बिहार का गौरवशाली इतिहासः क्या हम केवल अतीत के भरोसे जी सकते हैं?
Q. बिहार का गौरवशाली इतिहासः क्या हम केवल अतीत के भरोसे जी सकते हैं?
Ans -
भूमिका
बिहार का इतिहास न केवल भारतीय उपमहाद्वीप, बल्कि संपूर्ण वैश्विक सभ्यता के विकास का एक देदीप्यमान अध्याय रहा है। यह वह भूमि है जिसने दुनिया को पहला गणतंत्र दिया, शून्य का ज्ञान दिया और अहिंसा का मार्ग प्रशस्त किया। किंतु, एक प्रशासक और नीति-निर्माता के दृष्टिकोण से, इतिहास केवल आत्म-मुग्धता का साधन नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का एक संदर्भ बिंदु होना चाहिए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जहाँ नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) और बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े राज्य की गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करते हैं, वहां केवल 'अतीत के गौरव' पर निर्भर रहना एक नीतिगत अकर्मण्यता (Policy Paralysis) को जन्म दे सकता है। राज्य के सतत विकास के लिए ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक तकनीकी-आर्थिक आवश्यकताओं के मध्य एक व्यावहारिक समन्वय स्थापित करना अनिवार्य है।
बिहार का ऐतिहासिक वैभव: एक स्वर्णिम धरोहर
बिहार ने ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक नेतृत्व किया है, जो आज भी राज्य की 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) का मुख्य आधार है:
राजनीतिक एकीकरण एवं लोकतांत्रिक जड़ें: वैशाली का लिच्छवी गणराज्य विश्व के प्राचीनतम लोकतंत्रों में से एक है। मौर्य और गुप्त साम्राज्यों ने पाटलिपुत्र से एक अखिल भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन किया।
बौद्धिक एवं दार्शनिक नेतृत्व: नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विश्वविद्यालयों ने बिहार को वैश्विक ज्ञान-अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) का प्राचीन केंद्र बनाया।
आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उद्गम: यह गौतम बुद्ध के ज्ञान, भगवान महावीर की तपस्या और गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मस्थली रही है। आर्यभट्ट का खगोलीय और गणितीय योगदान विज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय है।
अतीत की महिमा बनाम वर्तमान की धरातलीय वास्तविकताएं
गौरवशाली अतीत के बावजूद, आज का बिहार कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो यह सिद्ध करती हैं कि केवल इतिहास के सहारे विकास यात्रा पूरी नहीं की जा सकती:
1. आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय चुनौतियां
निम्न प्रति व्यक्ति आय: बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है।
मानव पूंजी का पलायन (Brain Drain & Migration): ऐतिहासिक बौद्धिक संपदा के बावजूद, आज रोजगार और उच्च शिक्षा के अभाव में राज्य का एक बड़ा युवा वर्ग (जनसांख्यिकीय लाभांश) अन्य राज्यों की ओर पलायन करने को विवश है।
कृषि पर अत्यधिक निर्भरता: राज्य की लगभग 76% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन जोत के छोटे आकार और बाढ़-सूखे की दोहरी मार के कारण कृषि उत्पादकता अत्यंत प्रभावित है।
2. औद्योगिक एवं आधारभूत संरचना का अभाव
स्वतंत्रता के पश्चात मालभाड़ा समानीकरण नीति (Freight Equalization Policy) और वर्ष 2000 में झारखंड के विभाजन ने बिहार को खनिज और भारी उद्योगों से वंचित कर दिया। अतीत के व्यापारिक केंद्र आज औद्योगीकरण की दौड़ में पिछड़ गए हैं।
क्या हम केवल अतीत के भरोसे जी सकते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक है। इतिहास से प्रेरणा ली जा सकती है, किंतु नीतियां वर्तमान की मांग के अनुरूप होनी चाहिए।
'ऐतिहासिक नॉस्टेल्जिया' से बाहर आना: केवल यह सोचकर संतुष्ट रहना कि "हम कभी महान थे", प्रशासनिक सुस्ती को जन्म देता है। वर्तमान समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र का है।
वैश्वीकरण की मांग: आज के वैश्विक परिदृश्य में निवेशकों को ऐतिहासिक किलों से अधिक सुशासन (Good Governance), कानून-व्यवस्था (Rule of Law) और मजबूत बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की आवश्यकता होती है।
आगे की राह: ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक विकास का समन्वय
बिहार को अपने ऐतिहासिक गौरव को एक आर्थिक 'ग्रोथ इंजन' में परिवर्तित करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
सांस्कृतिक पर्यटन का व्यवसायीकरण: बौद्ध परिपथ (Buddhist Circuit), जैन और सूफी सर्किट को विश्व स्तरीय सुविधाओं से जोड़कर इसे राजस्व और रोजगार का मुख्य स्रोत बनाया जा सकता है।
आधुनिक ज्ञान अर्थव्यवस्था का निर्माण: नालंदा के प्राचीन दर्शन को पुनर्जीवित करते हुए राज्य में नए आईटी हब, तकनीकी संस्थान और स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित करने की आवश्यकता है।
विकेंद्रीकृत एवं समावेशी विकास: विकास की रूपरेखा को केवल कुछ महानगरों तक सीमित न रखकर, राजधानी पटना और बिहार के सभी ज़िलों में सूक्ष्म-स्तरीय योजना (Micro-planning) के माध्यम से आधारभूत संरचना का विस्तार किया जाना चाहिए।
कृषि का आधुनिकीकरण: चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-28) के माध्यम से कृषि-प्रसंस्करण (Agro-processing) उद्योगों, जैसे—मखाना, लीची और जर्दालू आम की ब्रांडिंग को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाना।
निष्कर्ष
इतिहास एक मजबूत नींव अवश्य प्रदान करता है, किंतु उस पर आधुनिक विकास की इमारत खड़ी करना वर्तमान पीढ़ी और प्रशासन का उत्तरदायित्व है। संविधान के अनुच्छेद 38 (लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बिहार को अपने अतीत के गौरव से केवल 'प्रेरणा' लेनी चाहिए, 'आश्रय' नहीं। जब राज्य का समृद्ध ऐतिहासिक दर्शन, सुशासन (Good Governance), तकनीकी नवाचार और विकेंद्रीकृत विकास नीतियों के साथ जुड़ेगा, तभी बिहार अपने पुराने गौरव को आधुनिक 'विकसित बिहार' के यथार्थ में परिवर्तित कर सकेगा।