जातिवादः बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा या राजनीतिक यथार्थ?
Q. जातिवादः बिहार के विकास में सबसे बड़ी बाधा या राजनीतिक यथार्थ?
Ans -
भूमिका
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और विशेषकर बिहार के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में 'जाति' मात्र एक पहचान नहीं, बल्कि सत्ता और संसाधन वितरण का एक प्रमुख आधार है। स्वतंत्रता के पश्चात से ही बिहार का राजनीतिक परिदृश्य जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। जब हम इस प्रश्न का विश्लेषण करते हैं कि जातिवाद विकास में बाधा है या एक राजनीतिक यथार्थ, तो इसे किसी एक श्वेत-श्याम (Black & White) चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह एक जटिल सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता है, जिसने एक ओर 'सामाजिक न्याय' (Social Justice) की राजनीति को जन्म दिया, तो दूसरी ओर 'सुशासन' (Good Governance) और आर्थिक विकास की गति को अवरुद्ध भी किया। हाल ही में संपन्न बिहार जाति आधारित गणना (2023) ने इस विमर्श को पुनः प्रासंगिक बना दिया है, जहाँ जाति आज भी नीति-निर्माण और राजनीतिक लामबंदी का केंद्र बनी हुई है।
राजनीतिक यथार्थ के रूप में जातिवाद: सामाजिक न्याय का उपकरण
बिहार के संदर्भ में जाति को केवल एक नकारात्मक तत्व मान लेना जमीनी यथार्थ की अनदेखी होगी। 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद, बिहार में हुए राजनीतिक सत्ता-हस्तांतरण ने इसे एक मजबूत राजनीतिक यथार्थ के रूप में स्थापित किया:
हाशियाकृत वर्गों का राजनीतिकरण: जाति आधारित राजनीति ने सदियों से वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों (OBC, SC, ST) को राजनीतिक चेतना प्रदान की। इसने सत्ता का विकेंद्रीकरण कर उच्च जातियों के एकाधिकार को तोड़ा और लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया।
संविधान के आदर्शों की पूर्ति: राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 38 (कल्याणकारी राज्य) और अनुच्छेद 46 (कमजोर वर्गों के आर्थिक और शैक्षिक हितों की अभिवृद्धि) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जाति एक महत्वपूर्ण पहचानकर्ता (Identifier) बनी।
लक्षित कल्याणकारी नीतियां (Targeted Welfare): बिहार जाति आधारित गणना (2023) के आंकड़े दर्शाते हैं कि राज्य सरकार द्वारा आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75% करना (EWS सहित) इसी यथार्थ का परिणाम है, ताकि आबादी के अनुपात में संसाधनों का न्यायसंगत वितरण हो सके।
विकास में सबसे बड़ी बाधा के रूप में जातिवाद
यद्यपि जाति ने राजनीतिक सशक्तिकरण किया, परंतु एक प्रशासक के दृष्टिकोण से यह राज्य के आर्थिक और संस्थागत विकास में एक गंभीर बाधा भी सिद्ध हुई है:
1. प्रशासनिक एवं संस्थागत चुनौतियां
योग्यता (Meritocracy) का ह्रास: जब नियुक्तियों, पदस्थापना (Postings) और प्रशासनिक निर्णयों में जातिगत निष्ठा को योग्यता से अधिक प्राथमिकता दी जाती है, तो यह 'नीतिगत पंगुता' (Policy Paralysis) और लालफीताशाही को जन्म देता है।
अपराधीकरण और बाहुबल (Criminalization of Politics): जातिगत गोलबंदी ने राजनीति में बाहुबलियों को संरक्षण दिया। वोहरा समिति की रिपोर्ट के अनुसार, राजनीति और अपराध का यह गठजोड़ बिहार के औद्योगिक और ढांचागत विकास के लिए सबसे बड़ा अवरोध रहा।
2. आर्थिक और विकासात्मक प्रभाव
पहचान आधारित मतदान (Identity-based Voting): लोकतंत्र में चुनाव विकास कार्यों (सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य) पर लड़े जाने चाहिए। परंतु, जब मतदाता जाति के आधार पर वोट देते हैं, तो राजनीतिक दलों से विकास और जवाबदेही (Accountability) की बाध्यता समाप्त हो जाती है।
आर्थिक पिछड़ापन: नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि राज्य का सामाजिक पूंजी (Social Capital) जातियों में खंडित है, जो एक सामूहिक आर्थिक दृष्टि (Collective Economic Vision) के निर्माण में बाधा उत्पन्न करता है।
आगे की राह (Way Forward)
बिहार को अपने ऐतिहासिक गौरव और आर्थिक सामर्थ्य को पुनः प्राप्त करने के लिए 'जातिगत पहचान' से परे जाकर एक आधुनिक विकास-उन्मुख प्रतिमान (Development-oriented Paradigm) अपनाना होगा:
सामाजिक न्याय से आर्थिक न्याय की ओर संक्रमण: नीतियां अब केवल जातियों के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनका ध्यान कौशल विकास, औद्योगिकीकरण और निवेश आकर्षण पर केंद्रित होना चाहिए।
समग्र और विकेंद्रीकृत विकास: राज्य के संसाधनों और आधारभूत ढांचे का विकास किसी जाति-विशेष या क्षेत्र-विशेष के प्रभाव से मुक्त होना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि विकास की यह धारा केवल कुछ प्रमुख केंद्रों तक सीमित न रहकर पटना और बिहार के सभी ज़िलों में समान रूप से प्रवाहित हो।
शिक्षा और मानव पूंजी का निर्माण: अमर्त्य सेन के 'क्षमता दृष्टिकोण' (Capability Approach) को अपनाते हुए राज्य को शिक्षा और स्वास्थ्य पर जीडीपी का निवेश बढ़ाना होगा। एक शिक्षित और जागरूक नागरिक ही जातिगत आग्रहों से मुक्त होकर विकास के लिए मतदान कर सकता है।
जाति बिहार का एक अकाट्य राजनीतिक यथार्थ अवश्य है, परंतु इसे विकास का गतिरोधक (Speed Breaker) बनने से रोकना प्रशासन और समाज दोनों का दायित्व है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था कि "जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर लेते, कानून द्वारा प्रदान की गई कोई भी स्वतंत्रता आपके लिए बेमानी है।" बिहार का वास्तविक विकास तब सुनिश्चित होगा जब उसकी नीतियां जातिगत समीकरणों के बजाय 'सुशासन' और 'सबके लिए समान अवसर' के संवैधानिक मूल्यों द्वारा निर्देशित होंगी।