शॉर्ट नोट्सः क्लाउड कंप्यूटिंग।
Q. शॉर्ट नोट्सः क्लाउड कंप्यूटिंग।
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भूमिका
क्लाउड कंप्यूटिंग (Cloud Computing) सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के क्षेत्र में एक ऐसा आधुनिक प्रतिमान है, जो इंटरनेट के माध्यम से ऑन-डिमांड कंप्यूटिंग सेवाएँ—जैसे डेटा स्टोरेज, सर्वर, डेटाबेस, नेटवर्किंग, एनालिटिक्स और सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग—उपलब्ध कराता है। इसमें उपयोगकर्ताओं या संस्थाओं को महंगे स्थानीय भौतिक सर्वर (On-premise infrastructure) स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे 'पे-एज़-यू-गो' (Pay-as-you-go) मॉडल पर आवश्यकतानुसार संसाधनों का उपभोग करते हैं।
भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा प्रारंभ की गई 'मेघराज' (GI Cloud - Government of India Cloud) पहल ने डिजिटल इंडिया के तहत ई-गवर्नेंस, पारदर्शी नीति-निर्माण और त्वरित सार्वजनिक सेवा वितरण की गति को अभूतपूर्व रूप से तीव्र किया है।
क्लाउड कंप्यूटिंग के प्रमुख सेवा मॉडल एवं प्रकार
क्लाउड कंप्यूटिंग का तकनीकी ढांचा मुख्य रूप से तीन सेवा मॉडलों और विभिन्न परिनियोजन (Deployment) स्वरूपों पर आधारित है:
1. प्रमुख सेवा मॉडल (Service Models)
इन्फ्रास्ट्रक्चर एज़ अ सर्विस (IaaS): इसके अंतर्गत बुनियादी कंप्यूटिंग ढांचा—जैसे वर्चुअल सर्वर, स्टोरेज और नेटवर्किंग—किराए पर प्रदान किया जाता है (उदा. Amazon Web Services - AWS, Microsoft Azure)।
प्लेटफॉर्म एज़ अ सर्विस (PaaS): यह सॉफ्टवेयर डेवलपर्स को बिना हार्डवेयर प्रबंधन की चिंता किए एप्लिकेशन बनाने, परीक्षण करने और तैनात करने हेतु एक सुरक्षित वातावरण (Runtime environment) उपलब्ध कराता है।
सॉफ्टवेयर एज़ अ सर्विस (SaaS): इसके तहत उपयोगकर्ता इंटरनेट ब्राउज़र के माध्यम से सीधे अंतिम सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन का उपयोग करते हैं (उदा. Google Workspace, DigiLocker)।
2. परिनियोजन मॉडल (Deployment Models)
पब्लिक, प्राइवेट एवं हाइब्रिड क्लाउड: सार्वजनिक क्लाउड लागत प्रभावी होते हैं, जबकि प्राइवेट क्लाउड अत्यधिक संवेदनशील डेटा के लिए समर्पित होते हैं। वर्तमान में सुरक्षा और लागत के संतुलन हेतु हाइब्रिड क्लाउड (Hybrid Cloud) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
प्रशासनिक एवं आर्थिक उपयोगिता तथा बहुआयामी प्रभाव
क्लाउड तकनीक शासन-प्रशासन और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन ला रही है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं में विश्लेषित किया जा सकता है:
1. ई-गवर्नेंस और निर्बाध लोक सेवा वितरण
मापनीयता (Scalability) और उच्च उपलब्धता: कोविड-19 महामारी के दौरान CoWIN प्लेटफॉर्म अथवा डिजिटल लॉकर (DigiLocker) पर करोड़ों नागरिकों का एक साथ पंजीकरण क्लाउड के 'इलास्टिक स्केलिंग' के कारण ही संभव हो सका।
वित्तीय दक्षता: पारंपरिक डेटा केंद्रों के निर्माण में लगने वाले भारी पूंजीगत व्यय (CAPEX) को परिचालन व्यय (OPEX) में बदलकर सार्वजनिक धन की बचत करना।
2. आपदा प्रबंधन और डेटा सुरक्षा
भौगोलिक रूप से वितरित बैकअप सर्वरों के कारण प्राकृतिक या मानव-जनित आपदाओं की स्थिति में डेटा के नष्ट होने का जोखिम न्यूनतम रहता है और बिजनेस कंटीन्यूइटी (Business Continuity) सुनिश्चित होती है।
3. बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता एवं अनुप्रयोग
बिहार स्टेट डेटा सेंटर (BSDC) का सुदृढ़ीकरण: राज्य सरकार द्वारा 'मेघराज' और स्टेट डेटा सेंटर के माध्यम से विभिन्न विभागों के डेटा को एकीकृत किया गया है।
लोक सेवाओं का डिजिटलीकरण: 'बिहार लोक सेवा अधिकार अधिनियम' (RTPS), भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण (ई-निबंधन), और 'सुविधा ऐप' जैसी नागरिक-केंद्रित सेवाएँ क्लाउड सर्वरों पर संचालित होने के कारण अत्यधिक त्वरित और पारदर्शी बनी हैं।
प्रशासनिक दक्षता: राज्य सचिवालय से लेकर पटना और बिहार के सभी जिलों के प्रखंड व अंचल कार्यालयों तक ई-ऑफिस (e-Office) प्रणाली का सफल क्रियान्वयन क्लाउड अवसंरचना पर ही आधारित है, जिसने फाइलों के निस्तारण में लगने वाले समय को काफी कम किया है।
क्लाउड कंप्यूटिंग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
डेटा संप्रभुता और सुरक्षा (Data Sovereignty & Cybersecurity): अधिकांश प्रमुख क्लाउड सेवा प्रदाता विदेशी कंपनियाँ हैं, जिससे संवेदनशील राष्ट्रीय और नागरिक डेटा के सीमा-पार प्रवाह तथा रैंसमवेयर/मैलवेयर हमलों का खतरा बना रहता है।
डिजिटल डिवाइड और नेटवर्क निर्भरता: क्लाउड सेवाओं का निर्बाध उपयोग उच्च-गति इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर करता है। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचनात्मक सीमाओं के कारण सेवा वितरण में व्यवधान आता है।
वेंडर लॉक-इन (Vendor Lock-in): मालिकाना (Proprietary) प्रारूपों के कारण एक सेवा प्रदाता से दूसरे पर डेटा और एप्लिकेशन को स्थानांतरित करना तकनीकी और आर्थिक रूप से अत्यधिक जटिल होता है।
आगे की राह (Way Forward)
डेटा संरक्षण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) के प्रावधानों के अनुरूप भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर 'स्थानीय डेटा केंद्र' (Edge Data Centers) स्थापित करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
ओपन-सोर्स और इंटरऑपरेबिलिटी: सरकारी क्लाउड आर्किटेक्चर में ओपन-सोर्स मानकों को अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी एक निजी वेंडर पर निर्भरता समाप्त हो सके।
अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी: 'भारतनेट' (BharatNet) परियोजना के त्वरित क्रियान्वयन के माध्यम से ग्राम पंचायत स्तर तक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क की पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे क्लाउड-आधारित सेवाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
निष्कर्ष
क्लाउड कंप्यूटिंग समकालीन डिजिटल अर्थव्यवस्था और ई-गवर्नेंस की एक अनिवार्य रीढ़ है। यह 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' के सिद्धांत को मूर्त रूप देते हुए सार्वजनिक सेवाओं को समावेशी, दक्ष और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने का सामर्थ्य रखती है। यदि डेटा सुरक्षा और साइबर संप्रभुता से जुड़ी चुनौतियों का एक मजबूत विधिक व तकनीकी तंत्र के माध्यम से समाधान कर लिया जाए, तो क्लाउड अवसंरचना भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने तथा बिहार जैसे राज्यों में प्रशासनिक दक्षता व समावेशी विकास को गति देने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।