बिहार की भौगोलिक संरचना का विवरण दें। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के भू-आकृतिक विभाजन को स्पष्ट करें।
Q. बिहार की भौगोलिक संरचना का विवरण दें। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार के भू-आकृतिक विभाजन को स्पष्ट करें।
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भूमिका
भारत के पूर्वी भाग में स्थित बिहार भूवैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टिकोण से एक 'संक्रमणकालीन क्षेत्र' (Transitional Zone) है, जो उत्तर में नवीन वलित हिमालय पर्वतमाला और दक्षिण में प्राचीन गोंडवानालैंड (प्रायद्वीपीय पठार) के मध्य अवस्थित है। इसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर है, जो अक्षांशीय (24°20'10" से 27°31'15" उत्तरी) और देशांतरीय (83°19'50" से 88°17'40" पूर्वी) विस्तार के साथ एक पूर्णतः भू-आबद्ध (Landlocked) राज्य है।
बिहार की वर्तमान स्थलाकृति सुदीर्घ भूवैज्ञानिक कालों में हुई विवर्तनिक (Tectonic) गतिविधियों और हिमालयी तथा प्रायद्वीपीय नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण (Deposition) का परिणाम है। यह भौगोलिक विविधता ही पटना और बिहार के सभी जिलों की कृषि-जलवायु, अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकीय बसावट का मुख्य निर्धारक तत्व है।
बिहार की भौगोलिक संरचना का सामान्य विवरण
भू-आकृतिक (Geomorphological) विशेषताओं के आधार पर बिहार को मुख्य रूप से तीन वृहद भौगोलिक इकाइयों में विभाजित किया जाता है:
उत्तर-पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र (शिवालिक श्रेणी): पश्चिमी चंपारण जिले के उत्तरी भाग में स्थित यह हिमालय का तृतीयक (Tertiary) विस्तार है, जिसमें सोमेश्वर श्रेणी, रामनगर दून और दून घाटी शामिल हैं।
बिहार का विशाल जलोढ़ मैदान: यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 96% (90,650 वर्ग किमी) है। इसका निर्माण गंगा और उसकी सहायक नदियों के अवसादों से हुआ है।
दक्षिणी संकीर्ण पठारी क्षेत्र: यह विंध्य (कैमूर, रोहतास) और धारवाड़ क्रम (मुंगेर, जमुई, बांका) की प्राचीन चट्टानों से निर्मित है, जो छोटानागपुर पठार का उत्तरी सीमांत है।
उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार का भू-आकृतिक विभाजन
गंगा नदी राज्य को पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए दो असमान मैदानी भागों में विभक्त करती है। इन दोनों मैदानों की ढाल, मृदा संरचना और जल-प्रवाह प्रणाली में स्पष्ट भिन्नता है:
1. उत्तर बिहार का मैदान (North Bihar Plain)
गंगा नदी के उत्तर से लेकर नेपाल सीमा (तराई) तक विस्तृत यह मैदान पूर्णतः हिमालयी नदियों (गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, बागमती, कमला, महानंदा) के निक्षेपण का प्रतिफल है। इसका ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ:
भाभर एवं तराई क्षेत्र (Bhabhar & Terai): नेपाल सीमा के समानांतर (पश्चिमी चंपारण से किशनगंज तक) कंकड़-पत्थर और दलदली भूमि की एक संकीर्ण पट्टी है, जहाँ सघन वन और अधिक वर्षा पाई जाती है।
खादर और दियारा भूमि (Khadar & Diara): यह नवीन जलोढ़ (New Alluvium) मृदा का क्षेत्र है, जिसका प्रतिवर्ष बाढ़ के पानी से नवीनीकरण होता है। नदियों के मध्य स्थित रेत के टीलों और उच्च भूमियों को 'दियारा' कहा जाता है।
