आपदा प्रबंधन (विशेषकर बिहार में बाढ़ और भूकंप) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका का मूल्यांकन करें।

 Q. आपदा प्रबंधन (विशेषकर बिहार में बाढ़ और भूकंप) में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका का मूल्यांकन करें।

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आपदा प्रबंधन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका: बिहार (बाढ़ और भूकंप) के विशेष संदर्भ में

भूमिका

आपदा प्रबंधन एक बहुआयामी और एकीकृत प्रक्रिया है जिसमें आपदाओं की रोकथाम, शमन (Mitigation), तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्वास शामिल है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और वैश्विक सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework for DRR 2015-2030) के तहत 'प्रौद्योगिकी-संचालित जोखिम न्यूनीकरण' को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। बिहार देश के सबसे संवेदनशील बहु-आपदा प्रवण (Multi-hazard prone) राज्यों में से एक है; जहाँ उत्तर बिहार की 73% भौगोलिक सीमा अत्यधिक बाढ़-प्रवण है, वहीं संपूर्ण राज्य भूकंपीय ज़ोन IV और V (उच्च जोखिम) के अंतर्गत आता है। इस जटिल भौगोलिक परिदृश्य में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी (S&T) केवल एक निवारक उपकरण नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और संपदा की रक्षा के लिए एक रणनीतिक ढाल है।

बाढ़ प्रबंधन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग

बिहार में कोसी, गंडक, बागमती और कमला जैसी हिमालयी नदियों के कारण प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ के प्रबंधन में तकनीकी नवाचारों ने 'प्रतिक्रियात्मक' (Reactive) दृष्टिकोण को 'पूर्वानुमानित' (Predictive) बना दिया है:

  • पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी (Early Warning Systems): भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा स्थापित डॉप्लर वेदर रडार (Doppler Weather Radars - DWR) सटीक और स्थानीयकृत वर्षा का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, 'इंद्रवज्र' (Indravajra) ऐप के माध्यम से ठनका (आकाशीय बिजली) गिरने की 40-45 मिनट पूर्व चेतावनी सीधे किसानों और आम नागरिकों तक पहुँचाई जा रही है।

  • फ्लड मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (FMIS): बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग द्वारा विकसित यह प्रणाली रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing) और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) का उपयोग करती है। यह नदियों के जलस्तर और तटबंधों की स्थिति की वास्तविक समय (Real-time) निगरानी कर संभावित जल-प्लावन (Inundation) क्षेत्रों का सटीक मानचित्रण करती है।

  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (Space Technology) का उपयोग: बाढ़ के दौरान विस्तृत भू-भाग का आकलन करने के लिए ISRO के रडार इमेजिंग सैटेलाइट (RISAT) और 'भुवन' (Bhuvan) पोर्टल का उपयोग किया जाता है। घने बादलों के बावजूद रडार इमेजरी बाढ़ से हुए नुकसान (फसल और बुनियादी ढांचा) का सटीक डेटा प्रदान करती है, जिससे त्वरित राहत वितरण संभव हो पाता है।

  • ड्रोन (UAVs) और वैकल्पिक संचार: आपदा के समय जब पारंपरिक संचार नेटवर्क ध्वस्त हो जाते हैं, तब HAM रेडियो और सैटलाइट फोन (NavIC समर्थित) संपर्क का मुख्य माध्यम बनते हैं। इसके अलावा, बाढ़ में फँसे लोगों का पता लगाने, दवाओं और जीवन रक्षक सामग्रियों को एयरड्रॉप (Airdrop) करने में ड्रोन्स का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।

भूकंप प्रबंधन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण

चूंकि भूकंप की पूर्व सटीक भविष्यवाणी वर्तमान विज्ञान में संभव नहीं है, इसलिए प्रौद्योगिकी का मुख्य उद्देश्य 'शमन (Mitigation)' और 'संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण' है:

  • भूकंपीय माइक्रोज़ोनेशन (Seismic Microzonation): राजधानी क्षेत्र और उच्च जोखिम वाले शहरों की भू-गर्भिक (Geological) संरचनाओं का सूक्ष्म-स्तरीय मानचित्रण किया जा रहा है। यह तकनीक यह पहचानने में मदद करती है कि भूकंप की स्थिति में पटना और बिहार के सभी जिलों के किन विशिष्ट क्षेत्रों में मिट्टी के 'तरलीकरण' (Liquefaction) या भूस्खलन का खतरा सबसे अधिक होगा, जिससे भूमि उपयोग नीतियां (Land Use Policies) तय की जा सकें।

