भारत में प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के लाभ और उनसे जुड़े पर्यावरणीय विवादों का विश्लेषण करें।
Q. भारत में प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के लाभ और उनसे जुड़े पर्यावरणीय विवादों का विश्लेषण करें।
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भारत में बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ: लाभ, पर्यावरणीय विवाद एवं धारणीय विकास
भारत की भौगोलिक और जलवायुवीय विविधता के परिप्रेक्ष्य में जल संसाधनों का इष्टतम उपयोग राष्ट्रीय विकास की प्राथमिक आवश्यकता रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत, जल संचयन, सिंचाई, और ऊर्जा उत्पादन को एकीकृत रूप से साधने के लिए बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं (Multipurpose River Valley Projects) का श्रीगणेश किया गया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इनके दूरगामी सामाजिक-आर्थिक महत्व को रेखांकित करते हुए इन्हें "आधुनिक भारत के मंदिर" की संज्ञा दी थी। दामोदर घाटी निगम (DVC - 1948) से लेकर भाखड़ा-नांगल और हीराकुड तक, इन परियोजनाओं ने भारत के आधारभूत ढाँचे को नई दिशा प्रदान की है।
1. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के प्रमुख लाभ
इन परियोजनाओं की अभिकल्पना क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने और संसाधन प्रबंधन के एक समग्र टूल के रूप में की गई, जिसके बहुआयामी लाभ निम्नलिखित हैं:
सिंचाई क्षमता का विस्तार एवं खाद्य सुरक्षा: इन परियोजनाओं ने मानसून पर भारतीय कृषि की निर्भरता को कम किया है। पंजाब और हरियाणा में 'हरित क्रांति' की सफलता के पीछे भाखड़ा-नांगल परियोजना का महत्वपूर्ण योगदान रहा। बिहार के संदर्भ में, कोसी, गंडक और सोन नहर प्रणालियों ने उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी बिहार को राज्य का 'धान का कटोरा' बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
बाढ़ नियंत्रण एवं आपदा शमन: उफनती नदियों के जल को विशाल जलाशयों में रोककर निचले मैदानी इलाकों को विनाशकारी बाढ़ से बचाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से 'बंगाल का शोक' कही जाने वाली दामोदर नदी और 'बिहार का शोक' कहलाने वाली कोसी नदी के उग्र स्वरूप को इन परियोजनाओं के माध्यम से आंशिक रूप से नियंत्रित किया गया है।
जलविद्युत उत्पादन (स्वच्छ ऊर्जा): भारत के नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) लक्ष्यों में जलविद्युत की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। यह कोयला आधारित ताप विद्युत का एक स्वच्छ और सस्ता विकल्प है, जो कार्बन उत्सर्जन कम कर SDG 7 (Affordable and Clean Energy) की प्राप्ति में सहायक है।
मत्स्य पालन एवं अंतर्देशीय नौवहन: जलाशयों ने 'नीली क्रांति' (मत्स्य पालन) को बढ़ावा दिया है, साथ ही राष्ट्रीय जलमार्गों के विकास के लिए आवश्यक जलस्तर (Draft) बनाए रखने में मदद की है।
2. परियोजनाओं से जुड़े पर्यावरणीय एवं सामाजिक विवाद
विगत कुछ दशकों में बड़े बांधों की उपयोगिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगे हैं। यह माना जाने लगा है कि इन परियोजनाओं का आर्थिक लाभ इनकी भारी पर्यावरणीय और सामाजिक लागत की तुलना में कम है:
क. पारिस्थितिक असंतुलन एवं जैव-विविधता का ह्रास
विशाल जलाशयों के निर्माण से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों का डूब क्षेत्र (Submergence) में आना आम है।
बिहार का संदर्भ: नदियों पर बने बराज (Barrages) जलीय जीवों के प्राकृतिक प्रवास को रोकते हैं। कोसी और गंडक पर बने बराजों के कारण राष्ट्रीय जलीय जीव 'गंगा डॉल्फिन' (Platanista gangetica) और घड़ियालों के आवास विखंडित (Habitat fragmentation) हुए हैं।
