भारत में कोयला और पेट्रोलियम के वितरण का विवरण दें और ऊर्जा सुरक्षा के लिए इनके विकल्प क्या हैं?
Q. भारत में कोयला और पेट्रोलियम के वितरण का विवरण दें और ऊर्जा सुरक्षा के लिए इनके विकल्प क्या हैं?
भारत में जीवाश्म ईंधन का वितरण और ऊर्जा सुरक्षा के वैकल्पिक आयाम
किसी भी राष्ट्र के सतत आर्थिक विकास और औद्योगिक प्रगति के लिए 'ऊर्जा सुरक्षा' (Energy Security) एक प्राथमिक शर्त है। नीति आयोग के अनुसार, ऊर्जा सुरक्षा का तात्पर्य नागरिकों को वहनीय, विश्वसनीय और स्वच्छ ऊर्जा की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी व्यावसायिक ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए मुख्य रूप से कोयला (लगभग 50-55% स्थापित क्षमता) और पेट्रोलियम (लगभग 85% आयात निर्भरता) पर आश्रित है। तेजी से बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन (COP26 के पंचामृत लक्ष्य) की पृष्ठभूमि में इन संसाधनों के वितरण और उनके धारणीय विकल्पों का विश्लेषण अत्यंत प्रासंगिक है।
1. भारत में कोयला संसाधनों का वितरण
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार, भारत में कोयले के भंडार को भूगर्भिक कालक्रम के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
क. गोंडवाना कोयला क्षेत्र (कुल भंडार का लगभग 98%)
यह कोयला लगभग 250 मिलियन वर्ष पुराना है और मुख्य रूप से बिटुमिनस (Bituminous) प्रकार का है। इसका विस्तार प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदी घाटियों में पाया जाता है:
दामोदर घाटी: यह भारत का सबसे समृद्ध कोयला क्षेत्र है। इसमें झारखंड (झरिया, बोकारो, गिरिडीह) और पश्चिम बंगाल (रानीगंज) की खदानें शामिल हैं। झरिया भारत में कोकिंग कोयले का सबसे बड़ा स्रोत है।
महानदी घाटी: इसके अंतर्गत ओडिशा (तलचर, ईब घाटी) और छत्तीसगढ़ (कोरबा) के विशाल भंडार आते हैं।
गोदावरी एवं वर्धा घाटी: तेलंगाना (सिंगरेनी खदानें) और महाराष्ट्र (चंदा-वर्धा) में इसका विस्तार है, जो दक्षिणी राज्यों की तापीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करता है।
ख. टर्शियरी कोयला क्षेत्र (कुल भंडार का 2%)
यह कोयला 15 से 60 मिलियन वर्ष पुराना है और इसमें कार्बन की मात्रा कम तथा नमी व गंधक (Sulfur) अधिक होता है।
पूर्वोत्तर भारत: असम (माकूम), मेघालय (चेरापूंजी), और अरुणाचल प्रदेश (नामचिक-नामफुक)।
लिग्नाइट (भूरा कोयला): तमिलनाडु के नेवेली (Neyveli) में भारत का सबसे बड़ा लिग्नाइट भंडार स्थित है। इसके अतिरिक्त राजस्थान (पलाना) और गुजरात में भी इसके निक्षेप मौजूद हैं।
2. भारत में पेट्रोलियम (कच्चा तेल) का वितरण
पेट्रोलियम टर्शियरी काल की अवसादी चट्टानों (Sedimentary Rocks) में पाया जाता है। तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) और ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) के अन्वेषणों के आधार पर भारत के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं:
क. पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र (Western Offshore Basin)
मुंबई हाई (Mumbai High): मुंबई तट से 176 किमी दूर अरब सागर में स्थित यह भारत का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र है (कुल उत्पादन का लगभग 65%)।
बेसीन (Bassein) एवं आलियाबेट: मुंबई हाई के दक्षिण में स्थित ये क्षेत्र तेल के साथ-साथ प्राकृतिक गैस के भी प्रमुख स्रोत हैं।
ख. तटीय एवं स्थलीय क्षेत्र (Onshore Regions)
असम-अराकान बेल्ट: भारत में तेल का सबसे पुराना क्षेत्र। डिगबोई (Digboi) भारत की पहली तेल रिफाइनरी है। इसके अलावा नहरकटिया, मोरान-हुगरीजन प्रमुख उत्पादक हैं।
गुजरात (खंभात बेसिन): अंकलेश्वर (Ankleshwar), कलोल और मेहसाणा यहाँ के प्रमुख तेल उत्पादक केंद्र हैं।
पूर्वी अपतटीय क्षेत्र (Eastern Offshore): गोदावरी, कृष्णा (KG Basin) और कावेरी नदियों के डेल्टाई क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस के महत्वपूर्ण भंडार खोजे गए हैं (जैसे- रावा अपतटीय क्षेत्र)।