चौर और मन (Chaurs and Mauns): हिमालयी नदियाँ विसर्पण (Meandering) के कारण अपना मार्ग बदलती रहती हैं, जिससे अत्यधिक संख्या में गोखुर झीलों (Ox-bow lakes) का निर्माण हुआ है। जलमग्न निम्न भूमि को 'चौर' और गहरे जल वाले क्षेत्रों को 'मन' कहा जाता है (जैसे- कावर झील, बेगूसराय)।
प्रभाव एवं चुनौतियाँ: यह क्षेत्र हिमालयी नदियों के अत्यधिक गाद (Silt) और तीव्र प्रवाह के कारण प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ के प्रति संवेदनशील है। विशेषकर 'कोसी' नदी को अपनी मार्ग परिवर्तन की प्रवृत्ति के कारण 'बिहार का शोक' कहा जाता है।
2. दक्षिण बिहार का मैदान (South Bihar Plain)
यह मैदान गंगा नदी के दक्षिणी तट से लेकर छोटानागपुर पठार की उत्तरी सीमा तक विस्तृत है। इसका निर्माण प्रायद्वीपीय भारत से आने वाली नदियों (सोन, पुनपुन, फल्गू, कर्मनाशा, क्यूल) के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान उत्तर बिहार की तुलना में अधिक चौड़ा (पश्चिम में) और शुष्क है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ:
टाल क्षेत्र (Tal Region): गंगा के दक्षिणी तटबंध के समानांतर बक्सर से लेकर भागलपुर (कहलगाँव) तक 8-10 किमी चौड़ी एक निम्न भूमि की पट्टी है। मानसून के दौरान दक्षिणी नदियों का जल गंगा में प्रवेश न कर पाने के कारण यह क्षेत्र जलमग्न हो जाता है (जैसे- मोकामा टाल)। जल सूखने पर यह रबी (विशेषकर दलहन) की खेती के लिए विश्व का सबसे उपजाऊ क्षेत्र बन जाता है।
करैल-केवाल मृदा (Karkal-Kewal Soil): यह पुरानी जलोढ़ (Bangar) मृदा का क्षेत्र है, जिसकी जल-धारण क्षमता अत्यधिक होती है। यह धान और गेहूं के उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है।
एकाकी/अवशिष्ट पहाड़ियाँ (Residual Hills): मैदानी क्षेत्र की एकरूपता को भंग करते हुए इस भाग में यत्र-तत्र प्राचीन चट्टानों की एकाकी पहाड़ियाँ पाई जाती हैं। इनमें राजगीर, गिरियक, बराबर (जहानाबाद), और खड़गपुर (मुंगेर) की पहाड़ियाँ प्रमुख हैं, जो भूवैज्ञानिक रूप से धारवाड़ क्रम की हैं।
प्रभाव एवं चुनौतियाँ: दक्षिण बिहार की नदियाँ वर्षा-पोषित होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में सूख जाती हैं, जिससे यह क्षेत्र सूखे (Drought) के प्रति अधिक संवेदनशील रहता है। यद्यपि सोन नहर प्रणाली ने दक्षिण-पश्चिम बिहार को राज्य का 'धान का कटोरा' (Rice Bowl) बना दिया है।
निष्कर्ष
बिहार की भू-आकृतिक संरचना एक विरोधाभास प्रस्तुत करती है—जहाँ उत्तर बिहार प्रतिवर्ष हिमालयी नदियों की बाढ़ से जूझता है, वहीं दक्षिण बिहार मानसून की अनिश्चितता के कारण सूखे का सामना करता है। इसके बावजूद, यह भू-संरचना अपनी उपजाऊ मृदा के कारण राज्य की 75% से अधिक कृषि-आश्रित आबादी को आजीविका प्रदान करती है।
आगे की राह (Way Forward): राज्य के समग्र आर्थिक विकास के लिए इस भौगोलिक विषमता को अवसर में बदलना होगा। उत्तर बिहार की अधिशेष (Surplus) जल संपदा को दक्षिण बिहार के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानांतरित करने हेतु 'कोसी-मेची नदी जोड़ो परियोजना' और 'जल-जीवन-हरियाली' अभियान जैसे कदम अत्यंत तार्किक हैं। यदि पटना और बिहार के सभी जिलों में वहाँ की विशिष्ट भू-आकृतिक और कृषि-जलवायु (Agro-Climatic Zones) परिस्थितियों के अनुरूप 'क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर' (Climate Resilient Agriculture) तथा खाद्य प्रसंस्करण अवसंरचना का विकास किया जाए, तो बिहार की यह भौगोलिक संरचना उसके स्थायी आर्थिक उत्कर्ष का सबसे बड़ा आधार बन सकती है।