बिहार में बाढ़ (Floods) और सूखे (Drought) की जुड़वां समस्या के कारणों और इसके वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रबंधन पर चर्चा करें।
Q. बिहार में बाढ़ (Floods) और सूखे (Drought) की जुड़वां समस्या के कारणों और इसके वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रबंधन पर चर्चा करें।
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बिहार में बाढ़ और सूखा: दोहरी विभीषिका, कारण एवं वैज्ञानिक-तकनीकी प्रबंधन
बिहार की भौगोलिक अवस्थिति इसे एक साथ दो विपरीत प्राकृतिक आपदाओं—उत्तर बिहार में विनाशकारी बाढ़ और दक्षिण बिहार में भीषण सूखे—का केंद्र बनाती है। राज्य का लगभग 73.06% भौगोलिक क्षेत्रफल बाढ़ प्रवण (Flood-prone) है (देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का लगभग 16.5%), जबकि दक्षिण बिहार के गया, नवादा, औरंगाबाद, जमुई और बांका जैसे जिले मानसूनी अनिश्चितता के कारण बारंबार सूखे की चपेट में आते हैं। यह जुड़वां संकट न केवल राज्य की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था (GSDP) को आघात पहुँचाता है, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs 1, 2 और 13) की प्राप्ति में भी बड़ी बाधा है।
1. बाढ़ एवं सूखे के प्रमुख कारण
क. उत्तर बिहार में बाढ़ के कारण
हिमालयी अपवाह तंत्र एवं अत्यधिक जलप्रवाह: गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला-बलान और कोसी जैसी नदियाँ नेपाल के उच्च हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों से निकलती हैं। मानसून के दौरान इन नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ने से तीव्र बाढ़ आती है।
गाद जमाव (Siltation) एवं नदी तल का उथला होना: हिमालय से तीव्र ढाल से उतरने वाली नदियाँ भारी मात्रा में गाद और अवसाद लाती हैं। मैदानी भाग में ढाल मंद होने से यह गाद नदी तल पर जमा हो जाती है, जिससे जल वहन क्षमता कम हो जाती है।
मार्ग परिवर्तन की प्रवृत्ति: कोसी नदी (बिहार का शोक) ने पिछले 250 वर्षों में 120 किमी से अधिक पश्चिम की ओर विस्थापन किया है। नदी का यह दोलनकारी व्यवहार (Avulsion) विशाल भूभाग को जलमग्न करता है।
तटबंधों का अनियोजित विस्तार: तटबंधों के टूटने (Embankment Breaches) से आकस्मिक बाढ़ आती है, तथा तटबंधों के बाहर का पानी 'चौर' और 'मन' (आर्द्रभूमियों) में लंबे समय तक जमा रहता है (Waterlogging)।
ख. दक्षिण बिहार में सूखे के कारण
कठोर भू-गर्भिक संरचना एवं सीमित भूजल पुनर्भरण: दक्षिण बिहार का दक्षिणी भाग छोटानागपुर पठार के सीमांत क्षेत्रों (कठोर क्रिस्टलीय चट्टानों) से जुड़ा है, जहाँ प्राकृतिक जल संचयन और पुनर्भरण (Aquifer Recharge) अत्यंत सीमित है।
गैर-सदावाहिनी (वर्षा-पोषित) नदियाँ: सोन, पुनपुन, फल्गु, किऊल और कर्मनाशा जैसी नदियाँ वर्षा पर निर्भर हैं। मानसून बीतते ही ये नदियाँ लगभग सूख जाती हैं।
मानसूनी विसंगतियाँ एवं वर्षा की कमी: दक्षिण-पश्चिम मानसून की शाखा का यहाँ अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है। वर्षा के दिनों (Rainy Days) की संख्या में कमी और लंबी शुष्क अवधि (Dry Spells) सूखे को जन्म देती है।
पारंपरिक जल संरचनाओं की उपेक्षा: ऐतिहासिक 'आहर-पाइन' प्रणाली (पारंपरिक जल संचयन एवं सिंचाई प्रणाली) के अतिक्रमण और रख-रखाव के अभाव ने दक्षिण बिहार की जल सुरक्षा को कमजोर किया है।
2. वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रबंधन (Scientific & Technological Management)
बाढ़ और सूखे के इस चक्र को तोड़ने के लिए परंपरागत दृष्टिकोण से इतर आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी-आधारित हस्तक्षेप आवश्यक हैं:
| आयाम | तकनीकी उपकरण / पहल | प्रशासनिक एवं व्यावहारिक अनुप्रयोग |
