'आग लागल झोपड़ी में, जो निकले सो लाभ' (बिहार की लोकोक्ति पर आधारित)।

 Q.  'आग लागल झोपड़ी में, जो निकले सो लाभ' (बिहार की लोकोक्ति पर आधारित)।

Ans - 

भूमिका

लोक-साहित्य और कहावतें किसी समाज के सामूहिक अनुभवों, संघर्षों और जीवन-दर्शन का प्रामाणिक दर्पण होती हैं। बिहार के जनमानस में रची-बसी प्रसिद्ध लोकोक्ति 'आग लागल झोपड़ी में, जो निकले सो लाभ' केवल एक सामान्य उक्ति नहीं है, बल्कि आधुनिक प्रशासन, संकट प्रबंधन (Crisis Management) और क्षति शमन (Damage Control) का एक अत्यंत व्यावहारिक सूत्र है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि विनाश या महासंकट के समय जो कुछ भी बचाया जा सके, वही वास्तविक उपलब्धि या लाभ है। एक प्रशासक के दृष्टिकोण से यह लोकोक्ति आपदा, आर्थिक पतन और आपातकालीन स्थितियों में न्यूनतम नुकसान (Minimization of Loss) और यथार्थवादी निर्णय-निर्माण की महत्ता को रेखांकित करती है।

प्रशासनिक एवं दार्शनिक निहितार्थ

प्रशासनिक कार्यप्रणाली में यह उक्ति आदर्शवाद के स्थान पर व्यावहारिकता (Pragmatism) को प्राथमिकता देती है।

  • तार्किक निर्णय-निर्माण: संकट के समय भावुकता के बजाय उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन करना।

  • संसाधनों का इष्टतम बचाव: जब पूर्ण विनाश सन्निकट हो, तो 'सब कुछ बचाने' की जिद के बजाय 'जितना संभव हो उतना बचाने' (Salvage strategy) की नीति अपनाना।

  • प्राथमिकता निर्धारण (Triage): चिकित्सा और आपदा प्रबंधन में यह तय करना कि सबसे पहले किसे बचाया जाए, इसी दर्शन पर आधारित है।

आपदा प्रबंधन एवं बिहार का परिप्रेक्ष्य

बिहार की भौगोलिक स्थिति इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाती है। राज्य में इस लोकोक्ति का सबसे सटीक अनुप्रयोग आपदा प्रबंधन में देखा जा सकता है:

  • बाढ़ और सूखे की दोहरी मार: उत्तर बिहार में कोसी, गंडक जैसी नदियों की प्रलयंकारी बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखा एक नियमित संकट (आग लगी झोपड़ी) है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार का आपदा प्रबंधन विभाग (BSDMA) सबसे पहले 'ज़ीरो कैजुअल्टी' (Zero Casualty) के सिद्धांत पर कार्य करते हुए मानव जीवन और पशुधन को सुरक्षित निकालता है।

  • नीतिगत ढांचा: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और सेंदाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) भी इसी सिद्धांत पर बल देते हैं कि आपदा के दौरान त्वरित बचाव (Rescue) कर जान-माल के नुकसान को न्यूनतम किया जाए।

आर्थिक एवं नीतिगत अनुप्रयोग

आर्थिक प्रशासन और वित्तीय प्रबंधन में यह लोकोक्ति नीति-निर्माताओं के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का कार्य करती है:

  • गैर-निष्पादित संपत्तियां (NPA) और दिवालियापन: बैंकिंग क्षेत्र में डूबते कर्ज की वसूली के लिए लागू किया गया दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC, 2016) इसी उक्ति का साक्षात रूप है। जब कोई कंपनी दिवालिया होती है, तो बैंकों का लक्ष्य 'हेयरकट' (Haircut) लेकर अधिकतम संभव पूंजी वापस निकालना होता है।

  • सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश (Disinvestment): लगातार घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों (PSUs) से सरकार द्वारा पूंजी निकालना (नीति आयोग की सिफारिशों के अनुरूप) एक प्रकार से डूबती अर्थव्यवस्था से संसाधन बचाने का ही यथार्थवादी प्रयास है।

  • महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था (COVID-19): लॉकडाउन रूपी संकट में सरकार द्वारा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को बचाने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत आपातकालीन क्रेडिट लाइन (ECLGS) देना 'बचे हुए लाभ' को सहेजने का ही एक प्रशासनिक प्रयास था।

चुनौतियां और नीतिगत सीमाएं

यद्यपि यह दृष्टिकोण आपातकाल के लिए उपयुक्त है, किंतु शासन-प्रशासन केवल इसी पर निर्भर नहीं रह सकता। इसके कई अंतर्निहित खतरे हैं:

  • प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण (Reactive Approach): यह नीति संकट उत्पन्न होने के बाद की स्थिति पर केंद्रित है। यदि राज्य केवल आपदा आने पर बचाव का कार्य करे, तो निवारक नीतियों (Preventive Measures) की घोर उपेक्षा होती है।

  • मूल कारणों (Root Causes) की अनदेखी: 'जो निकले सो लाभ' अल्पकालिक समाधान है। 'झोपड़ी में आग लगी ही क्यों'—इस प्रश्न का उत्तर खोजना सुशासन के लिए अधिक अनिवार्य है।

आगे की राह

एक कल्याणकारी राज्य (अनुच्छेद 38) के रूप में सरकार का अंतिम लक्ष्य केवल आपदा के बाद का बचाव नहीं, बल्कि आपदा का शमन होना चाहिए।

  • पूर्वानुमान और निवारण (Proactive Measures): प्रशासन को प्रतिक्रियात्मक मॉडल से आगे बढ़कर निवारक मॉडल अपनाना चाहिए। बिहार सरकार का पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) और वज्रपात से बचाव हेतु 'इंद्रवज्र' ऐप इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।

  • सतत विकास (Sustainable Development): जलवायु परिवर्तन के दौर में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। बिहार का 'जल-जीवन-हरियाली अभियान' भविष्य की 'झोपड़ियों' को आग (जलवायु संकट) से बचाने का एक दूरदर्शी प्रयास है।

निष्कर्ष

'आग लागल झोपड़ी में, जो निकले सो लाभ' निःसंदेह संकट प्रबंधन, क्षति न्यूनीकरण और संसाधन संरक्षण का एक उत्कृष्ट यथार्थवादी दृष्टिकोण है। आपातकाल में यह नीति एक जीवनरक्षक की भूमिका निभाती है। परंतु, इक्कीसवीं सदी के सुशासन और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति के लिए हमें एक कदम और आगे जाना होगा। प्रशासनिक सफलता केवल संकट में बची हुई संपत्तियों को गिनने में नहीं, बल्कि एक ऐसे लचीले (Resilient) और सुरक्षित बुनियादी ढांचे के निर्माण में है, जहाँ भविष्य में 'झोपड़ी में आग लगने' की नौबत ही न आए।

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