बिहार में अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management - Solid and E-waste) की समस्या और इसके वैज्ञानिक समाधान पर चर्चा करें।

 Q. बिहार में अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management - Solid and E-waste) की समस्या और इसके वैज्ञानिक समाधान पर चर्चा करें।

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बिहार में ठोस और ई-अपशिष्ट प्रबंधन: चुनौतियाँ और वैज्ञानिक समाधान

भूमिका

तीव्र शहरीकरण, बढ़ती जनसंख्या और उपभोक्तावादी जीवनशैली के परिणामस्वरूप अपशिष्ट (कचरा) सृजन आज एक गंभीर पर्यावरणीय और ढांचागत चुनौती बन गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार' को मौलिक अधिकार माना गया है (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991)। इस परिप्रेक्ष्य में, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 और ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 अपशिष्ट के सुरक्षित और वैज्ञानिक निपटान के लिए एक वैधानिक ढांचा प्रदान करते हैं। बिहार, जो अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश और आर्थिक विकास के संक्रमण काल से गुजर रहा है, के लिए जनस्वास्थ्य और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने हेतु एक सुदृढ़ और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र की स्थापना अनिवार्य हो गई है।

बिहार में अपशिष्ट प्रबंधन की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

ठोस अपशिष्ट (Solid Waste) की समस्या

  • स्रोत पर पृथक्करण का अभाव: कचरे को उत्पन्न होने वाले स्थान (गीला, सूखा और खतरनाक) पर अलग न करने के कारण, इसका पुनर्चक्रण (Recycling) अत्यंत कठिन हो जाता है।

  • लैंडफिल साइट्स का अतिप्रवाह: पटना स्थित रामाचक-बैरिया जैसे लैंडफिल साइट्स अपनी क्षमता से अधिक भर चुके हैं। अवैज्ञानिक तरीके से कचरा डंप करने से 'लीचेट' (Leachate) का रिसाव होता है, जो भूजल को जहरीला बना रहा है।

  • ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन: लैंडफिल में जैविक कचरे के अवायवीय अपघटन (Anaerobic decomposition) से मीथेन (Methane) जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस उत्पन्न होती है, जो जलवायु परिवर्तन को तेज करती है और आग लगने की घटनाओं (Landfill fires) का कारण बनती है।

ई-कचरा (E-Waste) प्रबंधन का संकट

  • डिजिटल पैठ और अनौपचारिक क्षेत्र: बिहार में स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग से ई-कचरे में भारी वृद्धि हुई है। राज्य का लगभग 90% ई-कचरा अनौपचारिक क्षेत्र (कबाड़ी वालों) द्वारा प्रबंधित होता है।

  • अवैज्ञानिक निष्कर्षण (Unscientific Extraction): अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा तांबे और सोने जैसी मूल्यवान धातुओं को निकालने के लिए ई-कचरे को खुले में जलाया जाता है या एसिड में डुबोया जाता है।

  • घातक रसायनों का रिसाव: ई-कचरे में सीसा (Lead), पारा (Mercury), और कैडमियम जैसी भारी धातुएं होती हैं। इनका अवैज्ञानिक निपटान सीधे तौर पर तंत्रिका तंत्र (Nervous system) की बीमारियों और मृदा संदूषण का कारण बनता है।

अपशिष्ट प्रबंधन के वैज्ञानिक और तकनीकी समाधान

अपशिष्ट को 'कचरा' न मानकर इसे एक 'संसाधन' (Waste to Wealth) के रूप में देखने की आवश्यकता है। इसके वैज्ञानिक समाधान निम्नलिखित हैं:

ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन

  • बायोमिथेनेशन (Biomethanation) और कम्पोस्टिंग: गीले (जैविक) कचरे का उपयोग बायोगैस और जैविक उर्वरक बनाने में किया जाना चाहिए। यह ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ मृदा के स्वास्थ्य (Soil Health) को भी सुधारता है।

