मधुबनी चित्रकला की प्रमुख विशेषताओं और इसके वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालें।

Q. मधुबनी चित्रकला की प्रमुख विशेषताओं और इसके वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालें।

Ans - भारतीय सांस्कृतिक विरासत और लोक कला के पटल पर मधुबनी चित्रकला (मिथिला पेंटिंग) बिहार की एक अत्यंत गौरवशाली और जीवंत पहचान है। इसकी उत्पत्ति का ऐतिहासिक संदर्भ रामायण काल से जोड़ा जाता है, जब राजा जनक ने माता सीता के विवाह के अवसर पर मिथिलांचल के घरों को सजाने का आदेश दिया था। सदियों तक यह कला केवल मिथिला क्षेत्र (वर्तमान मधुबनी, दरभंगा, सहरसा आदि) की महिलाओं द्वारा अनुष्ठानिक तौर पर घरों की दीवारों (भित्ति चित्र) और आंगनों (अरिपन) तक सीमित रही। हालांकि, वर्तमान में इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है और यह बिहार की 'सॉफ्ट पावर' का एक सशक्त माध्यम बन चुकी है।

मधुबनी चित्रकला की प्रमुख विशेषताएं

मधुबनी चित्रकला अपने आध्यात्मिक भाव, यथार्थवाद के अभाव और विशिष्ट प्रतीकात्मकता के लिए जानी जाती है। इसकी प्रमुख तकनीकी और कलात्मक विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

1. विषय-वस्तु और प्रतीकात्मकता

  • धार्मिक और पौराणिक आख्यान: चित्रों का मुख्य विषय हिंदू देवी-देवताओं (राम-सीता, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, दुर्गा, काली) का जीवन और पौराणिक कथाएं होती हैं।

  • प्रकृति और तांत्रिक प्रभाव: प्रकृति के तत्वों (सूर्य, चंद्रमा, तुलसी का पौधा) का मानवीकरण किया जाता है। साथ ही, प्रजनन और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मछली, कछुआ, तोता, बांस और कमल का प्रचुर उपयोग होता है।

  • कोहबर (नूप्टियल चैंबर): नवविवाहित दंपत्ति के कक्ष में बनाए जाने वाले 'कोहबर' चित्र इस कला का सबसे पवित्र और जटिल स्वरूप हैं, जो वंश वृद्धि और वैवाहिक सुख का प्रतीक हैं।

2. विशिष्ट तकनीकी आयाम

  • स्थान शून्यता का भय (Horror Vacui): चित्र में कोई भी स्थान खाली नहीं छोड़ा जाता है। मुख्य आकृतियों के बीच के रिक्त स्थानों को ज्यामितीय आकारों, फूलों या पत्तियों से भर दिया जाता है।

  • द्वि-आयामी (2D) दृष्टिकोण: इसमें छायांकन (Shading) का पूर्णतः अभाव होता है। चित्रों में गहराई के बजाय चपटी (Flat) आकृतियां बनाई जाती हैं, जिनकी आंखें बड़ी और नाक नुकीली होती हैं।

  • दोहरी बाह्य रेखा (Double Outline): आकृतियों की रूपरेखा दोहरी लाइनों से खींची जाती है और उनके बीच के स्थान में बारीक रेखाएं या रंग भरे जाते हैं।

3. शैलियों का वर्गीकरण

ऐतिहासिक रूप से यह कला जातियों के आधार पर तीन मुख्य शैलियों में विभाजित थी, यद्यपि अब यह सीमाएं समाप्त हो चुकी हैं:

  • कचनी (रेखांकन): इसमें मुख्य रूप से बारीक रेखाओं का प्रयोग होता है और रंगों का उपयोग न्यूनतम (प्रायः लाल और काला) होता है। यह मूलतः कायस्थ महिलाओं की शैली थी।

  • भरनी (रंग भरना): इसमें आकृतियों में चटक और गहरे रंग भरे जाते हैं। यह मूलतः ब्राह्मण महिलाओं द्वारा अपनाई गई शैली थी।

  • गोदना और तांत्रिक शैली: यह दलित समुदाय (विशेषकर दुसाध महिलाओं) द्वारा विकसित शैली है, जिसमें राजा सलहेस की कथाओं और वृत्ताकार पैटर्न का उपयोग होता है।

