भारतीय मानसून की उत्पत्ति के सिद्धांतों का वर्णन करें। 'अल नीनो' (El Nino) और 'ला नीना' भारतीय मानसून को कैसे प्रभावित करते हैं?
Q. भारतीय मानसून की उत्पत्ति के सिद्धांतों का वर्णन करें। 'अल नीनो' (El Nino) और 'ला नीना' भारतीय मानसून को कैसे प्रभावित करते हैं?
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भारतीय मानसून की उत्पत्ति और ENSO परिघटना: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि का मूल आधार दक्षिण-पश्चिम मानसून है। अरबी शब्द 'मौसम' (Mausim) से व्युत्पन्न, मानसून मूलतः हवाओं की दिशा में मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal of Winds) की प्रक्रिया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग 70-75% हिस्सा इसी मानसूनी प्रणाली से प्राप्त होता है। बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्य के लिए, जहाँ की बहुसंख्यक आबादी आजीविका के लिए वर्षा-पोषित कृषि पर निर्भर है, मानसून की सटीक समझ और इसका पूर्वानुमान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1. भारतीय मानसून की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत
मानसून की उत्पत्ति एक जटिल महासागरीय-वायुमंडलीय परिघटना (Ocean-Atmosphere Phenomenon) है। समय के साथ इसके अध्ययन में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं:
क. तापीय संकल्पना (Classical/Thermal Concept)
प्रतिपादक: एडमंड हेली (1686)।
क्रियाविधि: यह सिद्धांत थल और जल के असमान तापन (Differential Heating) पर आधारित है। ग्रीष्म ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप (विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत) अत्यधिक गर्म होकर एक निम्न वायुदाब (Low Pressure) का केंद्र बन जाता है।
प्रभाव: इसके विपरीत, हिंद महासागर में उच्च वायुदाब रहता है। हवाएं उच्च दाब से निम्न दाब की ओर (समुद्र से स्थल की ओर) चलने लगती हैं, जो नमी युक्त होने के कारण वर्षा कराती हैं।
ख. गतिक संकल्पना (Dynamic Concept)
प्रतिपादक: हर्मन फ्लोन (H. Flohn)।
क्रियाविधि: यह सिद्धांत अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) के खिसकाव पर आधारित है। ITCZ विषुवत रेखा के पास एक निम्न वायुदाब का क्षेत्र है, जहाँ व्यापारिक पवनें मिलती हैं।
प्रभाव: सूर्य के उत्तरायण (Summer Solstice) होने पर ITCZ उत्तर की ओर खिसक कर गंगा के मैदानों (लगभग 20°-25° उत्तरी अक्षांश) पर स्थापित हो जाता है (इसे मानसून गर्त या Monsoon Trough भी कहते हैं)। यह दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनों को भूमध्य रेखा पार करने के लिए आकर्षित करता है, जो कोरिओलिस बल (Coriolis Force) के कारण दक्षिण-पश्चिम दिशा ग्रहण कर लेती हैं।
ग. जेट स्ट्रीम सिद्धांत (Jet Stream Theory)
प्रतिपादक: पी. कोटेस्वरम और एम. टी. यिन (1950-60 का दशक)।
क्रियाविधि: यह आधुनिक सिद्धांत ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण पर जोर देता है। ग्रीष्म ऋतु में तिब्बत के पठार का अत्यधिक तापन होता है, जिससे यह एक 'हीट सोर्स' के रूप में कार्य करता है।
प्रभाव: इसके परिणामस्वरूप उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet - TEJ) की उत्पत्ति होती है, जो मेडागास्कर के पास मास्करेन हाई (Mascarene High) को मजबूत करती है। मजबूत मास्करेन हाई से भारत की ओर आने वाली मानसूनी पवनों को तीव्र गति मिलती है। वहीं, उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (STWJ) का हिमालय के उत्तर की ओर विस्थापन मानसून के प्रस्फोट (Burst of Monsoon) के लिए मार्ग प्रशस्त करता है।
2. 'अल नीनो' और 'ला नीना' का भारतीय मानसून पर प्रभाव
