गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता क्या है?

 Q. गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता क्या है?

Ans - 

गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता

भूमिका

महात्मा गांधी के सत्याग्रह (सत्य के प्रति आग्रह) और अहिंसा (मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुंचाना) के सिद्धांत केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक हथियार नहीं थे, बल्कि वे शाश्वत मानव मूल्यों और नैतिकता पर आधारित एक वैश्विक दर्शन हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2 अक्टूबर को 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में घोषित किया जाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि 21वीं सदी की जटिल और बहुआयामी चुनौतियों के बीच भी गांधीवादी दर्शन अपनी वैचारिक जीवंतता बनाए हुए है।

भारत में गांधीजी के इस अमोघ अस्त्र का पहला सफल प्रयोग 1917 के चंपारण सत्याग्रह के रूप में बिहार की धरती पर ही हुआ था। आज जब विश्व युद्ध, पर्यावरण संकट, और सामाजिक असहिष्णुता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब इन सिद्धांतों की प्रासंगिकता और भी प्रखर हो जाती है।

मुख्य भाग

1. वैश्विक कूटनीति और संघर्ष समाधान में प्रासंगिकता

वर्तमान में विश्व व्यवस्था गहरी अशांति और अविश्वास के दौर से गुजर रही है।

  • अंतरराष्ट्रीय युद्ध और संघर्ष: रूस-यूक्रेन या इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक संकट यह स्पष्ट करते हैं कि सैन्य बल स्थायी शांति स्थापित नहीं कर सकता। गांधीजी का अहिंसा का सिद्धांत सिखाता है कि "आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।"

  • कूटनीतिक संवाद: समस्याओं का स्थायी समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर अहिंसक संवाद के माध्यम से ही संभव है, जिसे आज की कूटनीति में 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) कहा जाता है।

2. पर्यावरणीय नैतिकता और सतत विकास

गांधीजी का मानना था कि “प्रकृति के पास हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।”

  • जलवायु परिवर्तन: ग्लोबल वार्मिंग, कार्बन उत्सर्जन और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का मूल कारण भौतिकवादी लालच है।

  • अहिंसक जीवनशैली: प्रकृति के प्रति अहिंसा का अर्थ है संसाधनों का न्यायसंगत और सीमित उपयोग। यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विशेषकर SDG 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) से मेल खाता है।

3. सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा

एक विविधतापूर्ण समाज में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए सत्याग्रह और अहिंसा अपरिहार्य हैं।

  • असहिष्णुता का प्रतिकार: धार्मिक, जातीय या भाषाई ध्रुवीकरण के वर्तमान दौर में गांधीजी का 'सर्वधर्म समभाव' और अहिंसा का विचार समाज को विघटन से बचाता है।

  • शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार: लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियारों के शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार मूलतः सत्याग्रह के दर्शन का ही संवैधानिक रूप है।

  • अंत्योदय और सर्वोदय: आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए समाज के सबसे हाशिए पर खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) का विकास आज भी समावेशी विकास (Inclusive Growth) की आधारशिला है।

4. बिहार के विशेष संदर्भ में गांधीवादी सिद्धांतों का क्रियान्वयन

जिस बिहार (चंपारण) ने मोहनदास को 'महात्मा' बनाया, उस राज्य की वर्तमान नीतियां गांधीवादी दर्शन का उत्कृष्ट व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं:

  • शराबबंदी (Prohibition): गांधीजी शराब को समाज के नैतिक और आर्थिक पतन का कारण मानते थे। बिहार सरकार द्वारा पूर्ण शराबबंदी लागू करना संविधान के अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) और गांधीजी के सपनों के अनुरूप एक साहसिक कदम है, जिसने घरेलू हिंसा में कमी और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • जल-जीवन-हरियाली अभियान: यह योजना प्रकृति के प्रति 'अहिंसा' और गांधीवादी पर्यावरणीय संरक्षण का जीवंत उदाहरण है। यह अभियान पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है।

  • ग्राम स्वराज्य और पंचायती राज: गांधीजी सत्ता के विकेंद्रीकरण के प्रबल समर्थक थे। बिहार ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50% आरक्षण देकर गांधीजी के 'ग्राम स्वराज्य' और महिला सशक्तिकरण के दृष्टिकोण को धरातल पर उतारा है।

आगे की राह

वर्तमान सदी की वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि विकास का कोई भी मॉडल तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक उसकी नींव में नैतिकता, सत्य और अहिंसा न हो। मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे वैश्विक नेताओं की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सत्याग्रह केवल कमजोरों का अस्त्र नहीं, बल्कि आत्मबल से परिपूर्ण साहसी लोगों का मार्ग है।

भविष्य के एक सशक्त, समावेशी और शांतिपूर्ण भारत (तथा विश्व) के निर्माण के लिए नीतियों के निर्माण और उनके क्रियान्वयन में गांधीवादी 'जंतर' (Talisman) को ध्यान में रखना अनिवार्य है। सत्ता के विकेंद्रीकरण, पर्यावरणीय संरक्षण, और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण पर केंद्रित नीतियां ही गांधीजी के सिद्धांतों को सच्ची श्रद्धांजलि होंगी। यही कारण है कि गांधीजी अतीत के नहीं, बल्कि भविष्य के विचारक हैं।

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