3. बिहार के संदर्भ में ऊर्जा सुरक्षा का परिदृश्य
वर्ष 2000 में झारखंड के पृथक्करण के बाद, बिहार अपनी भौगोलिक सीमा में स्थित पारंपरिक कोयला और खनिज संसाधनों से वंचित हो गया। इस रिक्ति को भरने और राज्य की ऊर्जा संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए, वर्तमान में पटना और सभी बिहार के जिलों में स्वच्छ और वैकल्पिक ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर अभूतपूर्व बल दिया जा रहा है। 'बिहार इथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति, 2021' के माध्यम से राज्य के कृषि-अवशेषों (मक्का, टूटे चावल, गन्ना) का उपयोग कर जैव-ईंधन का निर्माण किया जा रहा है। यह नीति केवल कुछ विशिष्ट क्षेत्रों तक सीमित न रहकर पटना सहित राज्य के सभी जिलों के ग्रामीण औद्योगीकरण और ऊर्जा विकेंद्रीकरण का एक सशक्त माध्यम बन रही है, जिससे जीवाश्म ईंधन पर राज्य की निर्भरता घट रही है।
4. ऊर्जा सुरक्षा हेतु धारणीय एवं नवीकरणीय विकल्प (Alternatives)
आयातित पेट्रोलियम के बढ़ते बिल और जीवाश्म ईंधन के कार्बन उत्सर्जन को देखते हुए, सतत विकास लक्ष्य (SDG 7 - Affordable and Clean Energy) की प्राप्ति हेतु भारत निम्नलिखित विकल्पों की ओर तेजी से अग्रसर है:
क. सौर एवं पवन ऊर्जा (Solar & Wind Energy)
भारत अपनी भौगोलिक अवस्थिति के कारण वर्ष भर प्रचुर सौर विकिरण प्राप्त करता है। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और राष्ट्रीय सौर मिशन के तहत रूफटॉप सोलर, फ्लोटिंग सोलर (जैसे- दरभंगा में स्थापित) और सोलर पार्क का विकास कोयला आधारित बिजली का सबसे प्रभावी विकल्प है।
गुजरात और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में अपतटीय पवन ऊर्जा (Offshore Wind Energy) की अपार संभावनाएं हैं।
ख. जैव ईंधन (Biofuels)
राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति और E20 लक्ष्य (2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल सम्मिश्रण) के माध्यम से पेट्रोलियम आयात निर्भरता में भारी कटौती की जा रही है।
ग. हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen)
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके जल के इलेक्ट्रोलिसिस से हाइड्रोजन का उत्पादन किया जा रहा है। यह भारी उद्योगों (स्टील, सीमेंट) और लंबी दूरी के परिवहन (Fuel Cell Vehicles) में पेट्रोलियम और कोयले का सर्वोत्तम शून्य-उत्सर्जन (Zero-emission) विकल्प है।
घ. नाभिकीय एवं जलविद्युत ऊर्जा
यूरेनियम और थोरियम (केरल की मोनोजाइट रेत) आधारित त्रि-चरणीय नाभिकीय कार्यक्रम बेस-लोड पावर (Base-load power) प्रदान करने का एक विश्वसनीय विकल्प है। इसके साथ ही लघु जलविद्युत परियोजनाओं (Small Hydro Projects) को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
आगे की राह (Way Forward)
जीवाश्म ईंधन (कोयला और पेट्रोलियम) ने ऐतिहासिक रूप से राष्ट्र निर्माण में धुरी का कार्य किया है, परंतु 21वीं सदी की भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और जलवायु संकट ने ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) को अनिवार्य बना दिया है।
ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत को केवल उत्पादन के स्रोतों में विविधता लाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्मार्ट ग्रिड अवसंरचना (Smart Grid Infrastructure), उन्नत बैटरी भंडारण प्रणालियों (Battery Energy Storage Systems - BESS) और लिथियम-आयन व सेमीकंडक्टर अनुसंधान में भारी निवेश करना चाहिए। जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय विकल्पों की ओर यह चरणबद्ध और न्यायसंगत बदलाव (Just Transition) ही भारत को 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य तक ले जाएगा और वैश्विक मंच पर एक हरित महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा।