"पटना कलम चित्रकला शैली की मुख्य विशेषताओं का विवरण दें। यह अन्य शैलियों से कैसे भिन्न है?"

 Q"पटना कलम चित्रकला शैली की मुख्य विशेषताओं का विवरण दें। यह अन्य शैलियों से कैसे भिन्न है?"

Ans - अठारहवीं शताब्दी के मध्य में मुगल साम्राज्य के पतन और राजकीय संरक्षण के अभाव के कारण चित्रकारों का पलायन मुर्शिदाबाद और तदुपरांत बिहार के पटना (दानापुर और पटना सिटी) क्षेत्रों में हुआ। इन विस्थापित कलाकारों द्वारा स्थानीय ब्रिटिश अधिकारियों एवं भारतीय जमींदारों के व्यावसायिक संरक्षण में जिस नवीन और स्वतंत्र चित्रकला शैली का विकास किया गया, उसे 'पटना कलम' या 'कंपनी शैली' के नाम से जाना जाता है। प्रसिद्ध कला इतिहासकार पी. सी. मानक के अनुसार, यह विश्व की पहली ऐसी चित्रकला शैली थी जिसने राजदरबारों की भव्यता और कृत्रिमता को छोड़कर आम जनमानस के यथार्थपरक दैनिक जीवन को अपने कैनवास का मुख्य विषय बनाया।

पटना कलम चित्रकला की मुख्य विशेषताएं

पटना कलम चित्रकला अपनी सादगी, यथार्थवाद (Realism) और विशिष्ट तकनीकी प्रयोगों के लिए विख्यात है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • आम जनजीवन का जीवंत चित्रण: इस शैली का सबसे प्रमुख विषय तत्कालीन बिहार का सामाजिक और आर्थिक जनजीवन था। इसमें राजा-महाराजाओं के स्थान पर समाज के निचले और मध्यम वर्ग—जैसे मछली बेचती महिला, लोहार, बढ़ई, पालकी उठाते कहार, खेत जोतते किसान, और मदारी—को प्रमुखता दी गई।

  • कजली स्याही तकनीक (Kajli Seahi): यह इस शैली की सबसे अनूठी और विलक्षण विशेषता थी। चित्रकार बिना पेंसिल या चारकोल से प्रारंभिक खाका (Sketch) खींचे, सीधे तूलिका (Brush) से ही चित्र बनाते और रंग भरते थे। यह कलाकारों की अद्भुत हस्त-निपुणता और आत्मविश्वास का प्रमाण था।

  • पृष्ठभूमि का अभाव (Absence of Landscape): चित्रों में मुख्य विषय (Foreground) पर अत्यधिक ध्यान दिया गया, जबकि पृष्ठभूमि (Background) को प्रायः सादा या रिक्त रखा गया। इसका मुख्य कारण चित्रों को कम लागत और कम समय में तैयार कर ब्रिटिश खरीदारों (जिन्हें कम कीमत के स्मृति चिह्न चाहिए थे) को बेचना था।

  • रंग और कैनवास का संयोजन: चित्रकारों ने कृत्रिम रंगों के बजाय प्राकृतिक तत्वों से रंग बनाए, जैसे—लापीस लाजुली से नीला, कालिख से काला, और पलाश के फूलों से लाल। चित्रों के लिए हस्तनिर्मित कागज़, अभ्रक (Mica), और हाथीदांत (Ivory) का प्रयोग किया गया, जो इसकी सूक्ष्मता को बढ़ाते थे।

  • शारीरिक सौष्ठव का प्रादेशिक अंकन: चित्रों में आकृतियों की गहरी आंखें, भारी भौंहें, पतले चेहरे, बड़ी मूंछें और स्थानीय बिहारी परिधानों (जैसे धोती-कुर्ता और पगड़ी) का अत्यंत यथार्थवादी अंकन किया गया है।

  • पक्षी और पशु चित्रण: आम जनजीवन के साथ-साथ पशु-पक्षियों का चित्रण भी इसका अहम हिस्सा था। चित्रकार 'लोहा सिंह' पक्षियों के चित्रण में विशेष रूप से पारंगत थे।