मानसून केवल क्षेत्रीय कारकों पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह प्रशांत महासागर में होने वाले तापीय और वायुमंडलीय परिवर्तनों, जिसे ENSO (El Nino Southern Oscillation) कहा जाता है, से गहराई से जुड़ा हुआ है।
क. अल नीनो (El Niño) और भारतीय मानसून
परिभाषा: यह एक उष्ण महासागरीय जलधारा है जो क्रिसमस के समय पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू के तट पर उत्पन्न होती है। यह ENSO का 'गर्म चरण' है।
क्रियाविधि: इसके कारण पेरू तट का तापमान सामान्य से 2-3°C बढ़ जाता है, जिससे प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाला वाकर परिसंचरण (Walker Circulation) कमजोर या उलट जाता है।
भारत और बिहार पर प्रभाव:
वाकर परिसंचरण के कमजोर होने से हिंद महासागर और इंडोनेशियाई क्षेत्र में उच्च दाब की स्थिति बन जाती है, जिससे भारत की ओर आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
इसके परिणामस्वरूप भारत में वर्षा में कमी (Deficit Rainfall) और सूखे (Drought) की स्थिति उत्पन्न होती है।
बिहार के संदर्भ में: अल नीनो के वर्षों में दक्षिण बिहार (गया, नवादा, औरंगाबाद) में भयंकर सूखा पड़ता है। राज्य में धान की रोपाई पिछड़ जाती है और कृषि GSDP में भारी गिरावट दर्ज की जाती है, जैसा कि हाल के वर्षों में कई बार देखा गया है।
ख. ला नीना (La Niña) और भारतीय मानसून
परिभाषा: यह अल नीनो की विपरीत स्थिति है, जिसमें पेरू के तट का जल सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। यह ENSO का 'शीत चरण' है।
क्रियाविधि: इस स्थिति में वाकर परिसंचरण अत्यधिक मजबूत हो जाता है। पश्चिमी प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के ऊपर एक प्रबल निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है।
भारत और बिहार पर प्रभाव:
हिंद महासागर में मास्करेन हाई के मजबूत होने से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर नमी युक्त पवनें तेजी से प्रवाहित होती हैं।
इसके परिणामस्वरूप भारत में सामान्य से अधिक वर्षा (Surplus Rainfall) होती है।
बिहार के संदर्भ में: ला नीना वर्षों में उत्तर बिहार (कोसी, गंडक, बागमती बेसिन) में जलभराव और भयंकर बाढ़ (Devastating Floods) का खतरा बढ़ जाता है। नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होने से बिहार की नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे जान-माल और कृषि का व्यापक नुकसान होता है।
आगे की राह (Way Forward)
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण ENSO परिघटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है, जिससे भारतीय मानसून अधिक अनिश्चित (Erratic) हो गया है। इसके प्रभावी प्रबंधन हेतु निम्नलिखित रणनीतिक कदम आवश्यक हैं:
सटीक पूर्वानुमान प्रणाली: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के 'मानसून मिशन' और सुपरकंप्यूटिंग सुविधाओं (जैसे- प्रत्यूष और मिहिर) का इष्टतम उपयोग कर ब्लॉक-स्तरीय मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए।
जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture): बिहार जैसे राज्यों में कृषि विभाग को फसल विविधीकरण (Crop Diversification), कम पानी में तैयार होने वाले मोटे अनाजों (Millets) को बढ़ावा देने और सूखे व बाढ़-सहिष्णु बीजों (जैसे- Swarna Sub-1) के प्रयोग पर बल देना चाहिए।
पारंपरिक जल प्रबंधन: राज्य सरकार की 'जल-जीवन-हरियाली' जैसी योजनाएं, जो ऐतिहासिक 'आहर-पाइन' प्रणाली के जीर्णोद्धार और वर्षा जल संचयन पर केंद्रित हैं, मानसून की अनिश्चितता से निपटने में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं।
भारतीय मानसून की जटिल वैज्ञानिक समझ को प्रशासनिक नीतियों और जमीनी स्तर के कृषि-हस्तक्षेपों के साथ एकीकृत करके ही हम राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 2: Zero Hunger और SDG 13: Climate Action) को सुनिश्चित कर सकते हैं।