रवींद्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद से संबंधित विचारों का विश्लेषण करें।
Q. रवींद्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद से संबंधित विचारों का विश्लेषण करें।
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रवींद्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद के विचारों का विश्लेषण
भूमिका
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर मात्र एक महान साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी दार्शनिक और प्रखर मानवतावादी विचारक थे। वर्ष 1917 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'नेशनलिज़्म' (Nationalism) में उन्होंने राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद पर अपने मौलिक और आलोचनात्मक विचार प्रस्तुत किए। एक ओर जहाँ समकालीन विश्व और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई नेता राजनीतिक राष्ट्रवाद को सर्वोच्च मान रहे थे, वहीं टैगोर का दृष्टिकोण संकीर्ण भौगोलिक सीमाओं से परे, संपूर्ण मानवता के कल्याण और विश्वबंधुत्व पर केंद्रित था। उनके वैचारिक दर्शन में सत्यम, शिवम और सुंदरम का समन्वय परिलक्षित होता है।
मुख्य भाग
1. राष्ट्रवाद पर टैगोर के विचार (Tagore's Views on Nationalism)
टैगोर का राष्ट्रवाद का विचार पश्चिमी देशों के आक्रामक और विस्तारवादी राष्ट्रवाद से पूर्णतः भिन्न और उसके आलोचक के रूप में सामने आया:
पश्चिमी राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना: टैगोर ने यूरोपीय राष्ट्रवाद को एक 'भौगोलिक दैत्य' (Geographical Demon) और 'शक्ति का यांत्रिक संगठन' करार दिया। उनका मानना था कि यह शक्ति, प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद पर आधारित है, जो अंततः साम्राज्यवाद, युद्ध और मानव-शोषण को जन्म देता है।
सामाजिक बनाम राजनीतिक एकता: उनका स्पष्ट मत था कि भारत की मूल समस्या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक है। उन्होंने राजनीतिक आंदोलनों के स्थान पर समाज सुधार, छुआछूत उन्मूलन और ग्रामीण पुनर्निर्माण जैसे रचनात्मक कार्यों पर बल दिया।
मानवतावाद की सर्वोच्चता: टैगोर ने राष्ट्रवाद को मानवता के लिए एक खतरे के रूप में देखा यदि वह संकीर्ण हो जाए। उनका प्रसिद्ध कथन है, "देशभक्ति हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकती; मेरा आश्रय मानवता है। मैं हीरों के मूल्य पर शीशा नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं जीवित हूँ, देशभक्ति को मानवता पर हावी नहीं होने दूंगा।"
रचनात्मक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: वे भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के समर्थक थे, जो विविधता में एकता (Unity in Diversity) और सहिष्णुता के मूल्यों पर आधारित था।
2. अंतर्राष्ट्रीयतावाद पर टैगोर के विचार (Tagore's Views on Internationalism)
टैगोर का अंतर्राष्ट्रीयतावाद भारतीय दर्शन के 'वसुधैव कुटुम्बकम' के आदर्श का आधुनिक संस्करण था:
विश्वबंधुत्व की भावना: टैगोर ने संपूर्ण विश्व को एक इकाई के रूप में देखा जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ एक-दूसरे से सीख सकें और सह-अस्तित्व की भावना से रह सकें।
पूर्व और पश्चिम का समन्वय (Synthesis of East and West): उन्होंने पूर्व के अध्यात्मवाद (Spiritualism) और पश्चिम के वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण (Scientific Temper) के मध्य एक सेतु बनाने का समर्थन किया। उनका मानना था कि मानवता का पूर्ण विकास दोनों के समन्वय से ही संभव है।
विश्व-भारती की स्थापना: वर्ष 1921 में स्थापित 'विश्व-भारती' विश्वविद्यालय उनके अंतर्राष्ट्रीयतावाद का सबसे बड़ा व्यावहारिक और संस्थागत उदाहरण था। इसका ध्येय वाक्य "यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्" (जहाँ संपूर्ण विश्व एक घोंसले में समाहित हो जाता है) उनके वैश्विक दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है।
3. बिहार के संदर्भ में वैचारिक प्रासंगिकता
टैगोर के समावेशी दर्शन और विचारों की प्रासंगिकता बिहार के ऐतिहासिक और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है:
शैक्षणिक और सामाजिक समरसता: टैगोर की समावेशी शिक्षा और रचनात्मक समाज-निर्माण की अवधारणा पटना और बिहार के सभी ज़िलों में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) और सामाजिक सद्भाव को सुदृढ़ करने के लिए आज भी दिशा-निर्देशित करती है। समावेशी विकास (Inclusive Growth) का जो मॉडल राज्य में लागू किया जा रहा है, वह मूलतः टैगोर के 'मानवता को केंद्र में रखने' के विचार का ही विस्तार है।
चंपारण सत्याग्रह और वैचारिक तालमेल: वर्ष 1917 में जब बिहार की धरती (चंपारण) पर गांधीजी ने अहिंसा और सत्याग्रह का प्रयोग किया, तब टैगोर ने ही उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी थी। यद्यपि गांधीजी के राजनीतिक राष्ट्रवाद और टैगोर के विचारों में कई बार वैचारिक असहमतियाँ रहीं, किंतु दोनों का अंतिम लक्ष्य शोषित वर्ग का उत्थान और सर्वोदय था।
निष्कर्ष
रवींद्रनाथ टैगोर के राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयतावाद से संबंधित विचार अपने समय से बहुत आगे थे। वर्तमान वैश्वीकृत परंतु विखंडित विश्व व्यवस्था (Globalized but fragmented world order) में, जहाँ अति-राष्ट्रवाद (Hyper-nationalism), संरक्षणवाद (Protectionism) और नस्लीय श्रेष्ठता के कारण वैश्विक संघर्ष बढ़ रहे हैं, टैगोर का मानवतावादी दर्शन एक प्रकाश स्तंभ के समान है।
आगे की राह: 21वीं सदी की बहुआयामी वैश्विक चुनौतियों, जैसे— जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और आर्थिक असमानता का समाधान संकीर्ण राष्ट्रीय सीमाओं में रहकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए टैगोर के 'रचनात्मक अंतर्राष्ट्रीयतावाद' और 'वैश्विक नागरिकता' (Global Citizenship) के मूल्यों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली और वैश्विक कूटनीति का अभिन्न अंग बनाने की आवश्यकता है। एक सशक्त भारत का निर्माण टैगोर के उसी स्वप्न के अनुरूप होना चाहिए जहाँ "ज्ञान मुक्त हो, और दुनिया संकीर्ण घरेलू दीवारों से टुकड़ों में न बंटी हो।"