महिला सशक्तिकरण कल्पना या वास्तविकता ? (सामाजिक विषय)

 Q. महिला सशक्तिकरण कल्पना या वास्तविकता ? (सामाजिक विषय)

Ans - 

महिला सशक्तिकरण: कल्पना या वास्तविकता? एक आलोचनात्मक मूल्यांकन

भूमिका

संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर का यह कथन कि, "मैं किसी भी समुदाय की प्रगति का माप उस प्रगति से करता हूँ जो उस समुदाय की महिलाओं ने हासिल की है," महिला सशक्तिकरण के वास्तविक मापदंड को स्पष्ट करता है। महिला सशक्तिकरण एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसमें महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता तथा निर्णय लेने की क्षमता (Agency) का विकास शामिल है। समकालीन भारत में यह विषय एक अत्यंत महत्वपूर्ण विमर्श है, क्योंकि जहाँ एक ओर संवैधानिक प्रावधान और नीतियाँ इसे 'वास्तविकता' में बदलने का प्रयास कर रही हैं, वहीं सामाजिक संरचना में अंतर्निहित पितृसत्तात्मक चुनौतियां इसे 'कल्पना' तक सीमित करने का प्रयास करती हैं।

वास्तविकता के धरातल पर महिला सशक्तिकरण (सकारात्मक पक्ष)

स्वतंत्रता के पश्चात् से ही राज्य द्वारा महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए संस्थागत और नीतिगत प्रयास किए गए हैं, जो इसके यथार्थ रूप को दर्शाते हैं:

  • राजनीतिक सशक्तिकरण: 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने स्थानीय निकायों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व प्रदान किया। हाल ही में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023' (106वाँ संविधान संशोधन) ने संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण सुनिश्चित कर राजनीतिक निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी को ऐतिहासिक वास्तविकता में बदल दिया है।

  • आर्थिक स्वावलंबन: मुद्रा योजना (MUDRA Yojana), स्टैंड-अप इंडिया और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के व्यापक नेटवर्क ने महिला उद्यमिता को बढ़ावा दिया है। श्रम बल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस आर्थिक स्वतंत्रता का प्रमाण है।

  • संवैधानिक एवं विधिक संरक्षण: अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 महिलाओं को समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देते हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए विशाखा गाइडलाइंस (POSH Act) और समान पारिश्रमिक अधिनियम इसके ठोस वैधानिक आधार हैं।

  • न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन (Permanent Commission) देने और सबरीमाला मंदिर प्रवेश जैसे ऐतिहासिक निर्णयों ने लैंगिक समानता की वास्तविक स्थापना की है।

बिहार के विशेष संदर्भ में सशक्तिकरण के प्रयास

बिहार सरकार की नीतियां महिला सशक्तिकरण को केवल फाइलों तक सीमित न रखकर, पटना से लेकर बिहार के सभी ज़िलों तक एक ज़मीनी वास्तविकता में परिवर्तित कर रही हैं:

  • संस्थागत आरक्षण: पंचायती राज संस्थाओं (2006) और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने वाला बिहार देश का पहला राज्य बना।

  • प्रशासनिक और रोजगार भागीदारी: राज्य सरकार द्वारा पुलिस बल सहित सभी सरकारी नौकरियों में 35% क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) लागू किया गया है, जिससे प्रशासन में महिलाओं की दृश्यता और प्रभाव में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

  • आर्थिक क्रांति का आधार - 'जीविका' (JEEViKA): बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति ने लाखों स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र किया है, बल्कि उन्हें सामाजिक कुरीतियों (जैसे शराबबंदी आंदोलन) के खिलाफ एक मजबूत आवाज़ भी दी है।

  • शैक्षणिक सशक्तीकरण: 'मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना' और 'मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना' ने स्कूल ड्रॉपआउट दर को कम करने और उच्च शिक्षा में बालिकाओं के नामांकन को बढ़ाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है।

सशक्तिकरण एक 'कल्पना' क्यों प्रतीत होता है? (प्रमुख चुनौतियाँ)

तमाम संस्थागत प्रयासों के बावजूद, संरचनात्मक और सामाजिक बाधाएं आज भी महिला सशक्तिकरण को पूर्ण वास्तविकता बनने से रोकती हैं:

  • पितृसत्तात्मक मानसिकता और 'सरपंच पति' की अवधारणा: स्थानीय निकायों में आरक्षण के बावजूद, कई क्षेत्रों में चुनी गई महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक शक्तियों का प्रयोग उनके पुरुष रिश्तेदारों ('मुखिया पति' या 'सरपंच पति') द्वारा किया जाता है।

  • श्रम शक्ति और आर्थिक असमानता: यद्यपि महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) में सुधार हुआ है, फिर भी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट (WEF) के अनुसार वेतन अंतराल (Wage Gap) एक बड़ी समस्या है। इसके अतिरिक्त, महिलाओं का बड़ा वर्ग अवैतनिक घरेलू श्रम (Unpaid Care Work) में लगा हुआ है, जिसकी गणना जीडीपी में नहीं होती।

  • सुरक्षा और हिंसा की समस्या: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आँकड़े महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा, दहेज हत्या और साइबर अपराधों में चिंताजनक स्थिति दर्शाते हैं। सुरक्षा के बिना सशक्तिकरण केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा रह जाती है।

  • डिजिटल और स्वास्थ्य अंतराल (Digital & Health Divide): ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, तथा पुरुषों और महिलाओं के बीच तकनीकी पहुँच और डिजिटल साक्षरता में भारी अंतर है। साथ ही, एनीमिया और मातृ मृत्यु दर (MMR) जैसी स्वास्थ्य चुनौतियां आज भी गंभीर हैं।

आगे की राह एवं समग्र मूल्यांकन

महिला सशक्तिकरण न तो पूरी तरह से एक मिथक (कल्पना) है और न ही अभी तक एक पूर्ण वास्तविकता बन पाया है; यह एक संक्रमणकालीन प्रक्रिया (Transitional phase) में है। इसे एक संपूर्ण यथार्थ में बदलने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

  1. व्यवहारपरक परिवर्तन (Behavioral Change): नीतियों के निर्माण के साथ-साथ समाज की पितृसत्तात्मक सोच में बदलाव लाना आवश्यक है। यह शिक्षा प्रणाली और जेंडर सेंसिटाइजेशन (Gender Sensitization) के माध्यम से ही संभव है।

  2. आर्थिक समावेशन और कौशल विकास: महिलाओं को पारंपरिक भूमिकाओं से निकालकर STEM (Science, Technology, Engineering, and Mathematics) शिक्षा और भविष्य के तकनीकी कौशल से लैस करना होगा।

  3. कानूनों का सख्त क्रियान्वयन: महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों (जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम) का त्वरित और पारदर्शी निष्पादन सुनिश्चित करना प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए।

सच्चा सशक्तिकरण तब वास्तविकता बनेगा जब नीतियां केवल 'संरक्षण' (Protection) के बजाय 'क्षमता निर्माण' (Capacity Building) पर केंद्रित होंगी, और जब महिला सशक्तिकरण राज्य द्वारा संचालित योजना के बजाय समाज द्वारा अपनाया गया एक स्वाभाविक मूल्य बन जाएगा।

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