बिहार में खनिज संसाधनों (विशेषकर दक्षिण बिहार में) की उपलब्धता और उनके आर्थिक उपयोग की विवेचना करें।
Q. बिहार में खनिज संसाधनों (विशेषकर दक्षिण बिहार में) की उपलब्धता और उनके आर्थिक उपयोग की विवेचना करें।
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बिहार में खनिज संसाधन: भूगर्भिक वितरण, आर्थिक उपयोग एवं धारणीय विकास
वर्ष 2000 में झारखंड के पृथक्करण के पश्चात् यह एक सामान्य धारणा बन गई थी कि बिहार अपनी खनिज संपदा (Mineral Wealth) से पूर्णतः वंचित हो गया है। परंतु, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और राज्य के खान एवं भूतत्व विभाग के हालिया अन्वेषणों ने इस परिप्रेक्ष्य को बदल दिया है। वर्तमान में, बिहार के दक्षिणी सीमांत क्षेत्रों (छोटानागपुर पठार के विस्तार) में औद्योगिक महत्व के कई प्रमुख खनिजों के भंडार प्रमाणित हुए हैं। इन संसाधनों का वैज्ञानिक दोहन राज्य के औद्योगीकरण और राजस्व प्राप्ति के लिए एक नई जीवनरेखा बन सकता है।
1. दक्षिण बिहार में खनिज संसाधनों की उपलब्धता एवं वितरण
बिहार की भूगर्भिक संरचना के आधार पर राज्य के खनिज संसाधनों को मुख्यतः दो चट्टानी प्रणालियों के अंतर्गत देखा जा सकता है, जिनका संकेंद्रण दक्षिण बिहार में है:
क. विंध्यन चट्टान प्रणाली (Vindhyan Rock System)
यह संरचना मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिमी बिहार के कैमूर और रोहतास जिलों में पाई जाती है।
चूना पत्थर (Limestone): यह रोहतास की कैमूर पहाड़ियों और सोन नदी घाटी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह उच्च गुणवत्ता वाला चूना पत्थर है।
पाइराइट (Pyrite): इसे 'मूर्खों का सोना' (Fool's Gold) भी कहा जाता है। रोहतास के अमझोर (Amjhore) में भारत का लगभग 95% पाइराइट भंडार स्थित है।
सैंडस्टोन (Sandstone): कैमूर की पहाड़ियों में उच्च गुणवत्ता वाले भवन निर्माण पत्थरों (Building Stones) के व्यापक निक्षेप मौजूद हैं।
ख. धारवाड़ चट्टान प्रणाली (Dharwar Rock System)
यह सबसे पुरानी और खनिज समृद्ध संरचना है, जिसका विस्तार दक्षिण-पूर्वी बिहार के गया, नवादा, जमुई, मुंगेर और बांका जिलों में है।
स्वर्ण अयस्क (Gold Ore): GSI की रिपोर्ट के अनुसार, जमुई के करमटिया, सोनो और झाझा क्षेत्रों में देश के कुल स्वर्ण भंडार का लगभग 44% (222.88 मिलियन टन) मौजूद होने का अनुमान है।
अभ्रक (Mica): दुनिया का सबसे उच्च कोटि का 'रूबी अभ्रक' (Ruby Mica) नवादा, जमुई और गया की पेग्मेटाइट शिराओं में पाया जाता है।
क्वार्टजाइट एवं फेल्सपार: इनका भारी भंडार जमुई और मुंगेर (खड़कपुर की पहाड़ियाँ) में स्थित है।
मैग्नेटाइट और बॉक्साइट: गया जिले में मैग्नेटाइट तथा मुंगेर (खड़कपुर) में बॉक्साइट के भंडार चिन्हित किए गए हैं।
(नोट: इसके अतिरिक्त उत्तर और मध्य बिहार के जलोढ़ मैदानों—बेगूसराय, समस्तीपुर, सारण—में ऐतिहासिक रूप से शोरा (Saltpetre) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिसका उपयोग ब्रिटिश काल से ही बारूद और उर्वरक निर्माण में होता रहा है।)
2. खनिज संसाधनों का आर्थिक उपयोग एवं संभावनाएं
इन खनिज संसाधनों का दोहन राज्य की अर्थव्यवस्था में एक 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' (Multiplier Effect) उत्पन्न कर सकता है:
सीमेंट उद्योग का पुनरुद्धार: रोहतास और कैमूर में उपलब्ध चूना पत्थर के कारण इस क्षेत्र में सीमेंट उद्योग की असीम संभावनाएं हैं। डालमियानगर (रोहतास) और बंजारी के ऐतिहासिक सीमेंट कारखानों के मॉडल पर नए उद्योगों की स्थापना की जा सकती है, जिससे रोजगार सृजन होगा।
उर्वरक एवं रसायन उद्योग: अमझोर के पाइराइट का उपयोग सल्फ्यूरिक एसिड और फॉस्फेटिक उर्वरकों के निर्माण में किया जा सकता है। यह कृषि-प्रधान राज्य में उर्वरक सुरक्षा (Fertilizer Security) सुनिश्चित करेगा।
मूल्यवान धातुओं से राजस्व प्राप्ति: जमुई में स्वर्ण ब्लॉकों और औरंगाबाद/गया में पोटाश एवं क्रोमियम ब्लॉकों की हालिया पारदर्शी नीलामी (Auction) प्रक्रिया से राज्य के गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue) में भारी वृद्धि होगी।
समग्र आर्थिक एकीकरण: यद्यपि खनन गतिविधियाँ दक्षिणी सीमांत जिलों में केंद्रित हैं, परंतु इन खनिजों पर आधारित प्रसंस्करण इकाइयों, लॉजिस्टिक्स, और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के विकास से पटना और सभी बिहार के जिलों में नए उद्योगों और एमएसएमई (MSMEs) का जाल बिछेगा। इससे संपूर्ण राज्य का एकीकृत औद्योगीकरण संभव हो सकेगा।
विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स: नवादा और गया के अभ्रक का उपयोग इंसुलेटर के रूप में इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा उपकरणों में निर्यात हेतु किया जा सकता है।
3. खनिज दोहन से जुड़ी चुनौतियां
अवैध खनन एवं पर्यावरणीय क्षरण: दक्षिण बिहार की नदियों (जैसे- सोन, फल्गु, किऊल) में अवैध बालू खनन (Sand Mining) और कैमूर की पहाड़ियों में अनधिकृत पत्थर खनन ने पारिस्थितिक असंतुलन और भूजल संकट को जन्म दिया है।
तकनीकी एवं आधारभूत ढांचे का अभाव: गहरे भूगर्भिक अन्वेषणों (Deep-seated exploration) के लिए आधुनिक तकनीक और भारी निवेश की कमी है।
खनन पट्टों (Mining Leases) का विवाद: वन और पर्यावरण क्लीयरेंस (Environment Clearance) मिलने में देरी और भूमि अधिग्रहण की जटिलताएं निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं।
आगे की राह (Way Forward)
बिहार को अपनी खनिज संपदा का अधिकतम आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए नीतिगत और तकनीकी सुधारों की आवश्यकता है:
पारदर्शी और प्रौद्योगिकी-संचालित नीति: 'बिहार राज्य खनन नीति' को पूरी तरह से पारदर्शी बनाना होगा। अवैध खनन को रोकने के लिए ड्रोन मैपिंग, जियो-फेंसिंग (Geo-fencing) और बारकोड आधारित चालान प्रणाली का सख्ती से अनुपालन आवश्यक है।
मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर बल: कच्चे खनिजों के सीधे निर्यात के बजाय, राज्य सरकार को 'प्लग एंड प्ले' (Plug and Play) औद्योगिक पार्कों की स्थापना करनी चाहिए, ताकि खनन क्षेत्रों के पास ही खनिजों का प्रसंस्करण (Processing) हो सके।
सतत खनन (Sustainable Mining): खनन गतिविधियों के दौरान डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) फंड का समुचित उपयोग स्थानीय जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्वास के लिए किया जाना चाहिए।
झारखंड विभाजन के बाद के 'खनिज-विहीन बिहार' के मिथक को वैज्ञानिक अन्वेषणों ने तोड़ दिया है। अब आवश्यकता है कि सुशासन (Good Governance) और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) के माध्यम से इन छिपे हुए संसाधनों को राज्य की आर्थिक महाशक्ति में परिवर्तित किया जाए।