ख. गाद जमाव (Siltation) और कृत्रिम बाढ़
हिमालयी नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में अवसाद (Silt) लाती हैं। बांधों के कारण यह गाद नदी के तल में जमा हो जाती है, जिससे नदी की जल-वहन क्षमता घट जाती है।
फरक्का बराज विवाद (बिहार का ज्वलंत मुद्दा): पश्चिम बंगाल में निर्मित फरक्का बराज के कारण गंगा नदी में सिल्टेशन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। इसके परिणामस्वरूप बैक-वाटर फ्लो (Backwater flow) होता है, जिससे पटना, भागलपुर और मुंगेर सहित बिहार के विशाल भूभाग में प्रतिवर्ष भयानक कृत्रिम बाढ़ आती है। बिहार सरकार लगातार राष्ट्रीय मंचों पर फरक्का बराज के कारण उत्पन्न इस आपदा का मुद्दा उठाती रही है।
ग. व्यापक विस्थापन और मानवाधिकार का प्रश्न
बड़ी परियोजनाओं ने लाखों लोगों, विशेषकर जनजातीय और हाशिए के समुदायों को उनकी जड़ों से विस्थापित किया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन (मेधा पाटकर के नेतृत्व में) और टिहरी बांध विरोधी आंदोलन ने विस्थापन और अपर्याप्त पुनर्वास नीति की विफलता को राष्ट्रीय पटल पर रखा।
विश्व बांध आयोग (World Commission on Dams) की रिपोर्ट के अनुसार, बड़े बांधों ने भारत में सामाजिक असमानता को गहरा किया है।
घ. भूकंपीय भेद्यता (Reservoir Induced Seismicity - RIS)
भूगर्भिक भ्रंश रेखाओं (Fault lines) के निकट विशाल जलराशि के भंडारण से कृत्रिम भूकंप का खतरा रहता है। 1967 का कोयना भूकंप (महाराष्ट्र) इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसने हिमालयी क्षेत्र (जैसे- टिहरी) में बनने वाले बांधों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं।
3. आगे की राह (Way Forward)
'विकास बनाम पर्यावरण' के इस द्वंद्व को सुलझाने के लिए नीतिगत और तकनीकी स्तर पर सुधार अपरिहार्य हैं:
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) का सुदृढ़ीकरण: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत EIA प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, जिसमें स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति (Public Hearing) अनिवार्य हो।
गाद प्रबंधन नीति (National Siltation Management Policy): बिहार की बाढ़ समस्या के स्थायी समाधान हेतु गंगा और उसकी सहायक नदियों की वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग (Dredging) के लिए एक राष्ट्रीय नीति का क्रियान्वयन नितांत आवश्यक है।
'रन-ऑफ-द-रिवर' (Run-of-the-river) परियोजनाओं को प्राथमिकता: विशाल जलाशयों के निर्माण के बजाय छोटी और 'रन-ऑफ-द-रिवर' परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिनका पर्यावरणीय प्रभाव नगण्य होता है।
एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन (IRBM): नदी जल विवादों (संविधान का अनुच्छेद 262) को सुलझाने और पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए नदी को एक 'जीवित इकाई' (Living Entity) मानकर उसके बेसिन का समग्र प्रबंधन किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ भारत की आर्थिक संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा के लिए अपरिहार्य रही हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में विकास की कीमत पारिस्थितिकी के विनाश से नहीं चुकाई जा सकती। आवश्यकता इस बात की है कि बड़े बांधों के निर्माण में आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) के बीच एक युक्तिसंगत संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि भावी पीढ़ियों के लिए सतत विकास (SDG 6 - Clean Water & Sanitation) सुनिश्चित किया जा सके।