शॉर्ट नोट्स: राइट टू रिकॉल।

 Q. शॉर्ट नोट्स: राइट टू रिकॉल।

Ans - 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन-संप्रभुता (Popular Sovereignty) को सर्वोपरि मानते हुए 'राइट टू रिकॉल' (Right to Recall) या 'वापस बुलाने का अधिकार' प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) का एक अत्यंत सशक्त वैधानिक और राजनीतिक उपकरण है। यह मतदाताओं को यह अधिकार प्रदान करता है कि यदि उनका निर्वाचित प्रतिनिधि अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहता है, तो वे उसका कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ही उसे पदमुक्त कर सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से इसकी उत्पत्ति प्राचीन एथेंस में मानी जाती है, जबकि आधुनिक संदर्भ में स्विट्जरलैंड और अमेरिका के कुछ राज्यों में इसका सफल प्रयोग हो रहा है।

राइट टू रिकॉल: आवश्यकता, प्रभाव और संस्थागत चुनौतियाँ

आवश्यकता और औचित्य (Why it is Needed?)

  • निरंतर जवाबदेही (Continuous Accountability): वर्तमान में भारतीय संसदीय प्रणाली में प्रतिनिधियों की जवाबदेही चुनाव के समय (प्रत्येक पाँच वर्ष में) ही तय होती है। 'रिकॉल' का अधिकार प्रतिनिधियों पर निरंतर प्रदर्शन का दबाव बनाए रखेगा, जिससे अनुच्छेद 75(3) की सामूहिक जवाबदेही की भावना जमीनी स्तर पर मतदाताओं के प्रति भी सुनिश्चित हो सकेगी।

  • भ्रष्टाचार और अपराधीकरण पर अंकुश: राजनीतिक दलों द्वारा धनबल और बाहुबल (Money and Muscle Power) के आधार पर चुने गए दागी उम्मीदवारों को पद से हटाने का यह एक अचूक हथियार बन सकता है, जिससे 'सुशासन' (Good Governance) को बल मिलेगा।

  • मतदाता सशक्तिकरण: यह प्रणाली मतदाता को केवल 'वोट बैंक' की निष्क्रिय भूमिका से निकालकर उसे नीति-निर्माण और शासन की सक्रिय निगरानी (Active Surveillance) करने वाले जागरूक नागरिक में परिवर्तित करती है।

भारत और बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता एवं स्थिति

राष्ट्रीय स्तर पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 में 'राइट टू रिकॉल' का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि, स्थानीय स्वशासन के स्तर पर इसके कई प्रयोग देखे गए हैं:

  • बिहार का ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ: भारतीय लोकतंत्र में राइट टू रिकॉल की सबसे प्रखर मांग बिहार की धरती से ही उठी थी। वर्ष 1974 के 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) आंदोलन के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) ने पटना के गांधी मैदान से निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार की जोरदार वकालत की थी।

  • पंचायती राज और स्थानीय निकाय: यद्यपि बिहार में प्रत्यक्ष 'रिकॉल' मतदान का अधिकार नहीं है, परंतु 'बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006' के अंतर्गत पंचायत समिति या वार्ड सदस्यों द्वारा दो-तिहाई बहुमत से 'अविश्वास प्रस्ताव' (No-Confidence Motion) पारित कर मुखिया या प्रमुख को हटाने का प्रावधान, परोक्ष रूप से रिकॉल की वैधानिक भावना को ही प्रतिबिंबित करता है।

  • मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने अपने स्थानीय निकाय अधिनियमों (जैसे- मध्य प्रदेश पंचायती राज ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993) में इसे वैधानिक मान्यता दी है, जहाँ मतदाताओं ने इसका प्रयोग कर कुछ सरपंचों और नगर पंचायत अध्यक्षों को पदमुक्त भी किया है।

प्रमुख चुनौतियाँ और सीमाएँ (Challenges)

  • राजनीतिक अस्थिरता (Political Instability): भारत की बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली में हारे हुए उम्मीदवार या विपक्षी दल अपने निहित स्वार्थों के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ निरंतर 'रिकॉल' अभियान चला सकते हैं, जिससे शासन में पंगुता आ सकती है।

  • लोकलुभावन नीतियां (Populism over Pragmatism): वापस बुलाए जाने के डर से निर्वाचित प्रतिनिधि दीर्घकालिक और कठोर संरचनात्मक सुधारों (जैसे- बुनियादी ढांचे या कर सुधार) से बचेंगे और केवल अल्पकालिक, लोकलुभावन योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

  • अत्यधिक वित्तीय और प्रशासनिक बोझ: भारत जैसे विशाल जनसांख्यिकी (Demography) वाले देश में बार-बार चुनाव कराना भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के लिए लॉजिस्टिक और सरकारी राजकोष पर अत्यधिक वित्तीय दबाव उत्पन्न करेगा।

  • जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: बिहार जैसे राज्यों में जहां जातीय समीकरण (Caste Dynamics) अत्यंत प्रगाढ़ हैं, बहुसंख्यक जातीय समूह अल्पमत से चुने गए किसी योग्य प्रतिनिधि को भी पद से हटाने के लिए इस अधिकार का दुरुपयोग कर सकते हैं।

आगे की राह (Way Forward)

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) और विधि आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में सांसदों या विधायकों के स्तर पर 'राइट टू रिकॉल' को तत्काल लागू करना व्यावहारिक रूप से जोखिम भरा है।

सुधारात्मक दृष्टिकोण से इसे 'सहकारी संघवाद' (Cooperative Federalism) और 73वें व 74वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप, सर्वप्रथम केवल स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगर पालिकाओं) में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पूर्णतः लागू किया जाना चाहिए। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त विधिक सुरक्षा उपाय (Safeguards) अनिवार्य हैं; जैसे- रिकॉल प्रस्ताव लाने के लिए कुल मतदाताओं के कम से कम 25-30% के हस्ताक्षर और प्रस्ताव पारित होने के लिए दो-तिहाई (2/3) बहुमत की अनिवार्यता। 'लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ उपचार अधिक लोकतंत्र है', परंतु यह परिपक्वता, सख्त वैधानिक नियमों और संस्थागत क्षमता संवर्द्धन के साथ ही धरातल पर उतारा जाना चाहिए।

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