| भू-स्थानिक निगरानी (Geospatial) | रिमोट सेंसिंग (RS) एवं GIS मैपिंग | बाढ़ जलभराव क्षेत्रों, फसल क्षति आकलन और सूखे के समय मिट्टी की नमी (Soil Moisture Index) का रियल-टाइम मानचित्रण। |
| प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली | टेलीमेट्री एवं ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (AWS) | नेपाल सीमा और नदी बेसिनों पर सेंसर आधारित हाइड्रो-मेटियोरोलॉजिकल नेटवर्क द्वारा 72 घंटे पूर्व जलस्तर व वर्षा का सटीक पूर्वानुमान। |
| सूचना प्रौद्योगिकी | 'दृष्टि' (DRISTI) पोर्टल एवं बेकन (BEACON) प्रणाली | जल संसाधन विभाग, बिहार द्वारा तटबंधों की स्थिति की निगरानी और बाढ़ प्रबंधन सूचना प्रणाली (FMIS) का संचालन। |
| जल अधिशेष का अंतरण | गंगा जल आपूर्ति योजना (Ganga Water Lift) | मानसून के दौरान गंगा के अधिशेष जल को पाइपलाइन द्वारा सूखाग्रस्त शहरों (राजगीर, गया, बोधगया, नवादा) तक ले जाना। |
3. बहुआयामी प्रबंधन रणनीतियाँ
क. नदी बेसिन प्रबंधन एवं संरचनात्मक समाधान
नदी जोड़ो परियोजनाएँ (ILR): कोसी-मेची अंतर-राज्यीय लिंक परियोजना बाढ़ के अधिशेष जल को महानंदा बेसिन की ओर मोड़कर सीमांचल क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ सिंचाई क्षमता में वृद्धि करेगी।
वैज्ञानिक गाद प्रबंधन (Scientific Dredging): राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति के अनुरूप नदियों के तल की वैज्ञानिक रूप से डी-सिल्टिंग कर उनकी जल निकासी क्षमता को पुनर्स्थापित करना।
ख. जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture)
तनाव-सहिष्णु फसल किस्मों का विकास:
बाढ़ प्रवण क्षेत्रों हेतु: जलमग्नता सहन करने वाली धान की किस्में (जैसे—Swarna Sub-1, जलमग्न)।
सूखा प्रवण क्षेत्रों हेतु: कम अवधि और कम पानी वाली फसलें (जैसे—सहभागी धान, श्री विधि/DSR, मोटे अनाज/मिलेट्स और दलहन)।
माइक्रो-इरिगेशन एवं सटीक कृषि: 'हर खेत तक पानी' और 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान के अंतर्गत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना ताकि जल उपयोग दक्षता (WUE) में 40-50% का सुधार हो सके।
ग. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं बिग डेटा एनालिटिक्स
हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग: मशीन लर्निंग (ML) मॉडल का उपयोग कर वर्षा-अपवाह (Rainfall-Runoff) का सिमुलेशन तैयार करना, जिससे जलद्वार (Sluice Gates) के संचालन को अनुकूलित किया जा सके।
इंद्रवज्र एवं मौसम मोबाइल ऐप: किसानों को ब्लॉक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान और कृषि-परामर्श (Agro-advisory) का समय पर संप्रेषण।
आगे की राह (Way Forward)
सेंदाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework 2015–2030): आपदा प्रतिक्रिया (Disaster Response) के स्थान पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction - DRR) और लचीले बुनियादी ढाँचे (Resilient Infrastructure) के निर्माण पर बल देना।
अंतरराष्ट्रीय जल कूटनीति (India-Nepal Co-operation): नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों (सप्तकोशी उच्च बांध परियोजना आदि) में संयुक्त जल-मौसम विज्ञान केंद्रों और बहुउद्देशीय जलाशयों के निर्माण हेतु द्विपक्षीय वार्ताओं को गति देना।
पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान का संगम: 'आहर-पाइन' जैसी पारंपरिक जल-संरचनाओं का जीर्णोद्धार करते हुए उन्हें आधुनिक उपग्रह आधारित जल लेखांकन (Water Accounting) प्रणाली से जोड़ना।
बाढ़ और सूखे की समस्या को अलग-अलग देखने के बजाय 'एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन' (IWRM) के तहत एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में प्रबंधित करना होगा। अधिशेष जल का वैज्ञानिक भंडारण और वितरण ही बिहार को आपदा-पीड़ित राज्य से जल-सुरक्षित व आर्थिक रूप से समृद्ध राज्य में रूपांतरित कर सकता है।