'बिना बिचारे जो करे, सो पाछे पछताय'।
Q. 'बिना बिचारे जो करे, सो पाछे पछताय'।
Ans -
भूमिका
महाकवि गिरधर कविराय की प्रसिद्ध कुण्डली की प्रथम पंक्ति 'बिना बिचारे जो करे, सो पाछे पछताय' लोक-व्यवहार का एक शाश्वत सत्य होने के साथ-साथ लोक प्रशासन, नीति-निर्माण और सुशासन (Good Governance) का एक आधारभूत सिद्धांत है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जो व्यक्ति या संस्था किसी कार्य के परिणामों का पूर्व-मूल्यांकन किए बिना कदम उठाती है, उसे भविष्य में पश्चाताप का सामना करना पड़ता है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से, यह उक्ति 'तार्किक निर्णय-निर्माण' (Rational Decision Making) और 'साक्ष्य-आधारित नीति' (Evidence-Based Policy) की वकालत करती है। एक लोक कल्याणकारी राज्य में जहाँ एक निर्णय लाखों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है, वहां बिना सोचे-समझे (Impulsive) उठाए गए कदम न केवल संसाधनों की बर्बादी का कारण बनते हैं, बल्कि व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को भी खंडित करते हैं।
प्रशासनिक एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य: तार्किक निर्णय-निर्माण का महत्व
प्रशासनिक कार्यप्रणाली में किसी भी निर्णय के पीछे एक वैज्ञानिक और तार्किक प्रक्रिया का होना अनिवार्य है। हरबर्ट साइमन (Herbert Simon) का निर्णय-निर्माण सिद्धांत (Decision-Making Theory) भी इसी बात पर बल देता है कि विकल्पों के गहन विश्लेषण के बिना लिया गया निर्णय त्रुटिपूर्ण होता है।
बिना विचारे लिए गए निर्णयों के प्रमुख कारण
लोकलुभावनवाद (Populism): अक्सर राजनीतिक दबाव में दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किए बिना त्वरित लोकलुभावन नीतियां लागू कर दी जाती हैं।
डेटा और साक्ष्यों का अभाव (Data Deficit): धरातलीय वास्तविकताओं और प्रामाणिक आंकड़ों के बिना वातानुकूलित कमरों में बनाई गई नीतियां (Top-down approach) ज़मीनी स्तर पर विफल हो जाती हैं।
संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Bias): नीति-निर्माताओं का अपने व्यक्तिगत अनुभवों या पूर्वाग्रहों के आधार पर निर्णय लेना, जिससे वस्तुनिष्ठता (Objectivity) समाप्त हो जाती है।
अदूरदर्शी निर्णयों के व्यापक दुष्परिणाम
संसाधनों का अपव्यय: विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय संसाधन अत्यंत सीमित होते हैं। बिना योजना के शुरू किए गए प्रोजेक्ट 'सफेद हाथी' (White Elephant) साबित होते हैं।
नीतिगत अस्थिरता (Policy Paralysis): आनन-फानन में लिए गए निर्णयों को बाद में जन-विरोध या विधिक अड़चनों के कारण वापस लेना पड़ता है, जिससे प्रशासन की साख गिरती है।
सामाजिक असंतोष: जब नीतियां समाज के अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने में विफल रहती हैं, तो वह वंचना और असंतोष को जन्म देती हैं।
बिहार के विशेष संदर्भ में विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
बिहार के भौगोलिक, जनसांख्यिकीय और आर्थिक परिदृश्य में यह लोकोक्ति नीति-निर्माताओं के लिए एक चेतावनी की तरह कार्य करती है। राज्य के सर्वांगीण और समावेशी विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि नीतियां केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहें, बल्कि पटना और बिहार के सभी जिलों को केंद्र में रखकर, सूक्ष्म योजना (Micro-planning) के साथ लागू की जाएं।
अनियोजित विकास का परिणाम: विगत दशकों में बिना दूरगामी सोच के किए गए अनियोजित शहरीकरण के कारण ही राज्य के कई शहरों में आधारभूत संरचना चरमरा गई। उदाहरण के लिए, जल निकासी की उचित व्यवस्था किए बिना हुए निर्माण कार्यों ने अतीत में गंभीर जलभराव जैसी आपदाओं को जन्म दिया है, जो 'पाछे पछताय' की स्थिति का सटीक उदाहरण है।
सकारात्मक नीतिगत सुधार (विचारपूर्ण कृत्य): इसके विपरीत, जब प्रशासन गहन विचार-विमर्श के साथ कार्य करता है, तो परिणाम सुखद होते हैं। बिहार सरकार द्वारा पूरे राज्य के लिए लागू किया गया 'जल-जीवन-हरियाली अभियान' और 'चतुर्थ कृषि रोडमैप (2023-28)' साक्ष्य-आधारित नीतियों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन और स्थानीय कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-climatic zones) का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है, ताकि भविष्य में कृषि संकट का पश्चाताप न करना पड़े।
कानूनी एवं सामाजिक नीतियां: मद्यनिषेध (Liquor Prohibition) जैसे कठोर सामाजिक निर्णयों के क्रियान्वयन के बाद उत्पन्न होने वाली चुनौतियों (जैसे न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ) का समय-समय पर विश्लेषण और तदनुसार बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद (संशोधन) अधिनियम लाना यह दर्शाता है कि नीतियों की सफलता के लिए निरंतर चिंतन और सुधार आवश्यक है।
सुशासन हेतु संवैधानिक एवं संस्थागत रक्षा-कवच
भारतीय संविधान और प्रशासनिक ढांचे में ऐसे कई प्रावधान हैं जो 'बिना बिचारे' कार्य करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाते हैं:
अनुच्छेद 74 एवं 163: राष्ट्रपति और राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि निर्णय एक व्यक्ति का न होकर सामूहिक विचार-विमर्श (Collective Responsibility) का परिणाम हो।
संसदीय समितियां (Parliamentary Committees): विधायिका में पेश किए गए विधेयकों की सूक्ष्म जांच कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी कानून जल्दबाजी में पारित न हो।
नीति आयोग (NITI Aayog): सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देते हुए यह संस्था 'थिंक टैंक' के रूप में कार्य करती है, ताकि नीतियां वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित हों।
सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit): मनरेगा जैसी योजनाओं में ग्राम सभा द्वारा किया जाने वाला ऑडिट सुनिश्चित करता है कि योजनाएं बिना जन-सहभागिता के थोपी न जाएं।
आगे की राह
प्रशासनिक निर्णयों को पश्चाताप मुक्त बनाने के लिए आवश्यक है कि 'प्लानिंग, एग्जीक्यूशन और इवैल्यूएशन' (योजना, क्रियान्वयन और मूल्यांकन) के त्रिकोणीय मॉडल का कड़ाई से पालन किया जाए। किसी भी बड़ी योजना को पूरे राज्य में लागू करने से पहले चुनिंदा जिलों में पायलट प्रोजेक्ट (Pilot Project) के रूप में परीक्षण किया जाना चाहिए। साथ ही, ई-गवर्नेंस और बिग डेटा एनालिटिक्स (Big Data Analytics) का उपयोग कर नीतियों के प्रभाव का सटीक पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए। एक परिपक्व और दूरदर्शी प्रशासन वही है जो वर्तमान की चुनौतियों का समाधान करते समय भविष्य की पीढ़ियों के हितों को सुरक्षित रखता है। इसी विचारशीलता और समावेशी दृष्टिकोण के माध्यम से ही 'विकसित बिहार' के संकल्प को यथार्थ में बदला जा सकता है।