जल संसाधन प्रबंधन और 'हर घर नल का जल' एवं 'जल जीवन हरियाली' जैसी बिहार सरकार की योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन करें।

 Q. जल संसाधन प्रबंधन और 'हर घर नल का जल' एवं 'जल जीवन हरियाली' जैसी बिहार सरकार की योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन करें।

Ans - 

जल संसाधन प्रबंधन एवं बिहार सरकार की पहल: एक विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

जल संसाधन प्रबंधन (Water Resource Management) से तात्पर्य जल के वैज्ञानिक वितरण, संरक्षण और इसके इष्टतम उपयोग से है, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखते हुए मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। भौगोलिक दृष्टि से, बिहार एक अनोखे 'जल-विरोधाभास' का सामना करता है—उत्तर बिहार जहाँ हिमालयी नदियों के कारण बाढ़ की विभीषिका झेलता है, वहीं दक्षिण बिहार भूजल की कमी और सूखे की चपेट में रहता है। इसी परिप्रेक्ष्य में, सतत विकास लक्ष्य (SDG 6 - स्वच्छ जल एवं स्वच्छता) और संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन एवं स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार) को सुनिश्चित करने के लिए बिहार सरकार द्वारा 'हर घर नल का जल' और 'जल-जीवन-हरियाली' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं प्रारंभ की गई हैं।

1. 'हर घर नल का जल' योजना: प्रभाव और मूल्यांकन

यह योजना राज्य सरकार के 'सात निश्चय - 1' (2015) कार्यक्रम का एक प्रमुख स्तंभ है। इसका मूल उद्देश्य राज्य के प्रत्येक ग्रामीण और शहरी परिवार को पाइपलाइन के माध्यम से सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है।

क. प्रमुख उपलब्धियाँ एवं प्रभाव

  • व्यापक कवरेज और समावेशी विकास: नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, बिहार ने अपने लगभग 99% से अधिक वार्डों में नल-जल योजना का कार्य पूर्ण कर लिया है। यह योजना केवल शहरी केंद्रों तक सीमित न रहकर पटना और सभी बिहार के जिलों के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है, जिसने 'रूरल-अर्बन डिवाइड' को काफी हद तक कम किया है।

  • स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, असुरक्षित पेयजल हैजा, टाइफाइड और डायरिया जैसी जलजनित बीमारियों का मुख्य कारण है। इस योजना के माध्यम से स्वच्छ जल की उपलब्धता ने शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु दर (MMR) को कम करने में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई है।

  • महिला सशक्तिकरण (जेंडर बजटिंग): ऐतिहासिक रूप से ग्रामीण महिलाओं का एक बड़ा समय पेयजल जुटाने में व्यतीत होता था। घर तक जल पहुँचने से महिलाओं के 'टाइम पॉवर्टी' (Time Poverty) में कमी आई है, जिससे उनकी उत्पादक कार्यों में भागीदारी बढ़ी है।

ख. चुनौतियाँ एवं सीमाएँ

  • संचालन एवं रख-रखाव (O&M): जलापूर्ति ग्रिड के बिछ जाने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती पाइपलाइनों के रिसाव (Leakages), मोटर पंपों की खराबी और ग्राम पंचायतों स्तर पर इसके नियमित रख-रखाव की है।

  • जल गुणवत्ता की समस्या: यद्यपि जल पहुँचाया जा रहा है, परंतु बिहार के कई जिलों (विशेषकर गंगा के तटीय और कोसी बेसिन क्षेत्र) में भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन का अत्यधिक संकेंद्रण है। सभी स्थानों पर जल-शोधन संयंत्रों (Water Treatment Plants) का सुचारू रूप से कार्य न करना एक चिंता का विषय है।

2. 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान: प्रभाव और मूल्यांकन

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और पारिस्थितिक संतुलन को पुनर्स्थापित करने के लिए वर्ष 2019 में इस अभियान की शुरुआत की गई। यह जल संरक्षण और वनीकरण का एक एकीकृत मॉडल है।

क. प्रमुख उपलब्धियाँ एवं प्रभाव

  • पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार: इस योजना के तहत राज्य भर में अतिक्रमण का शिकार हो चुके सार्वजनिक कुओं, तालाबों और ऐतिहासिक 'आहर-पाइन' (Ahar-Pyne) प्रणाली का जीर्णोद्धार और गाद-निकासी (De-siltation) की गई है।

  • भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge): सार्वजनिक भवनों पर रूफटॉप वर्षा जल संचयन (RWH) प्रणालियों और सोख्ता (Soak pit) के निर्माण से भूमिगत जल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है।

  • हरित आवरण में वृद्धि: सघन वृक्षारोपण अभियानों के फलस्वरूप, राज्य का हरित आवरण (Green Cover) जो झारखंड विभाजन (2000) के समय मात्र 9% के करीब था, वह अब बढ़कर 15% के लक्ष्य को पार कर गया है। कृषि वानिकी (Agro-forestry) को भी प्रोत्साहन मिला है।

ख. चुनौतियाँ एवं सीमाएँ

  • अतिक्रमण की जटिलता: कई पारंपरिक जल स्रोतों पर भू-माफियाओं या स्थानीय दबंगों का स्थायी अतिक्रमण है, जिसे कानूनी विवादों के कारण पूरी तरह से हटाना प्रशासनिक स्तर पर चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो रहा है।

  • व्यवहार परिवर्तन (Behavioral Change): जल संरक्षण केवल अवसंरचना निर्माण से नहीं हो सकता। कृषि में अत्यधिक जल-दोहन (बाढ़ सिंचाई) और आम नागरिकों द्वारा पानी की बर्बादी को रोकने के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है।

3. आगे की राह एवं रणनीतिक सुझाव (Way Forward)

उपर्युक्त योजनाओं ने बिहार को जल प्रबंधन के क्षेत्र में एक 'रोल मॉडल' के रूप में स्थापित किया है (जिसकी सराहना नीति आयोग ने भी की है), परंतु इसे पूरी तरह से टिकाऊ बनाने के लिए निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:

  1. तकनीकी एकीकरण (IoT & AI): 'हर घर नल का जल' योजना में पानी की बर्बादी और रिसाव को रोकने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित स्मार्ट मीटर और सेंसर्स का उपयोग किया जाना चाहिए।

  2. विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन: ग्राम पंचायतों और वार्ड क्रियान्वयन एवं प्रबंधन समितियों (WIMC) को वित्तीय और तकनीकी रूप से सशक्त बनाया जाए ताकि वे जल-कर (Water User Charges) वसूल कर योजनाओं का स्थायी संचालन कर सकें।

  3. कृषि-जलवायु जोनिंग (Agro-climatic Zoning): 'जल-जीवन-हरियाली' को कृषि विभाग की 'फसल विविधीकरण' योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए। पटना और सभी बिहार के जिलों में पानी की खपत वाली पारंपरिक धान की खेती के स्थान पर 'श्री विधि' (SRI) और मोटे अनाजों (Millets) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

बिहार सरकार की ये दोनों योजनाएं राज्य के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में एक मूक क्रांति (Silent Revolution) ला रही हैं। यदि नागरिक जन-भागीदारी (Community Participation) और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सही समन्वय स्थापित किया जाए, तो बिहार न केवल अपने जल-संकट को मात दे सकता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध एक वैश्विक मानक भी स्थापित कर सकता है।

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