  • भूकंप-रोधी संरचनात्मक इंजीनियरिंग (Structural Engineering): भवनों और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं (जैसे अस्पताल, पुल) के निर्माण में बेस-आइसोलेशन (Base-isolation) और शॉक एब्जॉर्बर (Dampers) तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। पुरानी इमारतों को सुरक्षित करने के लिए आधुनिक रेट्रोफिटिंग (Retrofitting) प्रणालियां लागू की जा रही हैं।

  • IoT आधारित पूर्व चेतावनी सेंसर: प्रायोगिक तौर पर महत्वपूर्ण इमारतों में सेंसर लगाए जा रहे हैं जो भूकंप की प्राथमिक तरंगों (P-waves) को पहचान कर, अधिक विनाशकारी द्वितीयक तरंगों (S-waves) के पहुँचने से कुछ सेकंड पहले ही अलर्ट जारी कर देते हैं। यह समय गैस लाइनों और पावर ग्रिड को स्वचालित रूप से शट डाउन करने के लिए पर्याप्त होता है।

प्रमुख चुनौतियां (Challenges)

प्रौद्योगिकी की उपलब्धता के बावजूद, इसके इष्टतम उपयोग में कई व्यावहारिक बाधाएं हैं:

  • डिजिटल डिवाइड और अंतिम छोर तक संचार: दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की सीमित पैठ के कारण तकनीकी चेतावनियां अक्सर सबसे सुभेद्य (Vulnerable) आबादी तक समय पर नहीं पहुँच पाती हैं।

  • डेटा एकीकरण और संस्थागत समन्वय: CWC (केंद्रीय जल आयोग), IMD, ISRO और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (BSDMA) के बीच रियल-टाइम डेटा साझा करने के लिए एक निर्बाध और एकीकृत 'डेटा कमांड सेंटर' का अभाव है।

  • तकनीकी क्षमता का अभाव: आपदा पूर्व तैयारियों को लागू करने के लिए पटना और बिहार के सभी जिलों में पंचायत और नगर निगम स्तर पर प्रशिक्षित तकनीकी कार्यबल (Technical Workforce) की भारी कमी है।

आगे की राह (Way Forward)

आपदा प्रबंधन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए कितनी सुलभ और बोधगम्य है। भविष्य की रणनीतियों के अंतर्गत निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

  1. AI और बिग डेटा एनालिटिक्स (Big Data Analytics) का समावेश: पूर्व-आपदा मॉडलिंग को अधिक सटीक बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग कर ऐतिहासिक डेटा और मौसम के पैटर्न का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाना चाहिए।

  2. स्थानीयकृत 'स्मार्ट अलर्ट' प्रणाली: सेल-ब्रॉडकास्टिंग (Cell-Broadcasting) तकनीक का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि बिना इंटरनेट के भी सभी मोबाइल फोन्स पर मातृभाषा (हिंदी/भोजपुरी/मैथिली) में तेज अलार्म के साथ चेतावनी प्राप्त हो सके।

  3. समुदाय-आधारित तकनीकी सशक्तिकरण: बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (BSDMA) को 'प्रतिक्रियात्मक' (Reactive) दृष्टिकोण से आगे बढ़कर, पटना सहित राज्य के सभी जिलों में 'आपदा मित्रों' को तकनीकी उपकरणों (जैसे GPS, ड्रोन संचालन) का प्रशिक्षण देकर जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण करना चाहिए।

संक्षेप में, आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) में अनुसंधान एवं विकास (R&D) को नीतिगत प्राथमिकता देकर ही सतत विकास लक्ष्य (SDG-11: सुरक्षित और लचीले शहर) और 'आपदा-मुक्त बिहार' के संकल्प को साकार किया जा सकता है। तकनीक और मानवीय सतर्कता का यह समन्वय ही आपदाओं को त्रासदियों में बदलने से रोक सकता है।

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