4. प्राकृतिक रंगों और उपकरणों का प्रयोग

पारंपरिक रूप से इसमें कृत्रिम रंगों का निषेध था। काला रंग काजल या कालिख से, पीला रंग हल्दी व चूने से, लाल रंग पलाश के फूलों या कुमकुम से और हरा रंग सेम की पत्तियों से प्राप्त किया जाता था। तूलिका (Brush) के स्थान पर बांस की तीलियों, रुई, और उंगलियों का उपयोग किया जाता था।

मधुबनी चित्रकला का वर्तमान स्वरूप

1934 के विनाशकारी बिहार भूकंप के बाद ब्रिटिश अधिकारी विलियम जी. आर्चर द्वारा इस कला के प्रकटीकरण से लेकर आज तक, मधुबनी चित्रकला ने दीवारों से निकलकर वैश्विक कैनवास तक एक लंबी यात्रा तय की है। इसका वर्तमान स्वरूप बहुआयामी है:

1. वाणिज्यीकरण और माध्यम में परिवर्तन

1960 के दशक में बिहार में पड़े भीषण सूखे के दौरान पुपुल जयकर (अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड) की पहल पर महिलाओं ने वैकल्पिक आय के लिए इस कला को कागज़ और कैनवास पर उतारना शुरू किया। आज यह साड़ियों, दुपट्टों, डायरी के कवर, बैग्स और यहां तक कि कोविड काल में फेस मास्क पर भी उकेरी जा रही है, जो इसके व्यावसायिक अनुकूलन को दर्शाता है।

2. महिला सशक्तिकरण का आर्थिक अस्त्र

यह कला मिथिलांचल की ग्रामीण महिलाओं के लिए वित्तीय स्वतंत्रता का एक प्रमुख स्रोत बन गई है। पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज में इस कला ने महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान की है। पद्म श्री से सम्मानित सीता देवी, महासुंदरी देवी, बउआ देवी और हाल ही में दुलारी देवी (2021) ने इस कला के माध्यम से वैश्विक पटल पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है।

3. सार्वजनिक अवसंरचना और संस्थागत मान्यता

  • स्टेशन और ट्रेनों का सौंदर्यीकरण: मधुबनी रेलवे स्टेशन को स्थानीय कलाकारों (विशेषकर महिलाओं) द्वारा इस चित्रकला से सजाया गया, जिसे भारतीय रेलवे द्वारा देश के सबसे सुंदर स्टेशनों में से एक का पुरस्कार मिला। बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस और पटना के कई सरकारी भवनों की दीवारें इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

  • वैश्विक उपस्थिति: जापान के तोकामाची शहर में स्थित 'मिथिला म्यूजियम' में 15,000 से अधिक मधुबनी कलाकृतियां संरक्षित हैं, जो इसकी अंतरराष्ट्रीय अपील को प्रमाणित करता है।

4. समकालीन चुनौतियां

अपने विस्तार के बावजूद, वर्तमान स्वरूप कुछ चुनौतियों का सामना कर रहा है। समय और लागत बचाने के लिए प्राकृतिक रंगों का स्थान सिंथेटिक (एक्रिलिक) रंगों ने ले लिया है, जिससे कला की मूल आत्मा प्रभावित हो रही है। बिचौलियों के हस्तक्षेप के कारण वास्तविक महिला कारीगरों को उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। इसके अलावा, भौगोलिक संकेतक (GI) प्राप्त होने के बावजूद बड़े पैमाने पर इसका कॉपीराइट उल्लंघन (मशीनी प्रिंटिंग) हो रहा है।

आगे की राह और निष्कर्ष

मधुबनी चित्रकला केवल रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक चेतना और पारिस्थितिक दर्शन का सजीव प्रलेख है। इसके वर्तमान स्वरूप को संरक्षित और संवर्धित करने के लिए 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत इसे और अधिक संस्थागत समर्थन देने की आवश्यकता है।

बिहार सरकार और केंद्र सरकार को बिचौलियों की भूमिका समाप्त करने के लिए ONDC (Open Network for Digital Commerce) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से कारीगरों को सीधे वैश्विक बाजार (Direct-to-Market) से जोड़ना चाहिए। साथ ही, ललित कला अकादमियों में इसके पारंपरिक प्राकृतिक रंग निर्माण की तकनीक का प्रशिक्षण देकर इसकी 'विशिष्टता' को बचाया जा सकता है। इन प्रयासों से न केवल बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी, बल्कि भारत की यह अमूल्य धरोहर भविष्य की पीढ़ियों के लिए अपने मूल और जीवंत स्वरूप में अक्षुण्ण रहेगी।

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