'खेती बारी जिउका, नौकरी चाकरी भिख्खा' (बिहार की लोकोक्ति पर आधारित)।
Q. 'खेती बारी जिउका, नौकरी चाकरी भिख्खा' (बिहार की लोकोक्ति पर आधारित)।
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भूमिका
बिहार की सांस्कृतिक और आर्थिक जड़ों में कृषि का स्थान ऐतिहासिक रूप से सर्वोपरि रहा है। प्रस्तुत भोजपुरी/मागधी लोकोक्ति 'खेती बारी जिउका, नौकरी चाकरी भिख्खा' इसी गौरवशाली कृषि-प्रधान मानसिकता का सटीक वर्णन करती है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि 'स्वयं की खेती-बारी ही वास्तविक जीवन और आजीविका है, जबकि दूसरों की नौकरी (चाकरी) करना भीख मांगने के समान है।' यह उक्ति उस कालखंड की उपज है जब भूमि को मात्र उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक माना जाता था। उस समय दूसरों के अधीन कार्य करने (नौकरी) को पराधीनता और हीनता की दृष्टि से देखा जाता था।
हालाँकि, एक प्रशासक और विश्लेषक के दृष्टिकोण से, इस लोकोक्ति का मूल्यांकन केवल इसके ऐतिहासिक संदर्भ में नहीं, बल्कि वर्तमान के बदलते आर्थिक परिदृश्य, वैश्वीकरण और कृषि संकट के आलोक में किया जाना आवश्यक है।
ऐतिहासिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य: कृषि की सर्वोच्चता के कारण
पारंपरिक भारतीय और विशेषकर बिहारी समाज में इस उक्ति के प्रचलित होने के कई ठोस आधार रहे हैं:
आर्थिक स्वायत्तता: खेती करने वाला किसान स्वयं अपने श्रम और संसाधनों का स्वामी होता था। उसे अपनी आजीविका के लिए किसी नियोजक (Employer) की दया पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।
खाद्य सुरक्षा और स्थायित्व: औद्योगीकरण से पूर्व के समाज में खाद्यान्न ही सबसे बड़ी संपदा थी। जिसके पास खेत थे, वह अकाल या संकट के समय भी अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता था।
पराधीनता का अस्वीकार: पारंपरिक समाज में यह मान्यता थी कि "पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं"। नौकरी का अर्थ था किसी की आज्ञा का पालन करना और अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखना, जिसे तत्कालीन समाज में 'भिख्खा' (भिक्षाटन) के समतुल्य माना गया।
वर्तमान परिदृश्य: लोकोक्ति का विरोधाभास और बदलती वास्तविकता
वर्तमान समय में इस लोकोक्ति की यथार्थता उलट गई है। आज समाज में 'नौकरी' (विशेषकर सरकारी सेवा) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि 'खेती' हाशिये पर आ गई है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. कृषि का 'घाटे का सौदा' बन जाना
भूमि का विखंडन: बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में लगभग 91% किसान सीमांत श्रेणी में आते हैं और औसत जोत का आकार मात्र 0.39 हेक्टेयर रह गया है। इतनी छोटी जोत पर व्यावसायिक खेती संभव नहीं है।
जलवायु परिवर्तन की मार: उत्तर बिहार में हर वर्ष आने वाली बाढ़ (जैसे कोसी बेसिन) और दक्षिण बिहार का सूखा, कृषि को एक अनिश्चित जुआ बना देते हैं।
प्रच्छन्न बेरोजगारी (Hidden Unemployment): कृषि क्षेत्र में क्षमता से अधिक लोग लगे हुए हैं, जिससे प्रति व्यक्ति उत्पादकता और आय अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गई है।
2. नौकरी (सेवा क्षेत्र) का बढ़ता आकर्षण
निश्चित आय और सामाजिक सुरक्षा: आधुनिक अर्थव्यवस्था में वेतनभोगी रोजगार नियमित आय, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और भविष्य की सुरक्षा की गारंटी देता है।
सामाजिक गतिशीलता: आज के दौर में शिक्षा और नौकरी ही वह माध्यम हैं जिससे हाशिये पर खड़ा व्यक्ति भी उच्च सामाजिक स्तर प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि बिहार के युवाओं में BPSC, UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर अप्रत्याशित रुझान है।
बिहार के विशेष संदर्भ में प्रभाव एवं चुनौतियां
बिहार आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ यह लोकोक्ति एक गहरी विडंबना बन चुकी है:
पलायन (Migration) की समस्या: खेती से जीवन-निर्वाह न हो पाने के कारण ही बिहार का एक बड़ा युवा वर्ग पंजाब, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में असंगठित क्षेत्र में कार्य (दिहाड़ी मजदूरी) करने को विवश है।
कृषि पर असंतुलित निर्भरता: राज्य की लगभग 76% आबादी आज भी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, लेकिन राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में इसका योगदान लगातार घट रहा है।
कृषि को पुनः 'जिउका' बनाने की दिशा में आवश्यक कदम
इस लोकोक्ति के मूल भाव (आत्मनिर्भरता) को आज के युग में प्रासंगिक बनाने के लिए कृषि का आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण अनिवार्य है:
कृषि-उद्यमिता (Agri-Entrepreneurship): युवाओं को केवल पारंपरिक खेती से हटाकर खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing), मखाना उत्पादन, शाही लीची और जर्दालू आम के निर्यात जैसे लाभकारी मूल्य-वर्धित कार्यों से जोड़ना होगा।
नीतिगत हस्तक्षेप: बिहार सरकार द्वारा लागू किया गया चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-2028), जो जलवायु अनुकूल कृषि और बीजों के विकास पर केंद्रित है, एक सकारात्मक कदम है।
तकनीक और सहकारिता: ड्रोन तकनीक, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और 'सहकारी खेती' (Cooperative Farming) के माध्यम से छोटी जोतों की उत्पादकता बढ़ाई जानी चाहिए।
निष्कर्ष
'खेती बारी जिउका, नौकरी चाकरी भिख्खा' लोकोक्ति आज अपने शाब्दिक अर्थ में भले ही पिछड़ती हुई प्रतीत होती हो, परंतु इसका दार्शनिक संदेश— 'आत्मनिर्भरता ही सच्चा सम्मान है'— आज भी शाश्वत है। वर्तमान समय की मांग है कि हम कृषि और नौकरी को परस्पर विरोधी न मानकर एक-दूसरे का पूरक बनाएं। जब कृषि को आधुनिक तकनीक, बाज़ार-व्यवस्था और सरकारी नीतियों का संबल मिलेगा, तभी खेती बिहार के युवाओं के लिए मजबूरी नहीं, बल्कि एक गर्वित 'उद्यम' बनेगी। राज्य के समावेशी विकास के लिए 'खेत' की संपन्नता और 'सेवा' की कुशलता, दोनों ही समान रूप से अपरिहार्य हैं।