भारत में कृषि संकट के कारणों और किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का विश्लेषण करें।

 Q. भारत में कृषि संकट के कारणों और किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का विश्लेषण करें।

Ans - 

भूमिका

भारत में कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन का आधारस्तंभ है। वर्तमान में देश की लगभग 45-50% कार्यशील जनसंख्या कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका योगदान लगभग 16-18% है।

हालिया राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO - SAS 77वां दौर) की रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय कृषि परिवार की मासिक आय मात्र ₹10,218 आंकी गई है। उत्पादन लागत में निरंतर वृद्धि, जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता और बाजार की विसंगतियों के कारण भारतीय कृषि 'आजीविका संकट' (Agrarian Distress) के दौर से गुजर रही है। इस पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा गठित अशोक दलवई समिति (2016) ने उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर आय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हुए किसानों की आय को दोगुना करने की विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की।

भारत में कृषि संकट के बहुआयामी कारण

भारतीय कृषि संकट किसी एक कारक का परिणाम न होकर संरचनात्मक, पर्यावरणीय, वित्तीय एवं बाजार संबंधी समस्याओं का जटिल समुच्चय है:

          

1. संरचनात्मक एवं संस्थागत कारक (Structural Factors)

  • भू-जोत का अत्यधिक विखंडन: कृषि जनगणना (2015-16) के अनुसार, भारत में 86.2% किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी (2 हेक्टेयर से कम जोत) के अंतर्गत आते हैं। औसत जोत का आकार घटकर मात्र 1.08 हेक्टेयर रह गया है, जिससे 'पैमाने की मितव्ययिता' (Economies of Scale) और यंत्रीकरण का लाभ नहीं मिल पाता।

  • पूंजी निर्माण में कमी: कृषि क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण (GCF) का स्तर निम्न है। सार्वजनिक निवेश की कमी के कारण सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज और वेयरहाउसिंग का पर्याप्त विस्तार नहीं हो सका है।

  • संस्थागत साख तक सीमित पहुँच: यद्यपि प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रक ऋण (PSL) का विस्तार हुआ है, फिर भी छोटे व बटाईदार किसान (Tenant Farmers) दस्तावेजीकरण के अभाव में स्थानीय साहूकारों के उच्च ब्याज दर वाले ऋण जाल में फंस जाते हैं।

2. उत्पादन लागत में वृद्धि एवं लाभप्रदता में गिरावट (Input-Output Disparity)

  • रासायनिक उर्वरकों, संकर बीजों, डीजल, कीटनाशकों तथा श्रम लागत में तीव्र वृद्धि हुई है, जबकि उस अनुपात में फसलों के शुद्ध मूल्य प्राप्ति में वृद्धि नहीं हुई है।

  • उर्वरकों (यूरिया) के असंतुलित उपयोग के कारण मृदा स्वास्थ्य (NPK अनुपात) गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।

3. विपणन एवं मूल्य शृंखला की विसंगतियाँ (Marketing Bottlenecks)

  • APMC मंडियों का एकाधिकार: कृषि उपज विपणन समितियों में अत्यधिक मध्यस्थों (Intermediaries) की उपस्थिति के कारण किसान को उपभोक्ता मूल्य का मात्र 25-30% हिस्सा ही मिल पाता है।

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की सीमित प्रभावशीलता: शांता कुमार समिति (2015) के अनुसार, देश के केवल 6% किसान ही प्रभावी रूप से MSP व्यवस्था का लाभ ले पाते हैं, जिसका मुख्य लाभ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धान-गेहूं उत्पादकों तक सीमित रहा है।

4. पारिस्थितिक एवं जलवायु संकट (Climate & Ecological Risks)

  • मानसूनी अनिश्चितता और 'ग्लोबल वार्मिंग' के कारण चरम मौसमी घटनाओं (अतिवृष्टि, सूखा, ओलावृष्टि) की आवृत्ति बढ़ी है।

  • देश का लगभग 50% से अधिक कृषि क्षेत्र अभी भी वर्षा पर निर्भर (Rainfed) है।

बिहार के संदर्भ में कृषि संकट की विशिष्टता

बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि का विशिष्ट महत्व है, जहाँ लगभग 74% से अधिक श्रमशक्ति कृषि पर आश्रित है:

  • अति-विखंडित जोत संरचना: बिहार में 91% से अधिक किसान सीमांत श्रेणी के हैं, जिनका औसत जोत आकार 0.39 हेक्टेयर से भी कम है।

  • भौगोलिक एवं जलवायु आपदाओं का दोहरा प्रभाव: उत्तरी बिहार प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ (कोसी, गंडक, बागमती बेसिन) से प्रभावित होता है, जबकि दक्षिणी बिहार बार-बार सूखे की चपेट में आता है।

  • विपणन तंत्र में शून्यता: वर्ष 2006 में बिहार कृषि उत्पादन बाजार अधिनियम (APMC Act) को निरस्त कर दिया गया। इसके स्थान पर पैक्स (PACS) आधारित खरीद व्यवस्था पूरी तरह सुदृढ़ नहीं हो सकी, जिससे किसानों को निजी व्यापारियों को औने-पौने दाम पर फसल बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

किसानों की आय दोगुनी करने हेतु सरकारी पहलें

अशोक दलवई समिति द्वारा अनुशंसित 7-सूत्रीय रणनीति (उत्पादकता में वृद्धि, लागत में कमी, फसल विविधीकरण, बेहतर मूल्य प्राप्ति आदि) के आलोक में सरकार ने कई व्यापक कदम उठाए हैं:

                         

1. प्रत्यक्ष आय सहायता एवं सामाजिक सुरक्षा

  • PM-KISAN योजना: सभी भूमिधारक किसान परिवारों को प्रतिवर्ष ₹6,000 की प्रत्यक्ष आय सहायता (DBT) तीन समान किस्तों में प्रदान की जाती है, जिससे बीज-खाद की तात्कालिक आवश्यकता पूरी होती है।

  • किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विस्तार: केसीसी का दायरा पशुपालन और मत्स्य पालन तक विस्तारित कर संस्थागत ऋण की सुलभता सुनिश्चित की गई है।

2. लागत नियंत्रण एवं संसाधन प्रबंधन

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card): पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देकर उर्वरक लागत में 8-10% की कमी लाना।

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): 'हर खेत को पानी' और 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई (Drip & Sprinkler) को प्रोत्साहन।

  • नीम लेपित यूरिया एवं नैनो यूरिया: यूरिया के गैर-कृषि उपयोग को रोकने और दक्षता बढ़ाने की दिशा में प्रभावी कदम।

3. बाजार सुधार एवं मूल्य संवर्धन

  • e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार): पूरे देश की मंडियों को एक साझा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से जोड़कर 'एक राष्ट्र, एक बाजार' का निर्माण।

  • कृषि अवसंरचना कोष (Agriculture Infrastructure Fund - AIF): फसल कटाई उपरांत प्रबंधन और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के लिए ₹1 लाख करोड़ का वित्तपोषण।

  • 10,000 कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) का गठन: छोटे किसानों को समूहबद्ध कर उनकी सौदेबाजी क्षमता (Bargaining Power) बढ़ाना।

4. जोखिम प्रबंधन एवं विविधीकरण

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): न्यूनतम प्रीमियम दर (खरीफ: 2%, रबी: 1.5%, वाणिज्यिक फसलें: 5%) पर बुवाई से लेकर कटाई उपरांत तक व्यापक फसल सुरक्षा।

  • राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन एवं परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): रसायन-मुक्त और संधारणीय खेती को प्रोत्साहन।

  • राष्ट्रीय बाजरा वर्ष (श्री अन्न पहल): जलवायु-सहिष्णु मोटे अनाजों के उत्पादन और उपभोग को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा।

बिहार सरकार के विशिष्ट प्रयास: 'कृषि रोड मैप'

बिहार सरकार ने कृषि क्षेत्र के कायाकल्प के लिए चरणबद्ध रणनीति अपनाई है:

  • कृषि रोड मैप 1, 2, 3 और वर्तमान में चतुर्थ कृषि रोड मैप (2023-2028): इसमें बीज प्रतिस्थापन दर (SRR) बढ़ाने, जैविक कॉरिडोर (गंगा के दोनों किनारों के 13 जिलों में), जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate Resilient Agriculture) और डिजिटल कृषि पर विशेष बल दिया गया है।

  • हर खेत तक सिंचाई का पानी: 'सात निश्चय-2' कार्यक्रम के तहत राज्य के प्रत्येक खेत तक सुनिश्चित सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य।

  • मशरूम, मखाना एवं बागवानी मिशन: बिहार मखाना (मिथिला मखाना GI टैग) और लीची के मूल्य संवर्धन एवं निर्यात को विशेष वित्तीय प्रोत्साहन।

विद्यमान चुनौतियाँ एवं आगे की राह (Way Forward)

प्रमुख बाधाएँ (Challenges)रणनीतिक समाधान (Way Forward)
शीतगृह एवं लॉजिस्टिक्स का अभावब्लॉक स्तर पर AIF के तहत पीपीपी (PPP) मॉडल पर कोल्ड चेन और प्राइमरी प्रोसेसिंग सेंटर की स्थापना।
बटाईदार/काश्तकार किसानों का बहिष्करणनीति आयोग के 'मॉडल भूमि पट्टा कानून' (Model Land Leasing Act) को राज्य स्तर पर लागू कर बटाईदारों को संस्थागत साख और सरकारी लाभ दिलाना।
संबद्ध क्षेत्रों (Allied Sectors) का कम दोहनपशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन और मधुमक्खी पालन को कृषि आय के मुख्य स्रोत के रूप में विकसित करना (आय का विविधीकरण)।
कृषि में अनुसंधान एवं विकास (R&D) की कमीकृषि R&D व्यय को वर्तमान के 0.3-0.4% से बढ़ाकर कम से कम 1% (GDP) करना तथा AI, ड्रोन और प्रिसिजन फार्मिंग को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

कृषि संकट का स्थायी समाधान केवल मूल्य समर्थन (MSP) या ऋणमाफी जैसे तात्कालिक उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के शब्दों में—"कृषि को उत्पादन-उन्मुख दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर किसान की शुद्ध आय-उन्मुख और उद्यमिता-आधारित व्यवस्था में बदलना होगा।"

यदि आधुनिक तकनीक (एग्री-टेक), खाद्य प्रसंस्करण अवसंरचना, सशक्त FPOs तथा काश्तकारी सुधारों का एक समन्वित ढाँचा तैयार किया जाए, तो भारतीय कृषि न केवल देश की खाद्य सुरक्षा को अक्षुण्ण रखेगी, बल्कि 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प की मुख्य संवाहक भी बनेगी।

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