पटना कलम की अन्य चित्रकला शैलियों से भिन्नता

पटना कलम अपनी समकालीन और पूर्ववर्ती कला शैलियों से विषय-वस्तु और तकनीकी, दोनों स्तरों पर स्पष्ट रूप से भिन्न थी:

1. मुगल चित्रकला से भिन्नता

  • विषय-वस्तु: मुगल चित्रकला पूर्णतः दरबारी और अभिजात्य थी, जिसमें युद्ध, शिकार, शाही दरबार और बादशाहों की भव्यता का चित्रण होता था। इसके विपरीत, पटना कलम लोक-केंद्रित थी, जो आम आदमी के संघर्ष और दिनचर्या को दर्शाती थी।

  • तकनीक: मुगल चित्रों में परिदृश्य (विशाल बाग-बगीचे) और सुनहरे रंगों का भारी उपयोग होता था, जबकि पटना कलम में पृष्ठभूमि को सादा रखा गया और रंगों का उपयोग अत्यंत सीमित व मितव्ययी था।

2. राजपूत और पहाड़ी चित्रकला से भिन्नता

  • धार्मिक बनाम धर्मनिरपेक्ष स्वरूप: राजपूत और कांगड़ा (पहाड़ी) शैलियों का मूल आधार धार्मिक और पौराणिक कथाएं (जैसे राधा-कृष्ण प्रेम, रामायण प्रसंग) थीं। पटना कलम पूर्णतः एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) और व्यावसायिक (Commercial) चित्रकला थी, जिसका उद्देश्य बाजार और यूरोपीय खरीदारों की मांग को पूरा करना था।

  • भावनात्मकता बनाम यथार्थवाद: पहाड़ी चित्रों में गहरी कल्पनाशीलता और भावनात्मकता (Romanticism) थी, जबकि पटना कलम एक 'डॉक्यूमेंट्री' की भांति उस दौर के समाज का सीधा, सटीक और यथार्थवादी (Realistic) दस्तावेजीकरण थी।

3. मधुबनी (मिथिला) चित्रकला से भिन्नता

  • उत्पत्ति और माध्यम: मधुबनी चित्रकला एक सामुदायिक लोक कला (Folk Art) है, जिसे मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों (भित्ति चित्र) और आंगनों (अरिपन) में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान बनाया जाता है। वहीं, पटना कलम एक पेशेवर कला (Professional Art) थी, जिसे मुख्य रूप से पुरुष चित्रकारों (जैसे- सेवक राम, शिवलाल, हुलास लाल) द्वारा कागज़ या अभ्रक पर व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उकेरा गया।

आगे की राह और निष्कर्ष

पटना कलम चित्रकला केवल बिहार की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय कलात्मक अस्मिता का एक गौरवशाली अध्याय है। यह भारतीय कला जगत में 'कलात्मक लोकतंत्र' के उदय का प्रतीक है, जिसने पहली बार हाशिए पर खड़े आम आदमी को कैनवास का नायक बनाया। यद्यपि 19वीं सदी के अंत में फोटोग्राफी के आगमन, लिथोग्राफी प्रेस की स्थापना और राजकीय संरक्षण के पूर्ण अभाव के कारण यह शैली (अंतिम चित्रकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा के साथ) विलुप्तप्राय हो गई, परंतु इसका ऐतिहासिक महत्त्व अक्षुण्ण है।

वर्तमान परिदृश्य में आवश्यकता इस बात की है कि बिहार सरकार, कला एवं संस्कृति विभाग और पटना संग्रहालय में संरक्षित इन दुर्लभ कलाकृतियों का व्यापक डिजिटल आर्काइव (Digital Archive) तैयार किया जाए। इसके अतिरिक्त, ललित कला अकादमियों के पाठ्यक्रमों में पटना कलम की 'कजली स्याही' जैसी लुप्तप्राय तकनीकों को पुनर्जीवित करने के संस्थागत प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि राज्य की यह अद्वितीय सांस्कृतिक धरोहर भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन कर सके और बिहार के 'सॉफ्ट पावर' को विश्व पटल पर पुनः स्थापित कर सके।

🛍️ ऑनलाइन शॉपिंग करें
Amazon, Flipkart, Myntra और AJIO पर खरीदारी करें
यहाँ से खरीदारी करने पे एक्स्ट्रा डिस्काउंट मिल सकता है।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1