जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता और विदेश नीति पर विचारों की चर्चा करें।

 Q. जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता और विदेश नीति पर विचारों की चर्चा करें।

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पंडित जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता और विदेश नीति के विचारों का विश्लेषण

भूमिका

आधुनिक भारत के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का वैचारिक दर्शन भारतीय राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की आधारशिला माना जाता है। स्वतंत्रता के उपरांत, एक ओर जहाँ नवोदित राष्ट्र को आंतरिक सामाजिक विखंडन के खतरों से बचाना था, वहीं दूसरी ओर शीत युद्ध (Cold War) के द्विध्रुवीय विश्व में अपनी संप्रभुता और सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को भी अक्षुण्ण रखना था। इन दोनों जटिल चुनौतियों के समाधान के रूप में नेहरू जी ने धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और स्वतंत्र विदेश नीति (मुख्यतः गुटनिरपेक्षता) का प्रतिपादन किया। उनके ये विचार केवल तात्कालिक राजनीतिक नीतियां नहीं, बल्कि एक आधुनिक, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के दिशा-निर्देश थे।

मुख्य भाग

1. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) पर नेहरू के विचार

नेहरू जी की धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल (राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव) की तुलना में अधिक समावेशी और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल थी। उनके धर्मनिरपेक्षता संबंधी विचारों के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:

  • राज्य का तटस्थ दृष्टिकोण: नेहरू का स्पष्ट मानना था कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा। राज्य सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और तटस्थता का भाव रखेगा। यह वैचारिक प्रतिबद्धता बाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) के रूप में परिलक्षित हुई।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper): वे धर्मनिरपेक्षता को केवल धार्मिक सहिष्णुता तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि इसे अंधविश्वासों और रूढ़ियों से मुक्ति के साधन के रूप में देखते थे। उन्होंने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर बल दिया, जिसे संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के तहत मौलिक कर्तव्य में भी स्थान दिया गया है।

  • अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव: विभाजन की त्रासदी के बाद, बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) के खतरों को रोककर अल्पसंख्यकों के भीतर विश्वास और सुरक्षा की भावना पैदा करना नेहरू की धर्मनिरपेक्ष नीति का मुख्य लक्ष्य था।

  • लोकतांत्रिक एकता का आधार: उनका मानना था कि भारत जैसी असीम विविधता वाले देश में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है, जब राजनीति और धर्म को एक-दूसरे से अलग रखा जाए।

2. विदेश नीति पर नेहरू के विचार

नेहरू जी स्वयं भारत के प्रथम विदेश मंत्री भी थे। उनकी विदेश नीति साम्राज्यवाद-विरोध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और वैश्विक सहयोग के स्तंभों पर खड़ी थी:

  • गुटनिरपेक्षता (Non-Aligned Movement - NAM): शीत युद्ध के दौरान जब विश्व अमेरिका और सोवियत संघ के गुटों में बंट रहा था, तब नेहरू जी ने 1961 (बेलग्रेड सम्मेलन) में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी। इसका उद्देश्य किसी भी सैन्य गठबंधन से दूर रहकर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को सुरक्षित रखना था।

  • पंचशील समझौता (Panchsheel): वर्ष 1954 में भारत और चीन के मध्य हुए इस समझौते ने नेहरू की विदेश नीति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। इसके पाँच सिद्धांत— एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान, अनाक्रमण, अहस्तक्षेप, समानता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व— आज भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए आदर्श माने जाते हैं।

  • उपनिवेशवाद और नस्लवाद का विरोध: नेहरू जी ने एशिया और अफ्रीका के देशों की स्वतंत्रता का प्रखर समर्थन किया और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद (Apartheid) की नीतियों का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ा विरोध किया।

  • संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शांति में विश्वास: वे अंतरराष्ट्रीय विवादों के सैन्य समाधान के विरुद्ध थे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी संस्थाओं को सशक्त बनाने और निरस्त्रीकरण (Disarmament) का समर्थन किया।

3. बिहार के विशेष संदर्भ में वैचारिक प्रासंगिकता

नेहरू जी के धर्मनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार आज भी प्रासंगिक हैं, विशेषकर बिहार की जनसांख्यिकी और भौगोलिक अवस्थिति को देखते हुए:

  • सामाजिक समरसता और समावेशी विकास: बुद्ध, महावीर और सूफी संतों की भूमि रहे बिहार में सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता अत्यंत गहरी है। पटना और सभी बिहार के ज़िलों में सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक शांति बनाए रखने के लिए नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता का मॉडल ही राज्य के समावेशी विकास (Inclusive Growth) की प्राथमिक शर्त है।

  • पड़ोसी देशों के साथ संबंध और सीमावर्ती सुरक्षा: बिहार की एक लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा नेपाल के साथ लगती है। जल प्रबंधन (विशेषकर कोसी और गंडक नदियों के संदर्भ में), सीमा पार व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सुचारू संचालन के लिए नेहरू के 'शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व' और 'अहस्तक्षेप' के सिद्धांत आज भी कूटनीतिक रूपरेखा का कार्य करते हैं।

आगे की राह

वर्तमान बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था और वैश्वीकरण के युग में भारत के समक्ष चुनौतियां बदल गई हैं, किंतु नेहरू जी के विचारों का मूल तत्व आज भी जीवित है। आज भारत की 'बहु-गुटनिरपेक्षता' (Multi-alignment) या 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) मूल रूप से नेहरू के NAM का ही आधुनिक और व्यावहारिक संस्करण है।

एक सशक्त और 'विकसित भारत' के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से आंतरिक मोर्चे पर राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक चेतना को सुदृढ़ करें, तथा विदेश नीति के मोर्चे पर 'विश्वमित्र' की भूमिका निभाते हुए वैश्विक शांति और 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करें।

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