शहरीकरण क्या है? भारत और विशेष रूप से बिहार में अनियोजित शहरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का विश्लेषण करें।

 Q. शहरीकरण क्या है? भारत और विशेष रूप से बिहार में अनियोजित शहरीकरण से उत्पन्न समस्याओं का विश्लेषण करें।

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शहरीकरण की संकल्पना एवं अनियोजित शहरीकरण की चुनौतियाँ: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

शहरीकरण (Urbanization) केवल एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह एक बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है, जिसमें जनसंख्या का ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का गैर-कृषि (औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र) अर्थव्यवस्था में रूपांतरण शामिल है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, शहरीकरण आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण का एक प्रमुख वाहक है। भारत में जनगणना 2011 के अनुसार शहरी जनसंख्या 31.16% थी, जिसके वर्ष 2050 तक 50% को पार कर जाने का अनुमान है।

यद्यपि शहरीकरण को आर्थिक विकास का इंजन (Engines of Economic Growth) माना जाता है, परंतु भारत और विशेष रूप से बिहार में इसका स्वरूप अनियोजित (Unplanned) और बेतरतीब रहा है, जिसने कई गंभीर ढांचागत और पर्यावरणीय संकटों को जन्म दिया है।

1. भारत में अनियोजित शहरीकरण से उत्पन्न प्रमुख समस्याएं

भारत में शहरीकरण 'विकास-प्रेरित' (Development-induced) होने के बजाय मुख्य रूप से 'संकट-प्रेरित' (Distress-driven) रहा है, जिसका अर्थ है कि लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संकट के कारण शहरों की ओर पलायन करते हैं। इससे निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हुई हैं:

क. मलिन बस्तियों (Slums) का अनियंत्रित विस्तार

  • विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की एक बड़ी शहरी आबादी मलिन बस्तियों में रहने को विवश है। मुंबई की धारावी बस्ती इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

  • वहनीय आवास (Affordable Housing) की कमी के कारण शहरी गरीबों को अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।

ख. आधारभूत संरचना का चरमराना और शहरी बाढ़ (Urban Flooding)

  • मास्टर प्लान की कमी के कारण शहरों का विस्तार प्राकृतिक जल निकासी मार्गों (Drainage systems) और आर्द्रभूमियों (Wetlands) का अतिक्रमण करके हो रहा है।

  • इसके परिणामस्वरूप चेन्नई (2015) और बेंगलुरु जैसे महानगरों में थोड़ी सी बारिश में ही गंभीर 'शहरी बाढ़' की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके अतिरिक्त, यातायात जाम (Traffic congestion) और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) की विफलता आम बात हो गई है।

ग. पर्यावरणीय अवनयन एवं संसाधन संकट

  • कंक्रीट के अत्यधिक उपयोग और हरित आवरण की कमी से शहर 'शहरी ऊष्मा द्वीप' (Urban Heat Islands - UHI) में तब्दील हो रहे हैं।

  • दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का खतरनाक स्तर और कई शहरों में भूजल का 'डे जीरो' (Day Zero) स्तर पर पहुंचना अनियोजित शहरीकरण का ही परिणाम है।

2. बिहार के विशेष संदर्भ में अनियोजित शहरीकरण का विश्लेषण

बिहार ऐतिहासिक रूप से भारत के सबसे कम शहरीकृत राज्यों में से एक रहा है (2011 की जनगणना के अनुसार मात्र 11.3%)। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के हालिया आंकड़ों के अनुसार, नए नगर निकायों (नगर पंचायतों और परिषदों) के गठन के बाद राज्य में शहरीकरण का स्तर बढ़कर लगभग 15.3% हो गया है। यह विस्तार केवल राजधानी तक सीमित न होकर पटना और सभी बिहार के जिलों में व्यापक रूप से देखा जा रहा है। परंतु, यह संक्रमण कई गंभीर चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है:

क. मास्टर प्लान का अभाव एवं बेतरतीब परिधीय विस्तार (Peri-Urban Sprawl)

  • राज्य में अधिकांश नए शहरी क्षेत्रों का विकास बिना किसी जोनिंग (Zoning) और मास्टर प्लान के हो रहा है। कृषि भूमियों को तेजी से अनियोजित आवासीय कॉलोनियों में बदला जा रहा है।

