गांधी और टैगोर के विचारों में शिक्षा और राष्ट्रवाद को लेकर क्या बुनियादी अंतर थे?

 Q. गांधी और टैगोर के विचारों में शिक्षा और राष्ट्रवाद को लेकर क्या बुनियादी अंतर थे?

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महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों में शिक्षा और राष्ट्रवाद का तुलनात्मक विश्लेषण

भूमिका

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारतीय चिंतन के क्षितिज पर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर (गुरुदेव) दो सर्वाधिक देदीप्यमान नक्षत्र हैं। यद्यपि दोनों महापुरुषों का अंतिम ध्येय भारत का सर्वांगीण विकास और मानव मुक्ति था, तथापि उनके वैचारिक दृष्टिकोणों, विशेषकर शिक्षा (Education) और राष्ट्रवाद (Nationalism) के संदर्भ में, स्पष्ट और बुनियादी भिन्नताएं थीं। जहाँ गांधीजी का दृष्टिकोण व्यावहारिक, यथार्थवादी और राजनीतिक-आर्थिक आवश्यकताओं पर केंद्रित था, वहीं टैगोर का चिंतन दार्शनिक, सौन्दर्यशास्त्रीय और सार्वभौमिक मानवतावाद से ओत-प्रोत था। इन दोनों विचारकों का तुलनात्मक अध्ययन आधुनिक भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया को समझने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

मुख्य भाग

1. शिक्षा के संदर्भ में बुनियादी अंतर

शिक्षा को लेकर दोनों विचारकों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली (मैकाले की शिक्षा नीति) की आलोचना की, किंतु उनके विकल्प भिन्न थे:

  • गांधीजी की 'नई तालीम' (बुनियादी शिक्षा):

    • श्रम और कौशल का एकीकरण: वर्ष 1937 की वर्धा योजना के माध्यम से गांधीजी ने 'नई तालीम' (Nai Talim) का प्रतिपादन किया। उनका मानना था कि शिक्षा हस्तशिल्प (Craft) और उत्पादक श्रम के माध्यम से दी जानी चाहिए।

    • आत्मनिर्भरता: गांधीजी की शिक्षा का मूल उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना और विद्यार्थियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था।

    • माध्यम: उन्होंने प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम पूर्णतः मातृभाषा को रखने पर बल दिया ताकि मस्तिष्क पर अनावश्यक भाषाई बोझ न पड़े।

  • टैगोर का प्रकृतिवादी और रचनात्मक दृष्टिकोण:

    • प्रकृति के सानिध्य में शिक्षा: टैगोर ने बंद कमरों की शिक्षा का विरोध किया। वर्ष 1901 में 'शांतिनिकेतन' की स्थापना के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को उन्मुक्त प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा देना था।

    • रचनात्मकता और कला का महत्व: टैगोर की शिक्षा प्रणाली में उपयोगितावाद से अधिक जोर ललित कलाओं, संगीत, साहित्य और आत्मा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर था।

    • पूर्व और पश्चिम का समन्वय: टैगोर संकीर्ण भाषाई या सांस्कृतिक सीमाओं के विरुद्ध थे। उन्होंने विश्व-भारती के माध्यम से भारतीय दर्शन और पाश्चात्य विज्ञान के समन्वय (Synthesis) की वकालत की।

2. राष्ट्रवाद के संदर्भ में बुनियादी अंतर

राष्ट्रवाद के प्रश्न पर गांधी और टैगोर के मध्य ऐतिहासिक वैचारिक बहस (1921-1925) हुई, जिसने भारतीय राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी:

  • गांधीजी का राजनीतिक और नैतिक राष्ट्रवाद:

    • स्वराज और जन-आंदोलन: गांधीजी के लिए राष्ट्रवाद एक सक्रिय राजनीतिक और नैतिक अस्त्र था। उनका 'स्वराज' (Swaraj) केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक था।

    • अहिंसक असहयोग: उन्होंने राष्ट्रवाद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए चरखा, खादी और असहयोग जैसे प्रतीकों का उपयोग किया। उनके लिए देशभक्ति और मानवता में कोई विरोधाभास नहीं था।

  • टैगोर की राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना:

    • 'भौगोलिक दैत्य' की संज्ञा: अपनी पुस्तक 'नेशनलिज़्म' (1917) में टैगोर ने पश्चिमी राष्ट्रवाद को शक्ति और सत्ता का यांत्रिक संगठन माना। उनका मानना था कि उग्र राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद और युद्ध को जन्म देता है।

    • मानवतावाद की सर्वोच्चता: टैगोर का स्पष्ट मत था कि "देशभक्ति हमारा अंतिम आध्यात्मिक आश्रय नहीं हो सकती; मेरा आश्रय मानवता है।" उन्होंने राष्ट्रवाद के स्थान पर अंतर्राष्ट्रीयतावाद (Internationalism) और 'वसुधैव कुटुम्बकम' का समर्थन किया।

    • असहयोग आंदोलन पर असहमति: टैगोर ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और चरखा कातने जैसे गांधीजी के राजनीतिक प्रतीकों का बौद्धिक विरोध किया, क्योंकि उन्हें इसमें संकीर्णता और आर्थिक तार्किकता का अभाव प्रतीत हुआ।

3. बिहार के परिप्रेक्ष्य में वैचारिक प्रासंगिकता

बिहार के ऐतिहासिक और वर्तमान प्रशासनिक संदर्भ में इन दोनों महापुरुषों के विचारों का संश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • समावेशी शिक्षा और कौशल विकास: गांधीजी की 'नई तालीम' और टैगोर के रचनात्मक विकास के मॉडल को एकीकृत करके ही पटना और सभी बिहार के ज़िलों में शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है। राज्य सरकार की 'कुशल युवा कार्यक्रम' जैसी नीतियां गांधीजी के कौशल आधारित शिक्षा दर्शन से प्रेरित हैं, जबकि टैगोर का मुक्त बौद्धिक वातावरण नालंदा और विक्रमशिला की ऐतिहासिक परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक है।

  • सामाजिक समरसता का निर्माण: बिहार की विविधतापूर्ण जनसांख्यिकी में टैगोर का मानवतावाद और गांधीजी का सर्वोदय दर्शन (समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान), दोनों मिलकर एक सशक्त और सहिष्णु समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आगे की राह

गांधी और टैगोर के विचार एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। गांधीजी वह 'कर्मयोगी' थे जिनकी व्यावहारिक रणनीतियों ने भारतीय जनमानस को स्वतंत्रता के लिए लामबंद किया, जबकि टैगोर वह 'ऋषि' थे जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि स्वतंत्र भारत संकीर्ण राष्ट्रवाद का शिकार न हो।

वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 इन दोनों विचारकों के दर्शन का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करती है। इसमें गांधीजी के 'कौशल विकास' और 'मातृभाषा में शिक्षा' (अनुच्छेद 21A के आलोक में) के साथ-साथ टैगोर के 'बहु-विषयक दृष्टिकोण' (Multidisciplinary Approach) और 'रचनात्मक सोच' को समाहित किया गया है। 21वीं सदी के 'विकसित भारत' के निर्माण के लिए हमें गांधीजी के दृढ़ संकल्प और टैगोर की वैश्विक दृष्टि, दोनों की समान रूप से आवश्यकता है।


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