  • अपशिष्ट-से-ऊर्जा (Waste-to-Energy - WTE) संयंत्र: सूखे और गैर-पुनर्चक्रण योग्य (Non-recyclable) कचरे को उच्च तापमान पर नियंत्रित तरीके से जलाकर (Incineration) या गैसीकरण (Gasification) के माध्यम से बिजली उत्पन्न की जा सकती है।

  • बायोरेमेडिएशन (Bioremediation) और बायो-माइनिंग: पुराने लैंडफिल साइट्स (Legacy Waste) को साफ करने के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग कर जैविक कचरे को विघटित किया जाता है और शेष प्लास्टिक/धातुओं को मशीनों द्वारा अलग (Bio-mining) कर सड़क निर्माण (जैसे सीमेंट उद्योगों) में उपयोग किया जाता है।

ई-कचरे का वैज्ञानिक निपटान

  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) का कड़ाई से पालन: ई-कचरा नियम 2022 के तहत, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए कि वे अपने उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उन्हें वापस लें और वैज्ञानिक रूप से रिसाइकिल करें।

  • हाइड्रोमेटलर्जी (Hydrometallurgy) और पायरोमेटलर्जी: ई-कचरे से मूल्यवान धातुओं को निकालने के लिए एसिड बाथ के बजाय इन वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल रासायनिक प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाना चाहिए, जिससे शून्य विषैला उत्सर्जन सुनिश्चित हो।

  • अनौपचारिक क्षेत्र का एकीकरण: कबाड़ी वालों को प्रशिक्षित कर उन्हें औपचारिक 'सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं' (Material Recovery Facilities - MRFs) के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

पटना और बिहार के सभी जिलों के लिए रणनीतिक आवश्यकता

अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियों का समाधान केवल राजधानी तक केंद्रित नहीं हो सकता। स्वच्छ और स्वस्थ बिहार के निर्माण के लिए इन वैज्ञानिक प्रणालियों और आधारभूत अवसंरचनाओं को पटना और बिहार के सभी जिलों में समान रूप से लागू करना आवश्यक है:

  • मुजफ्फरपुर मॉडल का विस्तार: मुजफ्फरपुर नगर निगम द्वारा अपनाए गए 'विकेंद्रीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन' (Decentralized Solid Waste Management) मॉडल—जिसमें यूजर चार्ज कलेक्शन, सोर्स सेग्रीगेशन और कम्पोस्टिंग शामिल है—को पटना और राज्य के सभी जिलों की नगर निकायों में अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।

  • ई-कचरा रीसाइक्लिंग पार्क: राज्य सरकार को पटना और बिहार के सभी जिलों के क्लस्टर बनाकर क्षेत्रीय स्तर पर आधुनिक ई-कचरा रीसाइक्लिंग और डिस्मेंटलिंग पार्क स्थापित करने चाहिए, ताकि सुरक्षित निपटान के साथ-साथ 'हरित रोजगार' (Green Jobs) का भी सृजन हो सके।

आगे की राह (Way Forward)

अपशिष्ट प्रबंधन केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह एक व्यवहारिक समस्या भी है। अनुच्छेद 48A (पर्यावरण का संरक्षण) के तहत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को साकार करने के लिए 'रैखिक अर्थव्यवस्था' (Linear Economy: Take-Make-Dispose) से 'चक्रीय अर्थव्यवस्था' (Circular Economy) की ओर संक्रमण अनिवार्य है।

नीति आयोग के 'सर्कुलर इकोनॉमी विजन' के अनुरूप 3R (Reduce, Reuse, Recycle) के सिद्धांत को नागरिक कर्तव्यों में शामिल करना होगा। स्थानीय निकायों को वित्तीय रूप से सशक्त बनाकर, आधुनिक सेंसर-आधारित स्मार्ट डस्टबिन और IoT (Internet of Things) तकनीक का उपयोग कर एक पारदर्शी और कुशल 'स्मार्ट अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र' विकसित किया जा सकता है। जनभागीदारी, कड़े प्रशासनिक नियंत्रण और वैज्ञानिक नवाचार के समन्वय से ही बिहार एक 'कचरा-मुक्त' और धारणीय राज्य की पहचान स्थापित कर सकेगा।

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