक्र को बढ़ावा देती है।

बिहार के विशेष संदर्भ में यथार्थ एवं चुनौतियां

बिहार भारत का सबसे युवा राज्य है, जहाँ बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कार्यशील जनसंख्या का अनुपात सर्वाधिक है। किंतु, यही राज्य देश में सबसे अधिक पलायन (Migration) की समस्या से भी जूझ रहा है।

  • औद्योगिक पिछड़ेपन की मार: राज्य में भारी उद्योगों और सेवा क्षेत्र के आईटी हब का अभाव है। युवा कार्यबल अकुशल मजदूर (Unskilled labor) के रूप में अन्य राज्यों पर निर्भर है।

  • असमान क्षेत्रीय विकास: राज्य में आधारभूत संरचना और रोजगार के अवसरों का असमान वितरण एक बड़ी बाधा है। यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य की रोजगार नीतियां और बुनियादी ढांचे का विकास किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर पटना और बिहार के सभी ज़िलों में विकेंद्रीकृत रूप से लागू किया जाए।

  • कृषि-आधारित उद्योगों का अभाव: मखाना, लीची और जर्दालू आम जैसे कृषि उत्पादों की प्रचुरता के बावजूद, सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSME) का जाल सभी ज़िलों में व्यापक रूप से नहीं फैल सका है।

आपदा को अवसर में बदलने के उपाय (समाधान)

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का प्रभावी क्रियान्वयन: शिक्षा को रटंत विद्या से मुक्त कर व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) और कौशल विकास को स्कूली स्तर से ही अनिवार्य किया जाना चाहिए।

  • विनिर्माण और MSME को प्रोत्साहन: सरकार की PLI योजना (Production Linked Incentive) और 'मेक इन इंडिया' को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी बनाकर श्रम-गहन उद्योगों (जैसे- कपड़ा, चमड़ा, खाद्य प्रसंस्करण) को बढ़ावा देना होगा।

  • कृषि-उद्यमिता (Agri-Entrepreneurship): युवाओं को केवल पारंपरिक खेती से हटाकर खाद्य प्रसंस्करण, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और एग्री-स्टार्टअप्स के लिए सस्ती पूंजी और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।

  • गिग इकॉनमी (Gig Economy) का विनियमन: आधुनिक अर्थव्यवस्था में गिग और प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार तेजी से बढ़ रहे हैं। इनके लिए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधानों को कड़ाई से लागू करना आवश्यक है।

आगे की राह

अमर्त्य सेन के 'क्षमता दृष्टिकोण' (Capability Approach) के अनुसार, मानव संसाधन का वास्तविक मूल्य उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल में निहित है। भारत और विशेषकर बिहार को यह समझना होगा कि युवा आबादी स्वतः कोई वरदान नहीं है; यह एक संभावना है जिसे नीतियों के माध्यम से यथार्थ में बदलना पड़ता है। जनसांख्यिकीय लाभांश को आपदा बनने से रोकने के लिए एक 'मिशन मोड' दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जहाँ सरकार, निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थान मिलकर एक ज्ञान-आधारित समावेशी अर्थव्यवस्था का निर्माण करें। जब राज्य की नीतियां पटना से लेकर राज्य के हर सुदूर ज़िले के युवाओं के हाथों में कौशल और रोजगार सुनिश्चित करेंगी, तभी भारत 2047 तक एक 'विकसित राष्ट्र' के अपने संकल्प को सिद्ध कर सकेगा।

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