बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थितिः चुनौतियां और आगे का रास्ता।

 Q. बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थितिः चुनौतियां और आगे का रास्ता।

Ans - 

भूमिका

मानव पूंजी निर्माण (Human Capital Formation) किसी भी राज्य के सर्वांगीण और समावेशी विकास की आधारशिला है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के 'क्षमता दृष्टिकोण' (Capability Approach) के अनुसार, शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता और उत्पादकता का विस्तार करते हैं। ऐतिहासिक रूप से बिहार नालंदा और विक्रमशिला जैसे वैश्विक शिक्षा केंद्रों का जनक रहा है, किंतु आधुनिक परिदृश्य में यह एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। नवीनतम नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) और सतत विकास लक्ष्य (SDG) सूचकांक के अनुसार, शिक्षा और स्वास्थ्य मानकों पर राज्य अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है। हालाँकि, बिहार आर्थिक सर्वेक्षण इन क्षेत्रों में राज्य सरकार के निरंतर बढ़ते बजटीय आवंटन की पुष्टि करता है। जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) से परिपूर्ण इस राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति, इसकी चुनौतियां और भविष्य की नीतियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियां

राज्य के समग्र विकास में बाधक बनने वाली शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की संरचनात्मक और प्रशासनिक चुनौतियां निम्नलिखित हैं:

1. शिक्षा क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियां

  • गुणवत्ता और सीखने की क्षमता (Learning Outcomes): ASER (Annual Status of Education Report) के आंकड़े दर्शाते हैं कि प्राथमिक स्तर पर छात्रों के पठन-पाठन और गणितीय कौशल में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। मात्र नामांकन (Enrollment) वृद्धि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं बन पाई है।

  • उच्च शिक्षा में निम्न सकल नामांकन अनुपात (GER): राष्ट्रीय औसत (लगभग 27.3%) की तुलना में बिहार का GER (लगभग 14.5%) अत्यंत निम्न है। उच्च शिक्षा संस्थानों में शोध (Research) और नवाचार (Innovation) का अभाव है।

  • आधारभूत संरचना का अभाव: कई ग्रामीण विद्यालयों में आज भी डिजिटल क्लासरूम, स्वच्छ पेयजल, और छात्राओं के लिए अलग शौचालयों की कमी है, जो ड्रॉपआउट दर (Dropout Rate) को बढ़ाता है।

  • शिक्षक-छात्र अनुपात (PTR): यद्यपि हाल ही में BPSC के माध्यम से बड़े पैमाने पर शिक्षकों की पारदर्शी भर्ती एक ऐतिहासिक कदम रहा है, परंतु दूरस्थ क्षेत्रों में अनुभवी शिक्षकों और विषय-विशेषज्ञों का अभाव अभी भी एक चुनौती है।

2. स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियां

  • चिकित्सक-मरीज अनुपात: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक (1:1000) के विपरीत, बिहार में चिकित्सकों की भारी कमी है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली (Public Health System) पर अत्यधिक दबाव बना रहता है।

  • कुपोषण एवं मातृ-शिशु स्वास्थ्य: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, राज्य में बाल कुपोषण (Stunting/Wasting) और महिलाओं में एनीमिया की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

  • संसाधनों का असमान क्षेत्रीय वितरण: स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में एक गहरा क्षेत्रीय असंतुलन विद्यमान है। विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं (Tertiary Care) और बड़े अस्पताल मुख्य रूप से पटना में केंद्रित हैं। राज्य की एक बड़ी आबादी को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए राजधानी की ओर पलायन करना पड़ता है।

  • आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOP Expenditure): ग्रामीण स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) की लचर स्थिति के कारण नागरिकों को निजी क्लीनिकों पर भारी खर्च करना पड़ता है, जो उन्हें निर्धनता के दुष्चक्र में धकेलता है।

सुधारात्मक प्रयास एवं सरकारी पहलें

चुनौतियों के बावजूद, राज्य सरकार द्वारा अनुच्छेद 47 (सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) के संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं:

  • शिक्षा के क्षेत्र में: मुख्यमंत्री बालिका साइकिल और पोशाक योजना ने महिला साक्षरता और सशक्तिकरण में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 'बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना' और डिजिटल शिक्षा के लिए 'उन्नयन बिहार' प्रभावी पहल हैं।

  • स्वास्थ्य के क्षेत्र में: अस्पतालों के बुनियादी ढांचे और स्वच्छता में सुधार हेतु 'मिशन परिवर्तन' लागू किया गया है। आयुष्मान भारत योजना के साथ-साथ राज्य स्तर पर नए मेडिकल कॉलेजों और एएनएम/जीएनएम (ANM/GNM) संस्थानों की स्थापना की जा रही है।

आगे का रास्ता (Way Forward)

बिहार को एक 'विकसित राज्य' की श्रेणी में स्थापित करने के लिए एक बहुआयामी और विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  • समान और विकेंद्रीकृत विकास: विकास की रूपरेखा को केवल राजधानी तक सीमित न रखकर, बुनियादी ढांचे का विस्तार पटना और सभी बिहार के ज़िलों में समान रूप से किया जाना चाहिए। प्रत्येक ज़िले में सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल और उत्कृष्टता केंद्र (Centers of Excellence) स्थापित किए जाने चाहिए ताकि क्षेत्रीय विषमता समाप्त हो सके।

  • बजटीय आवंटन का इष्टतम उपयोग: शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में बजटीय प्रावधानों को कोठारी आयोग (GDP का 6% शिक्षा पर) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के लक्ष्यों के अनुरूप बढ़ाना तथा धन के लीकेज को रोकने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) का विस्तार करना आवश्यक है।

  • तकनीकी एकीकरण (Digital Integration): सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए टेली-मेडिसिन (ई-संजीवनी) का दायरा बढ़ाना होगा। विद्यालयों में 'स्मार्ट क्लास' और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पठन-पाठन को बढ़ावा देना चाहिए।

  • समुदाय आधारित जवाबदेही: पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और ग्राम सभाओं के माध्यम से विद्यालयों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) का सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिससे प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

किसी भी समाज का वास्तविक सशक्तिकरण उसके नागरिकों की बौद्धिक क्षमता और शारीरिक सुदृढ़ता में निहित होता है। बिहार के पास देश की सबसे युवा आबादी का जो 'जनसांख्यिकीय लाभांश' है, वह तभी फलीभूत होगा जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत आधार मिलेगा। राज्य प्रशासन द्वारा उठाए जा रहे सुधारात्मक कदमों को यदि नवीन तकनीक, सुशासन (Good Governance) और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का संबल मिले, तो बिहार निश्चित रूप से अपनी ऐतिहासिक मेधा को आधुनिक विकास के इंजन में परिवर्तित कर सकेगा। राज्य का उज्ज्वल भविष्य 'स्वस्थ नागरिक और शिक्षित समाज' के इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

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