  • पटना और सभी बिहार के जिलों में नगर नियोजन (Town Planning) तंत्र के कमजोर होने के कारण संकरी सड़कें, सीवरेज नेटवर्क का अभाव और सार्वजनिक खुले स्थानों (Public Parks/Spaces) की भारी कमी देखी जा रही है।

ख. जलभराव और ड्रेनेज का गंभीर संकट

  • बिहार के शहर प्राकृतिक रूप से नदियों के किनारे बसे हैं। अनियोजित निर्माण ने नदियों के बाढ़-क्षेत्रों (Floodplains) को अवरुद्ध कर दिया है।

  • वर्ष 2019 में पटना में आई भयानक जलभराव की समस्या (Urban Flooding) इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ राजधानी का एक बड़ा हिस्सा हफ्तों तक सीवेज मिश्रित पानी में डूबा रहा था। यह स्थिति कमोबेश राज्य के अन्य जिला मुख्यालयों की भी है।

ग. शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की वित्तीय एवं प्रशासनिक दुर्बलता

  • 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के बावजूद, बिहार में शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम, नगर परिषद) अत्यधिक वित्तीय दबाव में हैं।

  • संपत्ति कर (Property Tax) की कम वसूली और राज्य अनुदान पर अत्यधिक निर्भरता के कारण ये निकाय पेयजल, स्वच्छता और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाएं (Civic Amenities) प्रदान करने में अक्षम साबित हो रहे हैं।

घ. औद्योगिकीकरण के बिना शहरीकरण

  • पश्चिमी राज्यों के विपरीत, बिहार में शहरीकरण औद्योगिकीकरण (Industrialization) द्वारा संचालित नहीं है। यहाँ के शहर मुख्य रूप से प्रशासनिक या उपभोग-केंद्र (Consumption hubs) हैं। रोजगार के अवसरों की कमी के कारण शहरी क्षेत्रों में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) और बेरोजगारी का विस्तार हो रहा है।

3. रणनीतिक समाधान

अनियोजित शहरीकरण की प्रवृत्तियों को उलटने और शहरों को रहने योग्य बनाने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

  • मजबूत नगर नियोजन: अमृत 2.0 (AMRUT) और स्मार्ट सिटी मिशन के अभिसरण (Convergence) के माध्यम से राज्य के सभी छोटे-बड़े शहरों के लिए GIS-आधारित मास्टर प्लान अनिवार्य किया जाना चाहिए।

  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन (RURBAN): ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं प्रदान कर 'रूरल-अर्बन डिवाइड' को पाटना और संकट-प्रेरित पलायन को रोकना।

  • वित्तीय सशक्तिकरण: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों को सख्ती से लागू कर शहरी निकायों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर (Municipal Bonds जारी करने की अनुमति) बनाया जाए।

  • विकेंद्रीकृत विकास: निवेश और बुनियादी ढांचे को केवल एक महानगर तक सीमित रखने के बजाय, पटना और सभी बिहार के जिलों में समान रूप से सैटेलाइट टाउन (Satellite Towns) और औद्योगिक क्लस्टर विकसित किए जाएं।

आगे की राह (Way Forward)

शहरीकरण आर्थिक विकास की एक अपरिहार्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे एक समस्या के रूप में देखने के बजाय एक अवसर के रूप में प्रबंधित करने की आवश्यकता है। सतत विकास लक्ष्य-11 (SDG 11: Sustainable Cities and Communities) के अनुरूप भारत और बिहार को ऐसे शहरों का निर्माण करना होगा जो न केवल आर्थिक संवृद्धि के केंद्र हों, बल्कि पर्यावरणीय रूप से धारणीय (Sustainable), सामाजिक रूप से समावेशी (Inclusive) और आपदा-प्रतिरोधी (Disaster-resilient) भी हों। सुनियोजित नीतियां, नागरिक भागीदारी और तकनीकी नवाचार ही हमारे शहरों को भविष्य के 'स्मार्ट और जीवंत' (Smart and Livable) केंद्रों में बदल सकते हैं।

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